रामनवमी पर्व का महत्व, पूजा विधि और पूजन मुहूर्त

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रामनवमी पर्व का महत्व, पूजा विधि और पूजन मुहूर्त चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इस दिन पूरे देश भर में श्रीराम जन्मोत्सवों की धूम रहती है, साथ ही हिंदुओं के लिए यह दिन अंतिम नवरात्र होने के कारण भी काफी महत्वपूर्ण होता है।
चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इस दिन को रामनवमी के नाम से मनाया जाता है, इस वर्ष यह पर्व २५ मार्च को पड़ रहा है। रामनवमी हिंदुओं के लिए बहुत महत्व का पर्व है, इस दिन पूरे देश भर में श्रीराम जन्मोत्सवों की धूम रहती है, साथ ही यह दिन अंतिम नवरात्र होने के कारण भी काफी महत्वपूर्ण होता है, इस दिन देवी की विशिष्ट पूजा, हवन और कन्या पूजन भी किया जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने अमर काव्य रामचरितमानस की रचना भी इसी दिन अयोध्या में आरम्भ की थी, अयोध्या नगर और रामभक्तों के लिए तो यह पर्व काफी महत्ता रखता है और इस पर्व को देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदुओं के बीच आनंद और उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।
इस तरह करें पूजन पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था, यही कारण है कि इस दिन तीसरे प्रहर तक व्रत रखा जाता है और दोपहर में ही मनाया जाता है राम महोत्सव। आज के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और रामचरितमानस की पूजा करनी चाहिए, भगवान श्रीराम की मूर्ति को शुद्ध पवित्र ताजे जल से स्नान कराकर नवीन वस्त्राभूषणों से सज्जित करें और फिर धूप दीप, आरती, पुष्प, पीला चंदन आदि अर्पित करते हुए भगवान की पूजा करें। रामायण में वर्णित श्रीराम जन्म कथा का श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ और श्रवण तो इस दिन किया ही जाता है अनेक भक्त रामायण का अखण्ड पाठ भी करते हैं। भगवान श्रीराम को दूध, दही, घी, शहद, चीनी मिलाकर बनाया गया पंचामृत तथा भोग अर्पित किया जाता है। भगवान श्रीराम का भजन, पूजन, कीर्तन आदि करने के बाद प्रसाद को पंचामृत सहित श्रद्धालुओं में वितरित करने के बाद व्रत खोलने का विधान है।

मर्यादा पुरुषोत्तम हैं श्रीराम
भगवान श्रीराम सदाचार के प्रतीक हैं, उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्वी पर अजेय रावण से युद्ध लड़ने के लिए आए। आज के दिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में मन्दिरों में जाते हैं और उनके जन्मोत्सव को मनाने के लिए उनकी मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। भगवान राम का जन्म स्थान अयोध्या, रामनवमी त्यौहार के अनुष्ठान का केंद्र बिन्दु है, यहां राम जन्मोत्सव से संबंधित रथ यात्राएं बहुत से मंदिरों से निकाली जाती हैं। अयोध्या का तो रामनवमी पर लगने वाला चैत्र रामनवमी मेला काफी प्रसिद्ध है जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं।
भगवान श्रीराम जीव मात्र के कल्याण के लिए अवतरित हुए थे, वह हिन्दू धर्म में परम पूज्य हैं, हिन्दू धर्म के कई त्यौहार जैसे रामनवमी, दशहरा और दीपावली, राम की जीवन-कथा से जुड़े हुए हैं, श्रीराम आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र, आदर्श स्वामी, आदर्श वीर, आदर्श देश सेवक होने के साथ ही साथ साक्षात परमात्मा भी थे। भगवान श्रीराम ने त्रेतायुग में देवताओं की प्रार्थना सुनकर पृथ्वी का भार हरण करने के लिए अयोध्यापति महाराज दशरथ के यहां चैत्र शुक्ल नवमी के दिन जन्म लिया और राक्षसों का वध कर त्रिलोक में अपनी कीर्ति को स्थापित किया।

व्रत कथा
राम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे थे। सीता जी और लक्ष्मण को थका हुआ देखकर राम जी ने थोड़ा रुककर आराम करने का विचार किया और एक बुढिया के घर गए। बुढिया सूत कात रही थी। बुढिया ने उनकी आवभगत की और बैठाया, स्नान-ध्यान करवाकर भोजन करवाया। राम जी ने कहा- बुढिया माई, ‘पहले मेरा हंस मोती चुगाओ, तो मैं भी करूं।’ बुढिया बेचारी के पास मोती कहां से आता जो कि सूत कात कर गुजारा करती थी। अतिथि को ना कहना भी वह ठीक नहीं समझती, दुविधा में पड़ गई, अत: दिल को मजबूत कर राजा के पास पहुंच गईं और अंजली मोती देने के लिये विनती करने लगीं, राजा अचम्भे में पड़ा कि इसके पास खाने को दाने नहीं हैं और मोती उधार मांग रही है, इस स्थिति में बुढिया से मोती वापस प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं उठता, आखिर राजा ने अपने नौकरों से कहकर बुढिया को मोती दिला दिये।
बुढिया मोती लेकर घर आई, हंस को मोती चुगाए और मेहमानों की आवभगत की, रात को आराम कर सवेरे राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी जाने लगे।
राम जी ने जाते हुए उसके पानी रखने की जगह पर मोतियों का एक पेड़ लगा दिया, दिन बीतते गये और पेड़ बड़ा हुआ, पेड़ बढ़ने लगा, पर बुढिया को कुछ पता नहीं चला।
मोती के पेड़ से पास-पड़ोस के लोग चुग-चुगकर मोती ले जाने लगे। एक दिन जब बुढिया उसके नीचे बैठी सूत कात रही थी, तो उसकी गोद में एक मोती आकर गिरा। बुढिया को तब ज्ञात हुआ, उसने जल्दी से मोती बांधे
और अपने कपड़े में बांधकर वह किले की ओर ले चली, उसने मोती की पोटली राजा के सामने रख दी, इतने सारे मोती देख राजा अचम्भे में पड़ गया, उसके पूछने पर बुढिया ने राजा को सारी बात बता दी। राजा के मन में लालच आ गया, वह बुढिया से मोती का पेड़ मांगने लगा, बुढिया ने कहा कि आस-पास के सभी लोग ले जाते हैं, आप भी चाहें तो ले लें, मुझे क्या करना है।
राजा ने तुरन्त पेड़ मंगवाया और अपने दरबार में लगवा दिया, पर रामजी की मर्जी, मोतियों की जगह कांटे हो गये और लोगों के कपड़े उन कांटों से खराब होने लगे, एक दिन रानी की ऐड़ी में एक कांटा चुभ गया और पीड़ा करने लगा, राजा ने पेड़ उठवाकर बुढिया के घर वापस भिजवा दिया, पेड़ पर पहले की तरह से मोती लगने लगे, बुढिया आराम से रहती और खूब मोती बांटती रही।

राम नवमी

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डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर एक महान विचारक

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अंबेडकर जयंती २०१९ को पूरे भारत के लोगों द्वारा १४ अप्रैल, रविवार को मनाया जायेगा।
भारत के लोगों के लिये डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस और उनके योगदान को याद करने के लिये १४ अप्रैल को एक उत्सव से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ लोगों के द्वारा अंबेडकर जयंती को मनाया जाता है, उनके स्मरणों को श्रद्धांजलि देने के लिये वर्ष २०१५ में, १२४ वाँ जन्मदिवस उत्सव था, ये भारत के लोगों के लिये एक बड़ा क्षण था, वर्ष १८९१ में उनका जन्म हुआ था, इस दिन को पूरे भारत वर्ष में सार्वजनिक अवकाश के रुप में घोषित किया गया, नयी दिल्ली, संसद में उनकी मूर्ति पर हर वर्ष भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (दूसरे राजनैतिक पार्टियों के नेताओं सहित) द्वारा सदा की तरह एक सम्माननीय श्रद्धांजलि दिया गया, अपने घर में उनकी मूर्ति रखने के द्वारा भारतीय लोग एक भगवान की तरह उनकी पूजा करते हैं, इस दिन उनकी मूर्ति को सामने रख लोग परेड करते हैं, वो लोग ढोल बजाकर नृत्य का भी आनन्द लेते हैं।

डॉ भीमराव अंबेडकर के बारे में : डॉ भीमराव अंबेडकर का जन्म १४ अप्रैल १८९१ को ब्रिटिश भारत (मध्य प्रदेश) के केन्द्रीय प्रांत के महू जिले में एक गरीब महार परिवार में हुआ था, इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था और माता का नाम भीमाबाई था, इनका निधन ६ दिसंबर १९५६ को दिल्ली में हुआ था। भारतीय समाज में अपने दिये महान योगदान के लिये वो लोगों के बीच बाबासाहेब नाम से जाने जाते थे, आधुनिक बौद्धधर्मी आंदोलन लाने के लिये भारत में बुद्ध धर्म के लिये धार्मिक पुनरुत्थानवादी के साथ ही अपने जीवन भर उन्होंने एक विधिवेत्ता, दर्शनशास्त्री, समाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, इतिहासकार, मनोविज्ञानी और अर्थशास्त्री के रुप में देश सेवा की, वो स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे और भारतीय संविधान का ड्रॉफ्ट तैयार किया था।

शुरुआती जीवन : भारत में सामाजिक भेदभाव और जातिवाद को जड़ से हटाने के अभियान के लिये उन्होंने अपने पूरे जीवनभर तक संघर्ष किया, निम्न समूह के लोगों को प्रेरणा देने के लिये उन्होंने खुद से बौद्ध धर्म को अपना लिया था जिसके लिये भारतीय बौद्धधर्मियों के द्वारा एक बोधिसत्व के रुप में उन्हें बताया गया था, उन्होंने अपने बचपन से ही सामाजिक भेदभाव को देखा था जब उन्होंने सरकारी स्कूल में दाखिला लिया था, उन्हें और उनके दोस्तों को उच्च वर्ग के विद्यार्थियों से अलग बैठाया जाता था और शिक्षक उन पर कम ध्यान देते थे, यहाँ तक कि, उन्हें कक्षा में बैठने और पानी को छूने की अनुमति भी नहीं थी, उन्हें उच्च जाति के किसी व्यक्ति के द्वारा दूर से ही पानी दिया जाता था।

शिक्षा : अपने शुरुआती दिनों में उनका उपनाम अंबावेडेकर था, जो उन्हें रत्नागिरी जिले में ‘अंबावड़े’ के अपने गाँव से मिला था, जो बाद में उनके ब्राह्मण शिक्षक, महादेव अंबेडकर के द्वारा अंबेडकर में बदल दिया गया था, उन्होंने १८९७ में एकमात्र अस्पृश्य के रुप में बॉम्बे के एलफिनस्टोन हाई स्कूल में दाखिला लिया था, १९०६ में ९ वर्ष की रामाबाई से शादी की, १९०७ में अपनी मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने सफलता पूर्वक दूसरी परीक्षा के लिये कामयाबी हासिल की। अंबेडकर साहब ने वर्ष १९१२ में बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल की। बाबा साहेब ३ साल तक हर महीने ११.५० यूरो के बड़ौदा राज्य छात्रवृत्ति से पुरस्कृत होने के बाद न्यू यार्क शहर में कोलंबिया विश्वविद्यालय में अपने परास्नातक को पूरा करने के लिये १९१३ में अमेरिका चले गये थे, उन्होंने अपनी एमए की परीक्षा १९१५ में और अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री १९१७ में प्राप्त की, १९२१ में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपनी मास्टर डिग्री और १९२३ अर्थशास्त्र में डी.एस. सी. प्राप्त की।

अंबेडकर जयंती क्यों मनायी जाती है : भारत के लोगों के लिये उनके विशाल योगदान को याद करने के लिये बहुत ही खुशी से भारत के लोगों द्वारा अंबेडकर जयंती मनायी जाती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय
संविधान के पिता थे जिन्होंने भारत के संविधान का ड्रॉफ्ट (प्रारुप) तैयार किया था, वो एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिनका जन्म १४ अप्रैल १८९१ को हुआ था, उन्होंने भारत के निम्न स्तरीय समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा की जरुरत के लक्ष्य को फैलाने के लिये भारत में वर्ष १९२३ में ‘बहिष्कृत हितकरनी सभा’ की स्थापना की थी, इंसानों की समता के नियम के अनुसरण के द्वारा भारतीय समाज को पुनर्निर्माण के साथ ही भारत में जातिवाद को जड़ से हटाने के लक्ष्य के लिये ‘शिक्षित करना-आंदोलन करना-संगठित करना’ के नारे का इस्तेमाल कर लोगों के लिये वो एक सामाजिक आंदोलन चला रहे थे।
अस्पृश्य लोगों के लिये बराबरी के अधिकार की स्थापना के लिये महाराष्ट्र के महाड में वर्ष १९२७ में उनके द्वारा एक मार्च का नेतृत्व किया गया था जिन्हें ‘सार्वजनिक चॉदर झील’ के पानी का स्वाद या यहाँ तक की छूने की भी अनुमति नहीं थी। जाति विरोधी आंदोलन, पुजारी विरोधी आंदोलन और मंदिर में प्रवेश आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत करने के लिये भारतीय इतिहास में उन्हें चिन्हित किया जाता है।
वास्तविक मानव अधिकार और राजनीतिक न्याय के लिये महाराष्ट्र के नासिक में वर्ष १९३० में उन्होंने मंदिर में प्रवेश के लिये आंदोलन का नेतृत्व किया था, उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के लोगों की सभी समस्याओं को सुलझाने के लिये राजनीतिक शक्ति ही एकमात्र तरीका नहीं है, उन्हें समाज में हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिलना चाहिये। १९४२ में वाइसराय की कार्यकारी परिषद की उनकी सदस्यता के दौरान निम्न वर्ग के लोगों के अधिकारों को बचाने के लिये कानूनी बदलाव बनाने में वो गहराई से शामिल थे।

भारतीय संविधान में राज्य नीति के मूल अधिकारों (सामाजिक आजादी के लिये, निम्न समूह के लोगों के लिये समानता और अस्पृश्यता का जड़ से उन्मूलन) और नीति निदेशक सिद्धांतों (संपत्ति के सही वितरण को सुनिश्चित करने के द्वारा जीवन निर्वाह के हालात में सुधार लाना) को सुरक्षा देने के द्वारा उन्होंने अपना बड़ा योगदान दिया। बुद्ध धर्म के द्वारा अपने जीवन के अंत तक उनकी सामाजिक क्रांति जारी रही। भारतीय समाज के लिये दिये गये उनके महान योगदान के लिये १९९० के अप्रैल महीने में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
पूरे भारत भर में वाराणसी, दिल्ली सहित दूसरे बड़े शहरों में बेहद जुनून के साथ अंबेडकर जयंती मनायी जाती है। कचहरी क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर जयंती समारोह समिति के द्वारा डॉ. अंबेडकर के जन्मदिवस उत्सव के लिये कार्यक्रम वाराणसी में आयोजित होता है, वो विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हैं जैसे चित्रकारी, सामान्य ज्ञान प्रश्न-उत्तर प्रतियोगिता, चर्चा, नृत्य, निबंध लेखन, परिचर्चा, खेल प्रतियोगिता और नाटक जिसके लिये पास के स्कूलों के विद्यार्थीयों सहित कई लोग भाग लेते हैं, इस उत्सव को मनाने के लिये, लखनऊ में भारतीय पत्रकार लोक कल्याण संघ द्वारा हर वर्ष एक बड़ा सेमीनार आयोजित किया जाता है।
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर बाबा शमशान नाथ मंदिर में तीन दिवसीय लंबा (१५ अप्रैल से १७ अप्रैल) उत्सव रखा गया, जहाँ नृत्य और संगीत के कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये थे। सुबह में जूनियर हाई स्कूल और प्राईमरी स्कूल के विद्यार्थियों ने एक प्रभात फेरी बनायी और सेकण्डरी स्कूल के विद्यार्थी इस दिन रैली में भाग लिये, कई जगहों पर, गरीब लोगों के लिये मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण और दवा उपलब्ध कराने के लिये मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण कैंप भी आयोजित किया गया था।
निम्न वर्ग समूह के लोगों के लिये अस्पृश्यता के सामाजिक मान्यता को मिटाने के लिये उन्होंने काम किया। बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत करने के दौरान उनकी सामाजिक स्थिति को बढ़ाने के लिये समाज में अस्पृश्यों को ऊपर उठाने के लिये उन्होंने विरोध किया। दलित वर्ग के जातिच्युतता लोगों के कल्याण और उनके सामाजिक-आर्थिक सुधार के लिये अस्पृश्यों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये ‘बहिष्कृत हितकरनी सभा’ कहे जाने वाले एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। ‘मूक नायक, बहिष्कृत भारत और जनता समरुपता’ जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन द्वारा उन्होंने दलित अधिकारों की भी रक्षा की, उन्होंने एक सक्रिय सार्वजनिक आंदोलन की शुरुआत की और हिन्दू मंदिरों (१९३० में कालाराम मंदिर आंदोलन) में प्रवेश के साथ ही जल संसाधनों के लिये अस्पृश्यता को हटाने के लिये १९२७ में प्रदर्शन किया। दलित वर्ग के अस्पृश्य लोगों के लिये सीट आरक्षित करने के लिये पूना संधि के द्वारा उन्होंने अलग निर्वाचक मंडल की माँग की।

१५ अगस्त १९४७ को भारत की स्वतंत्रता के बाद पहले कानून मंत्री के रुप में सेवा देने के लिये उन्हें काँग्रेस सरकार द्वारा आमंत्रित किया गया था और २९ अगस्त १९४७ को संविधान सभा के अध्यक्ष के रुप में नियुक्त किये गये जहाँ उन्होंने भारत के नये संविधान का ड्रॉफ्ट तैयार किया जिसे २६ नवंबर १९४९ में संवैधानिक सभा द्वारा अंगीकृत किया गया।
भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में इन्होंने एक बड़ी भूमिका निभायी क्योंकि वो एक पेशेवर अर्थशास्त्री थे। अर्थशास्त्र पर अपने तीन सफल अध्ययनशील किताबों जैसे ‘प्रशासन और ईस्ट इंडिया कंपनी का वित्त, ब्रिटिश इंडिया में प्रान्तीय वित्त के उद्भव और रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और समाधान’ के द्वारा हिल्टन यंग कमीशन के लिये अपने विचार देने के बाद १९३४ में भारत के रिजर्व बैंक को बनाने में वो सफल हुये, इन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की योजना में अपनी भूमिका निभायी,
क्योंकि कि उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री विदेश से हासिल की थी। देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिये औद्योगिकीकरण और कृषि उद्योग की वृद्धि और विकास के लिये लोगों को बढ़ावा दिया। खाद्य सुरक्षा लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने सरकार को सुझाव दिया था, अपनी मूलभूत जरुरत के रुप में इन्होंने लोगों को अच्छी शिक्षा, स्वच्छता और समुदायिक स्वास्थ्य के लिये बढ़ावा दिया, इन्होंने भारत की वित्त कमीशन की स्थापना की थी।
भारत के जम्मू कश्मीर के लोगों के लिये विशेष दर्जा उपलब्ध कराने के लिये भारतीय संविधान में अनुच्छेद ३७० के खिलाफ थे।

महावीर जन्मकल्याणक पर्व २०१९

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जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को ५९९ ईसवीं पूर्व बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के घर हुआ।
भगवान महावीर जी के बचपन का नाम वर्धमान था, उनके जन्म के बाद राज्य दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था, जिसके चलते इनका नाम वर्धमान रखा गया। महावीर जयंती का पर्व जैन अनुयायियों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३ वें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के १८८ वर्ष बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ था। अहिंसा परमो धर्म: अर्थात् अहिंसा सभी धर्मों से सर्वोपरि है, यह संदेश उन्होंने पूरी दुनिया को दिया व संसार का मार्गदर्शन किया, पहले स्वयं अहिंसा का मार्ग अपनाया और फिर दूसरों को इसे अपनाने के लिये प्रेरित किया ‘जियो और जीने दो’ का मूल मंत्र इन्हीं की देन है।


वर्धमान महावीर से जुड़ी मान्यताएं

जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि वर्धमान ने १२ वर्षों की कठोर तप कर अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया, जिससे उन्हें जिन कहा गया, विजेता कहा गया, उनका यह तप किसी पराक्रम से कम नहीं था, इसी के चलते उन्हें महावीर नाम से संबोधित किया गया और उनके दिखाए मार्ग पर चलने वाले जैन कहलाते हैं। जैन का तात्पर्य ही है जिन के अनुयायी, जैन धर्म का अर्थ है जिन द्वारा परिवर्तित धर्म, दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने कठिन दिगम्बर चर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे, हालाँकि श्वेताम्बर संप्रदाय के अनुसार महावीर दीक्षा उपरान्त कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति दिगम्बर अवस्था में की, ऐसा माना जाता है कि भगवान महावीर अपने पूरे साधना काल के दौरान मौन रहे।


महावीर के पांच सिद्धांत

मोक्ष पाने के बाद, भगवान महावीर ने पांच सिद्धांत दर्शाए जो समृद्ध जीवन और आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं, जिनमें शामिल हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अंतिम पांचवा सिद्धांत अपरिग्रह।


पहला सिद्धांत है अहिंसा:

इस सिद्धांत के अनुसार जैनों को किसी भी परिस्थिति में हिंसा से दूर रहना चाहिए, भूल कर भी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाना है।

दूसरा सिद्धांत है सत्य: भगवान महावीर कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ, जो बुद्धिमान सत्य के सानिध्य में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है, लोगों को हमेशा सत्य बोलना चाहिए।

तीसरा सिद्धांत है अस्तेय: अस्तेय का पालन करने वाले किसी भी रूप में अपने मन के मुताबिक वस्तु ग्रहण नहीं करते, ये लोग संयम से रहते हैं और केवल वही लेते हैं जो उन्हें दिया जाता है।

चौथा सिद्धांत है ब्रह्मचर्य: इस सिद्धांत के लिए जैनों को पवित्रता के गुणों का प्रदर्शन करने की आवश्यकता होती है; जिसके कारण वे कामुक गतिविधियों में भाग नहीं लेते।

पांचवा अंतिम सिद्धांत है अपरिग्रह:
यह शिक्षा सभी पिछले सिद्धांतों को जोड़ती है, अपरिग्रह का पालन करके, जैनों की चेतना जागती है और वे सांसारिक एवं भोग की वस्तुओं का त्याग कर देते हैं।

महावीर जन्म कल्याणक उत्सव की गतिविधियां
जैन धर्म का अनुसरण करने वाले ऐसी कई गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं जो उन्हें अपने परिजनों से जुड़ने और भगवान महावीर को याद करने का मौका देते हैं, इस दिन लोग महावीर की प्रतिमा को जल और सुगंधित तेलों से धोते हैं, यह महावीर की शुद्धता का प्रतीक है, यह नियमित पूजी जाने वाली सुंदर धार्मिक प्रतिमाओं को धोने के व्यावहारिक उद्देश्यों को भी पूरा करता है, जैनों द्वारा भगवान महावीर की प्रतिमा की शोभायात्रा निकाली जाती है, इस दौरान जैन भिक्षु एक रथ पर भगवान महावीर की प्रतिमा को लेकर हर जगह घुमाते हैं, उनके द्वारा बताये गए जीवन के सार को लोगों तक पहुँचाते हैं, महावीर जन्म कल्याणक के दौरान, दुनिया भर से लोग भारत के जैन मंदिरों में दर्शन करने के लिए आते हैं, मंदिरों में जाने के अलावा, लोग महावीर और जैन धर्म से संबंधित पुरातन स्थानों पर भी जाते हैं।
गोमटेश्वर, दिलवाड़ा, रणकपुर, सोनागिरि और शिखरजी जैन धर्म के कुछ सबसे लोकप्रिय स्थानों में से एक हैं, महावीर जन्म कल्याणक पर्व तीर्थंकर महावीर के जन्म व जैन धर्म की स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

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नाम:सलिल सरोज
पता: बी ३०२, तीसरी मंजिल
सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्स
मुखर्जी नगर
नई दिल्ली-११०००९
उम्र:३१ वर्ष
शिक्षा: सैनिक स्कूल तिलैया, कोडरमा, झारखण्ड से १०वीं और १२वीं उतीर्ण।
१२वीं में स्कूल का बायोलॉजी का सर्वाधिक अंक ९५/१०० जी डी कॉलेज, बेगूसराय, बिहार से इग्नू से अंग्रेजी में स्नातक एवं केंद्र टॉपर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से रूसी भाषा में स्नातक और तुर्की भाषा में एक साल का कोर्स और तुर्की जाने का छात्रवृति अर्जित। जीजस एन्ड मेरी कॉलेज, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली इग्नोउ से समाजशास्त्र में परास्नातक एवं नेट की परीक्षा पास।
व्यवसाय: कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा, वैज्ञानिक विभाग, नई दिल्ली में सीनियर ऑडिटर के पद पर २०१४ से कार्यरत।
सामाजिक एवं साहित्यिक सहयोग: बेगूसराय में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को अंग्रेज़ी की मुफ्त कोचिंग। मोहल्ले के बच्चों के कहानी, कविता और पेंटिंग को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय पत्रिका ‘कोशिश’ का प्रकाशन और सम्पादन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में विदेशी भाषा में स्नातक की परीक्षा के लिए ‘Splendid World Informatica’ किताब का सह लेखन एवं बच्चों को कोचिंग।
बेगूसराय बिहार एवं अन्य राज्यों के हिंदी माध्यम के बच्चों के लिए ‘Remember Complete Dictionary’ किताब का अनुवाद। बेगूसराय,बिहार में स्थित अनाथालय में बच्चों को छोटा अनुदान। बचपन में राजहंस, क्रिकेट वल्र्ड की प्रतियोगिताओं में इनाम प्राप्त। सोशल मीडिया पर सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचारों को प्रस्तुत करना।
उपलब्द्धियाँ: अमर उजाला काव्य, हिंदुस्तान समाचार पत्र, पटना, सांध्य दर्पण इंदौर, अन्तर शब्द शक्ति इंदौर, परिचय टाइम्स, विजय दर्पण टाइम्स, सरिता, पर्यटन प्रणाम सहित ८० से अधिक पत्रिकाओं, अखबार, ऑन लाइन साइट्स पर कविता, कहानी, लेख, व्यंग प्रकाशित, मातृभाषा के द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘नवांकुर’ में मेरी कविताओं को स्थान प्राप्त, रवीना प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित निभा पत्रिका और मेरी रचना काव्य संग्रह में मेरी कविताएँ शामिल।
विश्व पुस्तक मेला के दौरान ‘मेरे काव्य संग्रह’ यूँ ही सोचता हुआ’ का विमोचन।
अपने कार्यालय में हिंदी दिवस पर आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में ३ साल से प्रथम स्थान प्राप्त, आरषी फाउंडेशन,भोपाल के द्वारा विकलांगों पर आयोजिय काव्य प्रतियोगिता में अखिल भारतीय २०वां स्थान, जिसका निर्णय गुलज़ार साहब ने किया था, मातृभाषा द्वारा काव्य प्रतियोगिता में तीसरा स्थान, जिसके तहत आशीष दलाल का उपन्यास पुरस्कार के रूप में प्राप्त हुआ। दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ खेल के दौरान पर्यटन मंत्रालय के द्वारा आयोजित ‘Earn while you learn’ कार्यक्रम का सफल प्रतिभागी, आगामी ४ किताबों पर काम चालू, यु ट्यूब पर शार्ट फिल्मों में सांग्स और डायलॉग, पश्चिम मध्य रेलवे महालेखा कार्यालय की पत्रिका ‘साँची’ में कविताओं को स्थान प्राप्त, कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा, वैज्ञानिक विभाग, कोलकाता शाखा से प्रकाशित पत्रिका में रचनाओं को स्थान प्राप्त। भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा विभाग अकादमी, शिमला द्वारा मेरी फोटोग्राफी के लिए सम्मान पत्र, प्रतियोगिता दर्पण पत्रिका अंग्रेज़ी अंक में डिबेट और निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त, मेरे द्वारा किए गए ड्राइंग की सराहना और पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त।

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