भारतीय संस्कृति एक संपूर्ण संस्कृति

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‘‘संस्कृति का उद्गम शब्द संस्कार है।
संस्कार का अर्थ है क्रिया जिससे व्यक्ति अथवा मानवीय काल- सापेक्ष दोष को दूर कर शुद्ध कर दिया जाए। मानवीय दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत उपक्रम ही संस्कृति है।’’
वस्तुतः संस्कृति इतना व्यापक अर्थ वाला शब्द है जिससे एक बहुत बड़े मानव समुदाय के उन्नत होने का बोध होता है, एक लम्बे मानवीय अनुभव से सिद्ध उन सम्यक् चेष्टाओं का ज्ञान मिलता है जो उसके आचार, विचार, व्यवहार को उत्कृष्ट बनाते हैं, उसकी संस्थाओं को चलाते हैं तथा जिनके ऊपर उस भोगोलिक सीमा का आन्तरिक बाह्य विकास निर्भर करता है जहाँ वो निवास करते हैं। संक्षेप में संस्कृति मानव समुदाय के जीवन यापन की वह परम्परागत किंतु निरन्तर विकासोन्मुखी शैली है जिसका प्रशिक्षण पाकर मनुष्य संस्कारित सुघड़, प्रौढ़ और विकसित होता है।

प्रत्येक संस्कृति के कुछ सार्वभौमिक आधार हैं, जिनके कारण वह जीवित रहती है, जिसमें ये सार्वभौम गुण जितने प्रचुर मात्रा में होते हैं, उतनी वह संस्कृति व्यापक और प्रभावशाली बन जाती हैं। सार्वभौमिक सत्यों पर ही संस्कृति अजर-अमर रहती है वह कभी नहीं मरती, भले ही समाज-राष्ट्र मर जाये। संकीर्णता-क्षुद्रता पर आधारित संस्कृतियाँ नष्ट हो जाती हैं, अतः किसी भी संस्कृति की महानता इस पर निर्भर करती है कि वह कितने सार्वभौमिक सत्यों पर खड़ी है और इसी कारण वह सब ओर गतिशील होती है।
विश्व में अनेक संस्कृतियाँ पनपीं और मिट गई। आज उनका सिर्फ अवशेष ही बचा है, सिर्फ उनकी स्मृति बाकी है, लेकिन भारतीय संस्कृति का मूल अस्तित्व कभी नहीं मिटा, उसे मिटाने के बहुत प्रयास हुए और यह सिलसिला आज भी जारी है, पर कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी, भारतीय संस्कृति में आखिर क्या है, जो उसे हमेशा बचाए रखती है, जिसकी वजह से वह हजारों साल से विदेशी हमलावरों से लोहा लेती रही और लेती रहेगी, आखिर ऐसा कौन-सा तंत्र है जो हमलावार संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति को छिन्न-भिन्न नहीं पर पाती? हर बार उन्हें लगता है कि इस बार वे इसे अवश्य पदाक्रांत कर देंगी, पर हुआ हमेशा उलटा, वे खुद ही पदाक्रांत होकर भारतीय संस्कृति में विलीन हो गई।
हजारों साल से क्यों और कैसे जीवित है भारतीय संस्कृति, क्या है इसके मूल तत्व, जो इसे नष्ट होने से हमेशा बचाते और विरोधी संस्कृतियों का मुकाबला करने की शक्ति देते रहे है, भारत में पनपी इस संस्कृति ने कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बड़े भूभाग को अपने प्रभाव में ले लिया।
सिर्फ देह की शक्ति को महत्वपूर्ण मानने वाला स्पार्टा वीरों के लिए भले ही जाना जाता है, मगर विश्व की संस्कृतियों पर वह कोई प्रभाव नहीं डाल सका, वहाँ मनुष्य के मन को भारतीय संस्कृति जितना महत्त्व नहीं दिया गया, शायद इसीलिए रोम, मिस्र और काबुल आदि की प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट हो गई।
‘भारतीय संस्कृति’ विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है, इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी कहा जाता है, जीने की कला हो या विज्ञान और राजनीति का क्षेत्र, भरतीय संस्कृति का सदैव विशेष स्थान रहा है, अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय की धारा के साथ-साथ नष्ट होती रही है, किन्तु भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है।
विश्व के सभी क्षेत्रों और धर्मों की अपने रीति-रिवाजों, परम्पराओं और परिष्कृति गुणों के साथ अपनी संस्कृति है, भारतीय संस्कृति स्वाभाविक रूप से शुद्ध है जिसमें प्यार, सम्मान, दूसरों की भावनाओं का मान-सम्मान और संस्कार अन्तर्निहित है, भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वों, जीवन मूल्यों और वचन पह्ति में एक ऐसी निरन्तरता रही है कि आज भी करोड़ों भारतीय स्वयं को उन मूल्यों एवं चिन्तन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं और इससे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से भारत विविधताओं का देश है फिर भी सांस्कृतिक रूप से एक इकाई के रूप में इसका अस्तित्व प्राचीनकाल से बना हुआ है। भौगोलिक विभिन्नता के अतिरिक्त इस देश में आर्थिक और सामाजिक भिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान है, वस्तुत: इन भिन्नताओं के कारण ही भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित होकर पल्लवित और पुष्पित हुई हैं, अनेक विभिन्नताओं के बावजूद भी भारत की पृथक सांस्कृतिक सत्ता रही है।

संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है, संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावत: प्रगतिशील प्राणी है, यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है, जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। हिमालय सम्पूर्ण देश के गौरव का प्रतीक रहा है, गंगा-यमुना और नर्मदा जैसी नदियों की स्तुति यहाँ के लोग प्राचीनकाल से करते आ रहे हैं। राम, कृष्ण और शिव की आराधना यहाँ सदियों से की जाती रही है। भारत की सभी भाषाओं में इन देवताओं पर आधारित साहित्य का सृजन हुआ है, उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सम्पूर्ण भारत में जन्म, विवाह और मृत्यु के संस्कार एक समान प्रचलित हैं, विभिन्न-रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार और तीज-त्यौहारों में भी समानता है। भाषाओं की विविधता अवश्य है फिर भी संगीत, नृत्य और नाटय के मौलिक स्वरूपों में आश्चर्यजनक समानता है, संगीत के सात स्वर और नृत्य के त्रिताल सम्पूर्ण भारत में समान रूप प्रचलित हैं। भारत अनेक धर्मों, सम्प्रदायों, मतों और पृथक आस्थाओं एवं विश्वासों का महादेश है तथापि इसका सांस्कृतिक समुच्चय और अनेकता में एकता का स्वरूप संसार के अन्य देशों के लिए विस्मय का विषय रहा है।

हमारी संस्कृति की विशेषताओं पर गौर करें तो इसकी प्राचीनता वैश्विक संस्कृतियों में सर्वोपरि है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। सिन्धु घाटी की सभ्यता के विवरणों से भी प्रमाणित होता है कि आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले उत्तरी भारत के बहुत बड़े भाग में एक उच्च कोटि की संस्कृति का विकास हो चुका था, इसी प्रकार वेदों में परिलक्षित भारतीय संस्कृति न केवल प्राचीनता का प्रमाण है, अपितु वह भारतीय अध्यात्म और चिन्तन की भी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर भारतीय संस्कृति से रोम और यूनानी संस्कृति को प्राचीन तथा मिस्र, असीरिया एवं बेबीलोनिया जैसी संस्कृतियों के समकालीन माना गया है।
दरअसल, भारतीय संस्कृति की सहिष्णु प्रकृति ने उसे दीर्घ आयु और स्थायित्व प्रदान किया है। भारतीय हिन्दू किसी देवी-देवता की आराधना करें या न करे, पूजा-हवन करे या न करे, स्वतंत्रता पर धर्म या संस्कृति के नाम पर कभी कोई बंधन नहीं लगाये गए, इसीलिए प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रतीक हिन्दू धर्म को धर्म न कहकर कुछ मूल्यों पर आधारित एक जीवनपद्धति की संज्ञा दी गई और हिन्दू का अभिप्राय किसी धर्म विशेष के अनुयायी से न लगाकर भारतीय से लगाया गया। भारतीय संस्कृति के इस लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई तब किसी न किसी महापुरुष ने इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया, इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द एवं महात्मा ज्योतिबा फुले के द्वारा किये गए प्रयास इस संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर बन गए।
भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हजारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियां अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्या तथा अन्य प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है, देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतनी ही है, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी।
गीता और उपनिषदों के सन्देश हजारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। किंचित परिवर्तनों के बावजूद भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में एक ऐसी निरन्तरता रही है कि आज भी करोड़ों भारतीय स्वयं को उन मूल्यों एवं चिन्तन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।

भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता एवं उदारता के कारण उसमें एक ग्रहणशीलता प्रवृत्ति को विकसित होने का अवसर मिला, वस्तुत: जिस संस्कृति में लोकतन्त्र एवं स्थायित्व के आधार व्यापक हों, उस संस्कृति में ग्रहणशीलता की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो जाती है, हमारी संस्कृति में यहाँ के मूल निवासियों ने समन्वय की प्रक्रिया के साथ ही बाहर से आने वाले शक, हूण, यूनानी एवं कुषाण जैसी प्रजातियों के लोग भी घुलमिल कर अपनी पहचान खो बैठे।
भारत में इस्लामी संस्कृति का आगमन भी अरबों, तुर्कों और मुगलों के माध्यम से हुआ, इसके बावजूद भारतीय संस्कृति का पृथक अस्तित्व बना रहा और नवागत संस्कृतियों से कुछ अच्छी बातें ग्रहण करने में भारतीय संस्कृति ने संकोच नहीं किया, ठीक यही स्थिति यूरोपीय जातियों के आने तथा ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत में विकसित हुई ईसाई संस्कृति पर भी लागू होती है, यद्यपि ये संस्कृतियाँ अब भारतीय संस्कृतियों का अभिन्न अंग हैं तथापि ‘भारतीय इस्लाम’ एवं ‘भारतीय ईसाई’ संस्कृतियों का स्वरूप विश्व के अन्य इस्लामी और ईसाई धर्मावलम्बी देशों से कुछ भिन्न है, इस भिन्नता का मूलभूत कारण यह है कि भारत के अधिकांश मुसलमान और ईसाई मूलतः भारत भूमि के ही निवासी हैं, संभवत: उनके सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक आचरण में कोई परिवर्तन नहीं हो पाया और भारतीयता ही उनकी पहचान बन गई।
भारतीय संस्कृति में आश्रम-व्यवस्था के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों का विशिष्ट स्थान रहा है, वस्तुत: इन पुरुषार्थों ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अद्भुत समन्वय कर दिया। हमारी संस्कृति में जीवन के ऐहिक और पारलौकिक दोनों पहलुओं से धर्म को सम्बद्ध किया गया था, धर्म उन सिद्धान्तों, तत्त्वों और जीवन प्रणाली को कहते हैं, जिससे मानव जाति परमात्मा प्रदत्त शक्तियों के विकास से अपना लौकिक जीवन सुखी बन सके तथा मृत्यु के पश्चात जीवात्मा शान्ति का अनुभव कर सके।
शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, यह अमरता मोक्ष से जुड़ी हुई है और यह मोक्ष पाने के लिए अर्थ और काम के पुरुषार्थ करना भी जरूरी है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में धर्म और मोक्ष, आध्यात्मिक सन्देश एवं अर्थ और काम की भौतिक अनिवार्यता परस्पर सम्बद्ध है। आध्यात्मिकता और भौतिकता के इस समन्वय में भारतीय संस्कृति की वह विशिष्ट अवधारणा परिलक्षित होती है, जो मनुष्य के इस लोक और परलोक को सुखी बनाने के लिए भारतीय मनीषियों ने निर्मित की थी। सुखी मानव-जीवन के लिए ऐसी चिन्ता विश्व की अन्य संस्कृतियाँ नहीं करती। साहित्य, संगीत और कला की सम्पूर्ण विधाओं के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति के इस आध्यात्मिक एवं भौतिक समन्वय को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

भौगोलिक दृष्टि से भारत विविधताओं का देश है, फिर भी सांस्कृतिक रूप से एक इकाई के रूप में इसका अस्तित्व प्राचीनकाल से बना हुआ है, इस विशाल देश में उत्तर का पर्वतीय भू-भाग, जिसकी सीमा पूर्व में ब्रह्मपुत्र और पश्चिम में सिन्धु नदियों तक विस्तृत है, इसके साथ ही गंगा, यमुना, सतलुज की उपजाऊ कृषि भूमि, विन्ध्य और दक्षिण का वनों से आच्छादित पठारी भू-भाग, पश्चिम में थार का रेगिस्तान, दक्षिण का तटीय प्रदेश तथा पूर्व में असम और मेघालय का अतिवृष्टि का सुरम्य क्षेत्र सम्मिलित है, इस भौगोलिक विभिन्नता के अतिरिक्त इस देश में आर्थिक और सामाजिक भिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान है, वस्तुत: इन भिन्नताओं के कारण ही भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित होकर पल्लवित और पुष्पित हुई हैं।
भारत ही केवल एक ऐसा देश है जहाँ सर्वधर्म समभाव का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है, जितनी इज्जत हम अपने धर्म की करते हैं, उतनी ही इज्जत हमें दूसरों के धर्म की करनी चाहिये, यहाँ सुबह-सुबह मंदिर से मन्त्रोच्चार की ध्वनि, मस्जिद से अजान, गुरूद्वारे से शबद कीर्तन की आवाज और चर्च के प्रार्थना की पुकार एक साथ सुनी जा सकती है, जितनी भाषायें यहाँ बोली जाती हैं, विश्व में कहीं और नहीं बोली जाती। बोल-चाल, खान-पान, रहनसहन में अनेकता होते हुए भी हम एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे के तीज त्योहार में शिरकत करते हैं, होली, दीवाली, ईद, बाराबफात, मुहर्रम, गुरपर्ब और क्रिसमस साथ-साथ मनायी जाती है, मजारों और मकबरों पर हिन्दुओं द्वारा चादर चढ़ाना और दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का मंदिरों और गुरुद्वारों पर दर्शन करना, मत्था टेकना बहुत आम बात है, यह हमारे धर्म और लोकाचार की सहनशीलता का जीता-जागता उदाहरण है, रही बात हमारे विभिन्न प्रकार के देवी देवता होने की, तो हिन्दू धर्म में प्रकृति को हर तरह से पूजा गया है, चाहे वह वायु, जल, पृथ्वी, अग्नि या आकाश हो। इस प्रकार से हम प्रकृति के हर रूप की पूजा करते हैं, चाहे वह पहाड़ हो या कोई जीव जन्तु या हमारी वन्य संपदा, हमारी संस्कृति में इन सबको विशेष स्थान दिया गया है। दुनिया में ऐसी कोई संस्कृति नहीं होगी जहाँ प्रकृति को विभिन्न रूपों और स्वरूपों में पूजा गया है, अगर बात त्योहारों से जुड़ी कहानियों की करें, तो सामान्य जनता जो उपनिषदों वेदों की लिखी गूढ़ बातों को नहीं समझ सकती, उनको लोक आचरण के लिये विभिन्न ऋषि-मुनियों ने अनेक गाथायें लिखीं और उनको विभिन्न त्योहारों से इस तरह से जोड़ा कि सामान्य जन भी उसके साथ जुड़ सके और उसे अपना सके साथ ही ईश्वर का ध्यान और मनन कर सके, इससे अतिरिक्त और भी चीजें हमारी संस्कृति में जुड़ती रहीं, सभी का उल्लेख करना तो सम्भव नहीं हो सकेगा… प्रमुख रूप से क्रिकेट की संस्कृति है, यह खेल अब हमारी संस्कृति में शामिल हो गया है, क्रिकेटरों के अच्छे-बुरे प्रदर्शन पर हम हंसते-रोते हैं, इनको अपने बच्चों से भी ज्यादा प्यार करते हैं, भगवान जैसी पूजा करते हैं, जब जीतते हैं तो तालिया बजाते हैं, जब हारते हैं तो गालिया देते हैं, समस्या यहाँ आती है कि हम अपनी संस्कृति का कितना मान रख पाते हैं, वेद शास्र आपको रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन आपको उन पर चलते के लिये बाध्य नहीं कर सकते, एक और बात, चूंकि ये सारे शास्र गूढ़ भाषा में लिखे गये थे, इसलिये समय-समय पर अनेक स्वार्थी धर्माचार्यों ने अपने और कुछ राजनीतिज्ञों के निहित स्वार्थों के लिये, इन शास्त्रों का मनमाने ढंग से विवेचना कर अपने फायदे के लिये इस्तेमाल किया और अपनी दुकानें चलायीं, भाई को भाई से लड़ाया और विभिन्न समुदायों में आपस में बैर और नफरत फैलायी, जो आज तक जारी है, इन्हीं लोगों की वजह से हमारी यहाँ कभी-कभी दंगे फसाद होते हैं, लेकिन आपसी भाईचारा कभी खत्म नहीं होता।
मार्क ट्वेन ने १८५६ में जब भारत का दौरा किया था तो उसने लिखा था, ‘‘भारत सांस्कृतिक रूप से परिपूर्ण राष्ट्र है’’ वैसे भी समय-समय पर कई विदेशी विद्वानों ने भारत का दौरा किया और यहाँ की संस्कृति को दुनिया में सबसे उन्नत माना, यही हमारी संस्कृति है और हम सभी भारतीयों को इस पर गर्व है।
भारतीय संस्कृति स्थिर एवं अद्वितीय है जिसके संरक्षण की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी पर है, इसकी उदारता तथा समन्वयवादी गुणों ने अन्य संस्कृतियों को समाहित तो किया है, किन्तु अपने अस्तित्व के मूल को सुरक्षित रखा है। एक राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के दिल और आत्मा में बसती है। सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा भारतीय संस्कृति अग्रणी है।

- डॉ. आशीष कंधवे

गुड़ी प़ाडवा २०१९

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गुड़ी पाड़वा का पर्व महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में उल्लास के साथ मनाया जाता है, चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पाड़वा का त्यौहार मनाया जाता है, इस दिन को नवसंवत्सर के रुप में पूरे देश भर में मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व को लेकर खास मान्यताएं हैं, गुड़ी ध्वज यानि झंडे को कहा जाता है और पड़वा, प्रतिपदा तिथि को, मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था।
दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा की लोकप्रियता का कारण इस पर्व से जुड़ी कथाओं से समझा जा सकता है। दक्षिण भारत का क्षेत्र रामायण काल में बालि का शासन क्षेत्र हुआ करता था, जब भगवान श्री राम माता को पता चला की लंकापति रावण माता सीता का हरण करके ले गये हैं तो उन्हें वापस लाने के लिये उन्हें रावण की सेना से युद्ध करने के लिये एक सेना की आवश्यकता थी, दक्षिण भारत में आने के बाद उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई। सुग्रीव ने बालि के कुशासन से उन्हें अवगत करवाते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की, तब भगवान श्री राम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को उनसे मुक्त करवाया। मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ही वो दिन था, इसी कारण इस दिन गुड़ी यानि विजयपताका फहराई जाती है।
एक और प्राचीन कथा शालिवाहन के साथ भी जुड़ी है कि उन्होंने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया, इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है, इस दिन लोग अपने घरों को आम के पत्तों की बंदनवार से सजाते हैं। खासकर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र में इसे लेकर बहुत उल्लास होता है। आम के
पत्तों की यह बंदनवार लोगों में खुशहाल जीवन की एक उम्मीद जगाती है। अच्छी फसल होने व घर में समृद्धि आने की आशाएं भी लोगों को होती हैं। गुड़ी पड़वा की गिनती वर्ष के तीन मुंहतारे में होती है।
स्वास्थ्य के नज़रिये से भी इस पर्व का महत्व है, इसी कारण गुड़ी पड़वा के दिन बनाये जाने वाले व्यंजन खास तौर पर स्वास्थ्य वर्धक होते हैं, चाहे वह आंध्र प्रदेश में बांटा जाने वाला प्रसाद पच्चड़ी हो या फिर महाराष्ट्र में बनाई जाने वाली मीठी रोटी पूरन पोली हो, पच्चड़ी के बारे में कहा जाता
है कि खाली पेट इसके सेवन से चर्म रोग दूर होने के साथ-साथ मनुष्य का स्वास्थ्य बेहतर होता है, वहीं मीठी रोटी भी गुड़, नीम के फूल, इमली, आम आदि से बनाई जाती है, इसी दिन चूंकि नवरात्र भी आरंभ होते हैं इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है जो कि दुर्गा पूजा के साथ रामनवमी के दिन समाप्त होता है, इस दिन लोगों अपने घरों की सफाई कर रंगोली, बंदनवार आदि से घर के आंगन व द्वार को सजाते हैं।
घर के आगे एक गुड़ी यानि झंडा रखा जाता है, इसी में एक बर्तन पर स्वास्तिक चिन्ह बनाकर उस पर रेशम का कपड़ा लपेट कर उसे रखा जाता है, पारंपरिक वस्त्र पहने जाते हैं। सूर्यदेव की आराधना की जाती है, इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्त्रोत, देवी भगवती के मंत्रों का जाप भी किया जाता है।

डॉ. प्रेमचंद तिवारी शिक्षक सेना के बने जिलाध्यक्ष

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ठाणे: प्राचार्य डॉ प्रेमचंद तिवारी की नियुक्ति महाराष्ट्र राज्य शिक्षक सेना हिंदी माध्यमिक विद्यालय के ठाणे जिला अध्यक्ष पद पर की गई है। महाराष्ट्र शिक्षक सेना के अध्यक्ष जे एम अभ्यंकर ने इसकी नियुक्त प्रदान की है। तिवारी को अध्यक्ष बनाए जाने पर इनका अभिनन्दन जिले के पालकमंत्री एकनाथ शिंदे, समाज सेवी व शिक्षाविद नानजीभाई ठक्कर, ज्ञानेश्वर म्हात्रे, पूजा कुलकर्णी, प्रवीण पाटिल, गोकुल पाटिल आदि ने किया है।

आखिर शर्त क्या है

हिम्मत करें इन्सां तो क्या कर नहीं सकता

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नवी मुंबई: मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया, जब दिल में हो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, तो मंजिल खुद ब खुद अपनी राह दिखा देती है, बस व्यक्ति का हौसला बुलंद होना चाहिए। लीवर कैंसर से ग्रसित हिम्मत भाई सोमैया ने जो कर दिखाया है, वह सच में काबिले तारीफ रहा।
नवी मुंबई के कोपर खैराने में १९९६ में सिडको ने लोहाणा समाज के नाम पर भूखंड आवंटित किया, लेकिन भवन निर्माण का कार्य शुरू नहीं होने के कारण सिडको ने १९९८ में नोटिस जारी किया, भूखंड को बचाने एवं समाज के अस्तित्व के साथ-साथ भवन तैयार करने की चुनौती लोहाणा समाज के सामने थी, लेकिन आर्थिक व्यवस्था के कारण भवन निर्माण के लिए अड़चन थी, तब समाज के लोगों से मिलकर धन एकत्रित करने का बीड़ा उठाया, उसी दरम्यान समाज के आधार स्तंभ महेंद्र भाई घेलाणी से मुलाकात हुई और वे भवन निर्माण के लिए पिलर बनकर खड़े हो गए।
आज कोपर खैराने सेक्टर-१० में लोहाणा समाज का पांच मंजिला ईमारत लोहाणा समाज की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बन चुका है, जहां-जहां हम जाते हैं, गाथा रघुवंश की सुनाते हैं, रघुवंश हमारा कुल गौरव, यह बात सभी को बताते हैं।
लोहाणा समाज के ट्रस्टी हिम्मत सोमैया को १९८५ में लिवर वैंâसर होने की जानकारी चिकित्सकों ने दी तो वे इलाज के लिए टाटा हॉस्पिटल गए जहां डॉक्टर जी.के.ठक्कर से उनकी मुलाकात हुई, डॉक्टर ठक्कर ने उन्हें बताया कि उनके पास समय कम है, इसलिए मुंबई शहर की घनी आबादी को छोड़कर लोनावला व खंडाला में जाकर रहे, तब उन्होंने नवी मुंबई शहर को चुना और वाशी में आकर किराए के मकान में रहने लगे, धीरे-धीरे समाज के लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया, उसके बाद समाज के संगठन बनाने की कोशिश शुरू हो गई, लोग एकजुट होने लगे तब इनके पास बैठने या सभा करने की जगह नहीं थी, तो वाशी सेक्टर-९ स्थित दैवज्ञ भवन में उठने-बैठने एवं सभा करने के लिए जगह उपलब्ध कराई गई, वहीं से २१ लोगों ने मिलकर समाज के संगठन का निर्माण किया और वर्ष १९८६ में लोहाणा समाज का गठन हुआ, इसके बाद यह कारवां आगे बढ़ता चला गया।


जमीन वापस लेने के नोटिस ने जाग्रत किया

सिडको ने १९९६ में समाज को भवन के लिए कोपर खैराने में जमीन उपलब्ध कराई, लेकिन भवन का निर्माण कार्य शुरू नहीं होने के कारण १९९८ में सिडको ने जमीन वापस लेने के लिए नोटिस जारी किया, उस समय समाज के लोगों की चिंता इसलिए बढ़ गई थी कि उनके पास भवन निर्माण के लिए पैसे नहीं थे, अगर भवन का काम शुरू नहीं किया गया तो जमीन हाथ से निकल जाएगी तब मुंबई में रहने वाले महेंद्र भाई सॉलिसिटर ने २१ लाख रूपए का सहयोग दिया, साथ ही २१ लाख रूपए समाज के अन्य लोगों से मदद दिलवाई, इस तरह से समाज के पास लगभग ५० लाख रूपए जमा हो गए।

पहले श्मशान भूमि का कराया जीर्णोद्धार

भवन निर्माण की तैयारी शुरू हुई, तभी समाज के एक वृद्ध व्यक्ति की मौत हो गई और जब उनके अंतिम संस्कार के समय देखा गया कि तुर्भे स्थित श्मशान भूमि की हालत इतनी दयनीय थी कि नीचे उतरने में लोगों को डर लगता था, यह नजारा देख भवन निर्माण के कार्य को पीछे धकेल दिया गया और समाज की तरफ से वहीं पर श्मशान भूमि को सुधारने के लिए पांच लाख रूपए देने की घोषणा की गई, उसके बाद तो कई लोगों ने मिलकर ३५ लाख रूपए जमा किए, नवी मुंबई में तुर्भे श्मशान भूमि का कायाकल्प हो गया। लोहाणा समाज के भवन का निर्माण वर्ष २००३ में पूरा हुआ था।


वृद्ध व्यक्तियों के लिए तीर्थ यात्रा

संगठन की ओर से वृद्ध लोगों को तीर्थ यात्रा पर ले जाने की व्यवस्था कराई जाती है, नवी मुंबई में २२ स्कूलों के लगभग दो सौ मुकबधिर व अपंग छात्रों के लिए हर साल अप्रैल में चार घंटे के लिए संगीत का आयोजन कर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है, कैंसर के ११ बच्चों को पूरे महीने का खर्च समाज की तरफ से दिया जाता है, बच्चों को कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर, कर्राटा क्लासेस और समाज के बच्चों को कल्चर ट्रेनिंग, क्रिकेट स्पर्धा, ड्रॉइंग कम्पटीशन, वृद्ध पति-पत्नी के लिए प्रोग्राम, युवक-युवती की शादी के लिए आयोजन, नवरात्रि, झूलेलाल जयंती, गायत्री परिवार की तरफ से गायत्री पाठ का आयोजन जैसी अन्य गतिविधियां संचालित की जाती हैं।


मुंबई में ४० यूनिट कर रही है सेवा का कार्य

मुंबई में समाज की ४० यूनिट लोगों की सेवा कर रहा है, लोहाणा समाज भवन की तीसरी मंजिल पर सभी वर्ग के लोगों के लिए पैथोलॉ जी लैब, जहां आंख, दंत चिकित्सा, एक्सरे, हॉर्ट, ऑर्थोपेडिक के डॉक्टर मौजूद रहते हैं, मरीजों से मामूली राशि बतौर शुल्क ली जाती है, तल मंजिल एवं पहले मंजिल पर बने हॉल को शादी समारोह व सभा आयोजन के लिए किराए पर दिया जाता है, दूसरी मंजिल पर कांप्रेंâस हॉल, चौथे माले पर १० रूम और पांचवें मंजिल पर मंदिर तैयार किया गया है, समाज की तरफ से सभी वर्ग के छात्रों के लिए पहली कक्षा से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक निशुल्क पुस्तकें दी जाती है।
विद्यार्थी पढ़ाई पूरी होने के बाद किताबों को वापस कर देते हैं, मृत व्यक्ति का परिवार यदि दाह संस्कार करने में सक्षम नहीं है तो उसकी पूरी सहायता समाज की तरफ से की जाती है, मृत्यु के बाद शव रखने के लिए जरूरत पड़ी तो नि:शुल्क फ्रीजर की व्यवस्था कराई जाती है।


इन लोगों की रही महत्वपूर्ण भूमिका

लोहाणा समाज की नींव रखने और समाज को आगे बढ़ाने में महेंद्र घेलाणी, मोहन ठक्कर, हिम्मत सोमैया, मीनाक्षी रूपारेल, धरमजी पालन, मगन सेठिया, संजय डी. पालन, धर्मेंद्र बी. कारिया सहित अन्य लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

-लोहाणा समाज

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