आवश्यकता मूल्यपरक शिक्षा की

shiksha

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश शासन की देन है जो कि राष्ट्रीय और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह निष्फल साबित हो रही है, आजादी प्राप्त करने के बाद हमने अपनी आवश्यकता, अपनी समस्यायें अपनी संस्कृति के अनुसार शिक्षा पद्धति में कोई आमूल परिवर्तन नहीं किया, जो देश विश्व में कभी अपने आध्यात्मिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध था, वह आज चारित्रिक अवमूल्यन के लिए विश्व में ख्याति प्राप्त कर रहा है, दूषित और अपूर्ण शिक्षा का ही परिणाम है कि डिग्री लेकर हमारे युवक अवांछित गतिविधियों में लिप्त हो रह है, वे अपनी व राष्ट्र की समस्यायें हल करने के बजाय नित नई समस्यायें और पैदा कर रहे है। ऊँची डिग्री लेकर जैसे ही वे किसी रोजगार या व्यवसाय या राजनीति में प्रवेश करते हैं, दूसरों की देखा-देखी अनेक युवक भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय का सहारा लेकर अधिक से अधिक, जल्दी से जल्दी धन बटोरने की लिप्त हो जाते हैं।
शिक्षा के विस्तार और प्रगति के नाम पर आज गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले ढेरों स्कूल और कॉलेज खुल गये। पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या बढ़ गई और साक्षरता का प्रतिशत बढ़ गया, किंतु गुणात्मक का प्रतिशत लगातार घटता चला गया।
क्या इसी संख्यात्मक प्रगति को हम अपनी वास्तविक उन्नति या उपलब्धि मान सकते हैं? केवल साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने या डिग्रियाँ बांटने से हमारी समस्या का हल नहीं हो सकता, यह शिक्षा हमें अपने आप से, अपनी आत्मा से दूर ले जा रही है, हमें आध्यात्मिक निरक्षरता को भी दूर करना होगा, हमें देश के नव-निर्माण और विकास को गति देने के लिए कॉलेजों से हजारों डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, ऑफीसर आदि जरूर तैयार किये और सफेद पोश बाबुओं की विशाल फौज तैयार की किंतु इंसान बनाना ही भूल गये, इसलिए अधिकांश लोग देशहित में कार्य करने की बजाय अपने ही नव-निर्माण में जुट गये और अपने घर उजाला करने के लिए दूसरों के घर अंधेरा करने लगे, ज्ञान का दुरूपयोग कर समाज में मानव से दानव बनने लगे।
शिक्षित होने, ऊँची शिक्षा लेने का उनके ऊपर कोई असर नहीं रह गया है। निष्कर्ष यह कि विषय वस्तु का ज्ञान हमारी चरित्रगत कमजोरियों को दूर करने में सक्षम नहीं है, ऐसा खोखला और ऊपरी ज्ञान में मनुष्यत्व की ओर, देवत्व की ओर नहीं ले जा सकता।
गुणवत्ता से तात्पर्य यह नहीं है कि विषय वस्तु का उत्तम ज्ञान हो और न इसका अभिप्राय यह है कि प्रथम श्रेणी या मेरिट में अधिक से अधिक छात्र उत्तीर्ण हों बल्कि उनके अन्तर्निहित चारित्रिक मूल्यों से है। मेरिट में उत्तीर्ण होने वाला छात्र या अधिक प्रखर बुद्धि रखने वाला छात्र यदि अपने माता-पिता गुरूजनों का सम्मान नहीं करता, सच्चाई के पथ पर नहीं चलता, नौकरी प्राप्त कर लेने पर भ्रष्टाचार या शोषण में लिप्त हो जाता है, काम चोरी करता है, दूसरों के साथ छल-कपट पूर्ण व्यवहार करता है, समाज और राष्ट्रीय हितों के विरूद्ध कार्य करता हैं तो ऐसे छात्र का मेरिट में उत्तीर्ण होना या ऐसी बौद्धिक प्रखरता भला किस काम की, ऐसा छात्र न परिवार के लिए उपयोगी हो सकता है और न देश के लिए, जहां भी वह रहेगा अपनी बौद्धिक कुशलता का दुरूपयोग करेगा।
किसी योजना या विभाग की सफलता केवल विषय वस्तु के सैद्धान्तिक ज्ञान हो जाने के ऊपर ही निर्भर नहीं करती बल्कि उस योजना के क्रियान्वयन में, विभाग को चलाने में व्यक्ति के चारित्रिक मूल्यों का महत्वपूर्ण योगदान होता है, किंतु दुर्भाग्य यह है कि आजाद भारत में चारित्रिक मूल्यों की लगातार उपेक्षा की जाती रही। चारित्रिक विकास को शिक्षा में महत्व न दिये जाने के कारण आज डॉक्टर की डाक्टरी, इंजीनियर की इंजीनियरी, ऑफीसर की अफसरी से जनता त्रस्त है, उच्च ज्ञान से विभूषित अनेक पद और अधिकारों, शासकीय धन, राशि, सुविधाओं का हर क्षेत्र में प्राय:दुरूपयोग कर रहे हैं।
कानून तथा संविधान उन पर अंकुश लगाने में अपने आप को असहाय महसूस कर रहा है, हमारी चेतना इतनी नीचे गिर चुकी है, हमारा दैनिक जीवन चारों ओर इतना कलुषित और प्रदूषित हो गया है कि कोई भी कार्य बिना संभव नहीं है।

प्रश्न यह है कि जिनके पास न राजनीतिक अप्रोच है और न ही पैसा है वे बेचारे क्या करें? पीड़ित जनता देश की यह दुर्दशा देख कर आंसू बहा रही है, हमारे सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक, मानवीय, आध्यात्मिक प्रशासनिक और राजनीतिक सभी मूल्यों का कितना अवमूल्यन हो गया है इस पर अधिक विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, सभी भली-भांति परिचित हैं कि एक अनपढ़ व्यक्ति से लेकर उच्च शिक्षित व्यक्ति तक इस पीड़ा को अनुभव कर रहा है और विवश होकर भोग रहा है, अत: हमारे सामने एक ज्वलंत प्रश्न उठता है कि ऐसे दुख और तनाव से ग्रसित मानव जाति को कैसे छुटकारा दिलाया जाये, जबकि मनुष्य अपने ही बनाये जाल में उलझ गया है। हमारे देश में ज्वलंत समस्याओं का समाधान न तो शिक्षा के विस्तार से हो सकता है, न राजनीति के माध्यम से, न भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए तरह-तरह के आयोग बैठाने से, न सी.बी.आई. और सर्तकता आयुक्त की जगह-जगह कार्यालय खोलने से, न विभागों और मंत्रियों की संख्या बढ़ाने से, न कानून और और न फौज पलटन बढ़ाने से और न गांव-गांव थाने तथा पुलिसों की संख्या बढ़ाने से, इन सब का हश्र वही होता है कि तू डाल-डाल मैं पात-पात, उपरोक्त उपाय समस्या का स्थाई समाधान नहीं है।
ऐसे में घोर निराशा और अंधकार के माहौल में सिर्फ एक ही आशा की किरण दिखाई देती है जिससे जगत का अंधेरा दूर किया जा सकता वह आशा की किरण है-शैक्षणिक गुणवत्ता और चरित्र के विकास का। वर्तमान शिक्षा प्रणाली से गुणवत्ता और चरित्र का चिराग जलाकर परिस्थितियों पर काबू पाया जा सकता है, अर्थात शिक्षा को संस्कार से जोड़ना होगा, इसका स्थाई समाधान मनुष्य का चरित्र उठाने यानी मानवीय मूल्यों पर आधारित संस्कारित और आध्यात्मिक शिक्षा से ही सम्भव है, समस्त समस्याओं और अव्यवस्थाओं का जन्म-व्यक्ति की चरित्रहीनता के कारण ही होता है। इसलिए हमें विद्यालयों/महाविद्यालयों में युवा पीढ़ी का चरित्र गढ़ना होगा क्योंकि विद्यालय और महाविद्यालय रूपी फैक्टरी से ही लाखों युवकों को तैयार करके जीवन के हर क्षेत्र में प्रतिवर्ष आपूर्ति की जाती है।
नई पीढ़ी, नये बीज का उत्पादन या निर्माण जहां से हो रहा है, उस श्रोत को ही ठीक करना होगा। उपचार जड़ से करना होगा, अत: युवकों को योग, स्वास्थ्य संस्कार और व्यावहारिक जीवन से जुड़ी गुणात्मक और उपयोगी शिक्षा देनी होगी। आत्म परिष्कार की शिक्षा देनी होगी।

आजादी के ७१ साल बाद भी मानवीय मूल्यों के संरक्षण और विकास के लिए भारत देश में काई ठोस कार्य नहीं किया गया, मानव से निम्न चेतना को ऊपर उठाने के लिये कोई विभाग या संस्थान या ट्रेनिंग सेंटर खोलने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई।
हाँ नीचे गिराने का कार्य देश की कुटिल राजनीति और अनेक विभागों ने अवश्य किया है, हम यही सोचते रहे कि समाज सुधार करना या नैतिकता की ओर देश को मोड़ना साधु सन्यासियों का कार्य है अथवा कानून का, यह हमारी कैसी सोच है, यह कैसी विडम्बना है कि हम अपने कृत्यों से समाज को गंदा करें, उसे दुर्गन्धित करें और साधु-संत इसकी सफाई करें, जिनके हाथों में कानून की रक्षा का दायित्व है यदि वे हाथ ही गंदे हों तो फिर समस्या का इलाज क्या है?
समस्या का दूसरा पहलू यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ रहे हों या अपने स्वार्थ में कानून को बदलवाने का प्रयास कर रहे हों या न्याय देने वाली न्यायपालिका को धमकी दे रहे हों तो मनुष्य को सही रास्ते पर चलने का उपाय क्या है? ऐसी स्थिति में सही न्याय और समय पर न्याय पाने की आशा वैâसे की जा सकती है? ऐसा दुस्साहस का कार्य प्राय: वही लोग करते हैं जिनके पास पर्याप्त दौलत होती है या जिन्हें राजनीति संरक्षण प्राप्त है, तात्पर्य यह कि अब लोगों को कानून, संसद, संविधान और न्यायपालिका का भय भी समाप्त होता जा रहा है, इन सब घटनाओं का प्रभाव पूरे देश के चरित्र पर पड़ता है, हमारी सारी समस्या वास्तव में चरित्र से जुड़ी हुई है और व्यक्तिगत समस्या को कानून और पुलिस के भय से कभी सुधारा नहीं जा सकता, अत: चरित्रगत दोषों में सुधार लाने के लिये आज आध्यात्मिक शिक्षा, यौगिक शिक्षा और सांस्कारिक शिक्षा की नितांत आवश्यकता है, हमें अपना चरित्र सुधारने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।
उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी, बच्चों को उनकी मर्जी पर या प्रकृति के भरोसे न छोड़कर उन्हें संस्कारित करना होगा, न केवल विद्यालय में बल्कि घर में भी माता-पिता को उचित संस्कार देने होंगे, इतना ही नहीं परिणय सूत्र में बंधते समय ही वर-वधू को अग्नि को साक्षी मानकर यह प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि वे संस्कार हीन बच्चे नहीं पैदा करेंगे, जो पुरूष और स्त्री अपने बच्चे को अच्छा संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते उन्हें विवाह कदापि नहीं करना चाहिए, संस्कार विहिन बच्चे पैदा करके इस समाज या सरकार पर थोपें और धरती को बोझित करें यह राष्ट्रीय अपराध है, यह अनैतिक कार्य भी है। गलती माता-पिता करें और सरकार उन्हें सुधारे।
यह सोच नहीं है, संस्कारों का निर्माण बचपन से ही करना होता है तभी संस्कारों का वृक्ष बड़ा होकर पुख्ता और मजबूत बनता है, इसकी नींव बचपन में ही डालनी होती है अर्थात् मानवीय मूल्यों के नन्हें पौधों का बीजारोपण किशोरवस्था से ही प्रारम्भ होगा क्योंकि कोरे कागज पर कुछ भी लिखा जा सकता है किंतु जो पहले ही लिखा जा चुका है, उसे मिटाना और पुन: लिखना कठिन होता है, छोटे पौधों को मनचाही दिशा में झुकाया जा सकता है, उसकी कांट-छांट करके वांछित आकार-प्रकार दिया जा सकता है किंतु बड़े होने पर उस पौधे को झुकाना कठिन होता है, ठीक इसी प्रकार छोटे बच्चों को वांछित दिशा में मोड़कर उनके अंदर वांछित संस्कार भरे जा सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ का हुआ सम्मान
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बिजय कुमार जैन का सम्मान करते हुए प्रसिद्ध समाजसेवी मोतीलाल ओसवाल, भारत जैन महामण्डल के अध्यक्ष के .सी. जैन (सी. ए.) के साथ उपस्थित कई -कई समाज सेवी

मुंबई: मानव सेवा, समाज सेवा, राष्ट्र सेवा ही जिसका धर्म है जिसको पिछे मुड़कर देखना ही नहीं आता, उसका सम्मान तो होना ही चाहिए था, उसी कड़ी में १६ अप्रैल २०१९ को महावीर जन्मकल्याणक पर्व की पूर्व संध्या पर समाज के विशिष्ट लोगों द्वारा सम्मान किया गया, उस शख्सियत का नाम है बिजय कुमार जैन, जिन्हें कई-कई बार उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए पूर्व में भी सम्मानित भी किया है, क्योंकि बिजय जी ‘जिनागम फाउंडेशन’ के ट्रस्टी अध्यक्ष के साथ उनकी लेखनी ने कई-कई कीर्तिमान रचे हैं जैसे कि ‘जैन एकता’ राजस्थानी एकता, भारत की बनें राष्ट्रभाषा, भारत को भारत बोला जाए, राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में द़र्ज किया जाये, ऐसे कई-कई कार्यों के लिए बिजय जी का सम्मान किया जाता रहा है, जिसके लिए समस्त जैन समाज की पत्रिका ‘जिनागम’, राजस्थान समाज की विश्वस्तरीय पत्रिका ‘मेरा राजस्थान’, राजनीति क्षेत्र की विश्वस्नीय ‘मैं भारत हूँ’ व मुंबई का हृदय कहे जाने वाले अंधेरी को स्वच्छ व सुंदरता के लिए प्रयासरत ‘ईस्ट वेस्ट अंधेरी टाईम्स’ परिवार शुक्रगुजार है।

महाराष्ट्र राज्य की स्थापना १ मई १९६०

महाराष्ट्र राज्य का संक्षिप्त परिचय
राजधानी : मुम्बई
जिले : ३५
भाषा : मराठी, हिंदी, अंग्रेजी
महाराष्ट्र भारत के सबसे अधिक औद्योगिक राज्यों में से एक है, यह देश के पश्चिमी और मध्य भाग में स्थित है, यहाँ विस्तृत सह्याद्री पहाड़ी है। अरब सागर तट पर ७२० किलोमीटर की एक सुंदर पृष्ठभूमि वाले महाराष्ट्र में एक विशाल आकर्षण है। महाराष्ट्र की स्थापना १ मई १९६० को हुई थी।
महाराष्ट्र का भूगोल – आंध्र प्रदेश के उत्तरी और मध्य प्रदेश के पश्चिमी छोर पर बसा महाराष्ट्र अरब सागर से घिरा है, इस क्षेत्र की अनूठी विशेषता मुकुट पठार की एक श्रृंखला है। अरब सागर और सह्याद्री रेंज के बीच कोंकण सिर्फ ५० कि.मी. चौड़ा और २०० मीटर नीचे ऊँचाई के साथ संकीर्ण तटीय तराई है। तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है उत्तरी सीमा पर सतपुडा पहाड़ियां और भामरागढ़-चिरौली-गायखुरी पर्वतमाला।

महाराष्ट्र का संक्षिप्त इतिहास – अहमदनगर जिले में महाराष्ट्र की प्राचीन सभ्यता के कई सबूत मिलते हैं। ६४०-६४१ (ईसा पूर्व) में इस क्षेत्र का दौरा करने वाले चीनी यात्री ह्यूंत्सांग ने इस क्षेत्र की समृद्धि की काफी सराहना की थी। तीसरी और चौथी शताब्दी (ईसा पूर्व) के दौरान कोंकण के क्षेत्र में व्यापार स्थापित था, बौद्ध के समय में काफी प्रगति हुई फिर मौर्य शासन हुआ। महाराष्ट्र की संस्कृति और कला का एक बड़ा केंद्र था राष्ट्रकूट। मौर्य शासन के विघटन के बाद कालक्रमानुसार मुस्लिम शासन मतबूत हुआ। महाराष्ट्र में मुगल शासन के मुंहतोड़ ज़वाब में सक्रिय रहे छत्रपति शिवाजी। शिवाजी मराठवाड़ा के पहले महान शासक थे, उन्होंने महाराष्ट्र स्वतंत्रता, स्वाभिमान व विकास के मार्ग प्रशस्त किये। शिवाजी की वीरता और महानता अभी भी इस प्रदेश के लोगों द्वारा याद की जाती है।

महाराष्ट्र सरकार – वर्तमान में देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं।
महाराष्ट्र के जिले – महाराष्ट्र राज्य छ: डिवीजनों में विभक्त है, जो ३५ जिलों से बना है।
१) अमरावती क्षेत्र: अकोला, अमरावती, बुलढाना, वाशिम और यवतमाल
२) औरंगाबाद क्षेत्र (मराठवाड़ा) : औरंगाबाद, बीड, हिंगोली, जालना, लातूर, नांदेड़, उस्मानाबाद और परभणी
३) कोंकण क्षेत्र : मुम्बई शहर, मुम्बई उपनगरीय, रायगढ़, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और ठाणे
४) नासिक क्षेत्र : अहमदनगर, धुले, जलगांव, नंदुरबार और नासिक

५) नागपुर क्षेत्र : भंडारा, चंद्रपुर, गढ़चिरौली, गोंदिया, नागपुर और वर्धा
६) पुणे क्षेत्र : कोल्हापुर, पुणे, सांगली, सतारा और शोलापुर।

महाराष्ट्र में अर्थव्यवस्था – महाराष्ट्र भारत की अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख स्थान रखता है। भारत की इस वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में देश के सभी प्रमुख औद्योगिक/कॉर्पोरेट घरानों की उपस्थिति है। महाराष्ट्र तिलहन के अलावा मूँगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन आदि के साथ कपास, गन्ना, हल्दी और सब्जी जैसी फसलें पैदा करता है। बागवानी-खेती का भी यहाँ विशाल क्षेत्र है।
महाराष्ट्र संबंधी जानकारी – महाराष्ट्र राज्य का दर्शकों के मन और आत्मा पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। अन्य स्थलों में औरंगाबाद, खंडाला, लोनावाला, महाबलेश्वर, माथेरान, मुम्बई, नासिक, पुणे, संजय गांधी नेशनल पार्क, शिरडी, गणपति पुले, कारला गुफाएं आदि दर्शनीय व महत्वपूर्ण स्थान हैं।
महाराष्ट्र की नदियाँ : अरब सागर में कई छोटी नदियों के दााोत हैं।
तापी, नर्मदा व वाण गंगा आदि नदियाँ है, इन सबका प्रवाह बंगाल की दिशा में है।
महाराष्ट्र में शिक्षा – महाराष्ट्र अपने उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए जाना जाता है। मुम्बई किसी भी क्षेत्र में बेहतर शिक्षा के लिए सबसे अच्छी जगह है। मुम्बई के अलावा ठाणे जैसे अन्य स्थानों- नासिक, पुणे, अहमदनगर, नागपुर, औरंगाबाद, सांगली, उस्मानाबाद, वसई, जलगांव, डोम्बिवली, कोल्हापुर और कराड आदि जिलों में प्रसिद्ध संस्थान हैं। महाराष्ट्र में स्कूल या तो नगर निगम द्वारा या निजी ट्रस्टों और व्यक्तियों द्वारा चलाए जा रहे हैं। निजी स्कूलों में बेहतर सुविधाओं और शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को शहरों में रहने वाले लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है। सभी निजी स्कूलों के अलावा महाराष्ट्र राज्य एसएससी बोर्ड या माध्यमिक शिक्षा (आईसीएसई) और सीबीएसई बोर्ड अखिल भारतीय प्रमाणपत्र के साथ संबद्ध हैं।
राज्य इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे क्षेत्रों के लिए भी बहुत ही अच्छा है। उपरोक्त क्षेत्रों के लिए संस्थानों की बड़ी संख्या हैं। महाराष्ट्र राज्य में ३१ जिलों में ३९ विश्वविद्यालय हैं जो केंद्रीय, राज्य या डीम्ड श्रेणी में आते हैं।
महाराष्ट्र विशेष – कई मायनों में महाराष्ट्र की संस्कृति भी अपने स्थानीय भोजन में परिलक्षित होती है। ज्यादातर लोग महाराष्ट्रीय व्यंजनों से बहुत परिचित नहीं हैं। एक बड़े और रोचक पाक प्रदर्शनी की सूची यहाँ मौजूद हैं। महाराष्ट्रीय भोजन में कोंकणी और वराडी दोनों प्रचलित है। नारियल तेल व्यापक रुप से खाना पकाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।
मूंगफली तेल का उपयोग मुख्यरुप से खाना पकाने के उपयोग में किया जाता है। कोकम का एक मनभावन मीठा और खट्टा स्वाद होता है।
एक गहरे बैंगनी बेर का इसमें इस्तेमाल होता है। क्षुधावर्धक-पाचक के रुप में कोकम का इस्तेमाल होता है। ठंडा परोसा जाता है। समुद्री भोजन के अलावा, सबसे लोकप्रिय मछली बोंबिल है। सभी मांसाहारी और शाकाहारी व्यंजन उबले हुए चावल या चावल के आटे से बनी मुलायम रोटियों (भाकड़ी) के साथ खाया जाता है। विशेष चावल-पूरी, एक उड़द की दाल और सूजी से बनी पैनकेक भी मुख्य भोजन के रुप में खाया जाता है। शाकाहारी में सबसे लोकप्रिय सब्जी बैंगन है। महाराष्ट्रीयन ज्यादा भूना हुआ या तला हुआ खाना पसंद करते हैं। बड़ा, इडली, सांभर भी महाराष्ट्रीयन काफी पसंद करते हैं, उनका आहार पापड़ के बिना अधूरा है। यहाँ मछुआरों के समाज को ‘कोली’ कहा जाता है। मछलियों का व्यवसाय ही उनकी आजीविका है। महाराष्ट्र में मजबूत ब्राह्मण प्रभाव भी है, यहाँ संस्कृत शिक्षा के केंद्र भी हैं।
नव बौद्ध विचारों के अनुयायी भी यहाँ काफी संख्या में हैं और वे आंबेडकर वादी हैं। महाराष्ट्र में सबसे प्रसिद्ध हस्तशिल्प के लिए कोल्हापुरी चप्पल और पैठानी साड़ियाँ है। महाराष्ट्र अच्छी तरह से अपने समृद्ध संगीत और नृत्य के लिए भी विश्व भर में जाना जाता है।
राज्य में लोक संगीत का खास चलन है। महाराष्ट्रीयन समाज संगीत के क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्व और योगदान करते हैं। राज्य के मध्ययुगीन काल में संगीत रत्नाकर के रुप में भारतीय संगीत के सबसे बड़े ग्रंथ के लेखक थे शारंग देव। लता मंगेशकर, पंडित जसराज, भीमसेन जोशी जैसे भारतीय संगीतकारों के अलावा किशोरी अमोनकर भी महाराष्ट्र के गौरवस्तंभ हैं। महाराष्ट्र में थिएटर की परंपरा आज भी है।

महाराष्ट्र के त्योहार – भारत के मुख्य त्योहारों के अलावा महाराष्ट्र गणेश चतुर्थी और गुडी पाड़वा खास तौर पर बड़ी धूमधाम से मनाता है। दुर्गा पूजा के समय में दस दिन की पूजा होती है, बहुत ज्यादा उत्साह के साथ यह पर्व मनाया जाता है। महाराष्ट्र के नए साल की शुरुआत के रुप में ‘गुडी पाडवा’ काफी महत्वपूर्ण है।
महाराष्ट्र की पोशाक – महाराष्ट्र की महिलाओं की साड़ी उत्तर भारत में पहनी जानेवाली साड़ी से काफी अलग है, जो ‘नवारी’ के नाम से जानी जाती है, जो नौ गज की होती है। साड़ी, झुमके, भारी हार और चूड़ियों को काफी पसंद किया जाता है। छोटी लड़कियां पार्कर-पोल्का पहनती है, एक पार्कर लंबा परिधान स्कर्ट की तरह है और पोल्का हरे, लाल या नीले रंग का होता है जो पारंपरिक महाराष्ट्रीयन कपड़े से बना एक ठेठ ब्लाउज है। कुर्ते के साथ धोती आम पुरुषों के वस्त्र हैं। पुरुषों द्वारा हाल ही में सामरा नामक एक पारंपरिक शर्ट पहनी गयी थी, यहाँ सिर पर पगड़ी भी पहनते हैं। शहरी केंद्रों में ज्यादातर पुरुष पैंट और कमीज की तरह आधुनिक कपड़े पहनते हैं और औरतें विशेष सामाजिकत्योहारी अवसरों पर पारंपरिक वस्त्रों के अलावा आधुनिक कपड़े भी पहना करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस का इतिहास और उत्पत्ति
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अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस विश्व स्तर का एक बड़ा उत्सव है और इसे १ मई १८८६ के दिन को याद करने के लिये मनाया जाता है, शिकागो में हेयरमार्केट घटना के कारण (हेयरमार्केट हत्याकाण्ड)। ये उस वर्ष की एक बड़ी घटना थी जब मज़दूर अपने आठ घंटे के कार्य-दिवस के लिये आम हड़ताल पर थे और पुलिस आम लोगों को भीड़ से तितर-बितर करने का अपना कार्य कर रही थी। अचानक से, एक अनजाने व्यक्ति के द्वारा भीड़ पर एक बम फेंका गया और पुलिस ने गोली चलाना शुरु कर दिया, जिसमें चार प्रदर्शनकारी मारे गये।
घटना के बारे में वास्तविक वक्तव्य है: ‘भरोसेमंद गवाहों ने बयान दिया है कि सड़क के बीच से बंदूकों से गोली आयी है, जहाँ पुलिस खड़ी थी, और भीड़ से कोई नहीं था, इसके अलावा, प्रारंभिक अखबार की रिपोर्ट ने आम नागरिकों के द्वारा गोली चलाने की कोई बात वर्णित नहीं की गयी थी, घटनास्थल पर एक तार का खंभा गोलियों के छेद से भरा पड़ा था, सभी पुलिस की दिशा की ओर से आ रहे थे।’
रेमण्ड लेविग्ने के द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से पेरिस के मीटिंग में (१८८९ में) मई दिवस के रुप में वार्षिक आधार पर इसे मनाने का फैसला किया गया कि शिकागो विद्रोह के वर्षगाँठ को मनाने के लिये अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन की जरूरत है। वर्ष १८९१ में, वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने के लिये दूसरे अंतरराष्ट्रीय काँग्रेस के द्वारा मई दिवस को अधिकारिक स्वीकृति मिली थी।
हालाँकि, मई दिवस दंगा वर्ष १८९४ में और फिर १९०४ में हुआ, एम्सटर्डम के अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में निम्नलिखित वक्तव्य दिया गया ‘आठ घंटे के दिन के कानूनी स्थापना के लिये पहली मई को प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शन के लिये सभी देशों के समाजिक लोकतांत्रिक पार्टी संगठन और व्यापार यूनियनों, मजदूर वर्ग के श्रेणीबद्ध माँग के लिये, वैश्विक शांति के लिये और पहली मई को काम रोकने के लिये सभी देशों के मजदूर संगठनों के ऊपर बाध्यकारी है, इसे घोषित किया गया।’

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मई दिवस क्यों मनाया जाता है?
आठ घंटे के कार्य दिवस की जरुरत को बढ़ावा देने के लिये साथ ही संघर्ष को खत्म करने के लिये अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है, पूर्व में मजदूरों की कार्य करने की स्थिति बहुत ही कष्टदायक थी और असुरक्षित परिस्थिति में भी १० से १६ घंटे की कार्य-दिवस था। १८६० के दशक के दौरान मजदूरों के लिये कार्यस्थल पर मृत्यु, चोट लगना और दूसरी डरावनी परिस्थिति बेहद आम बात थी और पूरे कार्य-दिवस के दौरान काम करने वाले लोग बहुत क्षुब्ध थे जब तक कि आठ घंटे का कार्य-दिवस घोषित नहीं कर दिया गया।
बहुत सारे उद्योगों में श्रमिक वर्ग के लोग (पुरुष, महिला और बच्चे) की बढ़ती मृत्यु, उद्योगों में उनके काम करने के घंटे को घटाने के द्वारा कार्यकारी दल के लोगों की सुरक्षा के लिये आवाज उठाने की जरुरत थी। मजदूरों और समाजवादियों के द्वारा बहुत सारे प्रयासों के बाद, मजदूरों की अमेरिकन संघ के द्वारा १८८४ में शिकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के लिये वैधानिक समय के रूप में ‘आठ घंटे’ घोषित किया गया।
हेयमार्केट हत्याकाण्ड के दौरान बहुत सारे लोगों ने अपने जीवन का बलिदान किया था जो मजदूरों की हड़ताल के दौरान शिकागो में हुआ था। कार्यकारी समूह के लोगों की समाजिक और आर्थिक उपलब्धियों को बढ़ावा देने के साथ ही हेयमार्केट नरसंहार की घटना को याद करने के लिये ‘मई दिवस’ मनाया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस कैसे मनाया जाता है
मजदूरों की उपलब्धियों को मनाने के लिये पूरे विश्व भर में एक आधिकारिक अवकाश के रुप में वार्षिक तौर पर अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। बड़ी पार्टी और ढेर सारे कार्यक्रमों का प्रबंधन कर लोग मई दिवस या मजदूर दिवस को खुशी से मनाते हैं। स्वतंत्रता दिवस उत्सव की तरह वो रंगों से बैनर और झंडों को सजाते हैं।
मजदूर दिवस के बारे में समाजिक जागरुकता बढ़ाने के लिये लोगों के बीच ‘मजदूर दिवस की बधाई’ कहने के साथ टीवी चैनल और रेडियो चैनल के द्वारा विभिन्न खबरों और संदेशों को फैलाया जाता है, ‘मई दिवस’ मनाने के लिये अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। श्रमिक दिवस पार्टी उत्सव का थीम कोई भी कार्टून चरित्र, पश्चिमी संस्कृति शो, खेल, टीवी शो, फिल्म, अवकाश क्रिया-कलाप, पागल-पन से भरा मजाकिया क्रियाकलाप आदि होता है, दूसरे श्रमिक दिवस गतिविधियों में वर्ग-पहेली, शब्द बदलकर नया शब्द बनाने वाली पहेली, शब्द खोज पहेली, कोड क्रैकर पहेली, शब्द गड्डमड्ड पहेली, शब्द मिलाना, खेल पहेली आदि शामिल है।
ये उत्सव पूरे विश्व भर में एक ऐतिहासिक महत्व रखता है और पूरे विश्व भर में लेबर यूनियन के द्वारा मनाया जाता है। हिंसा को रोकने के लिये सुरक्षा प्रबंधन के तहत कार्यकारी समूह के द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन, भाषण, विद्रोह जुलूस, रैली और परेड आयोजित किये जाते हैं।
भारत में मजदूर दिवस सर्वप्रथम : भारत में मई दिवस सब से पहले चेन्नई में १ मई १९२३ को मनाना शुरू हुआ, उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर मनाया जाता था, इसकी शुरूआत भारती मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू किया था। भारत में मद्रास हाईकोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया गया और एक संकल्प पास कर यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और छुट्टी का ऐलान किया जाये। भारत समेत लगभग ८० मुल्कों में यह दिवस पहली मई को मनाया जाता है, इसके पीछे तर्क यह है कि यह दिन अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर प्रमाणित हो।

महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। उद्योगपति, मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगें।
लोकतन्त्रीय ढांचों में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है जो राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं, वह प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बनाए रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं। मज़दूरों और किसानों की बड़ी संख्या का राज, प्रबंध में बड़ा योगदान है।
सरकार का रोल औद्योगिक शान्ति, उद्योगपतियों और मज़दूरों के दरमियान सुखदायक, शांतमयी और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में उनका समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना और उनके मसलों को औद्योगिक ट्रिब्यूनल कायम कर निरपेक्षता और पारदर्शी ढंग से न्याय सिद्धांत के अनुसार इंसाफ़ प्रदान करना और उनकी बेहतरी के लिए समय-समय से कानूनी और विवरण प्रणाली निर्धारित करना है।
गुरु नानक और भाई लालो : भारतीय संदर्भ में गुरू नानक देव जी ने किसानों, मज़दूरों और कामगारों के हक में आवाज़ उठाई थी और उस समय के अहंकारी और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खा कर उसका अहंकार तोड़ा और भाई लालो के काम का कमाई को सत्कार किया था। गुरू नानक देव जी ने ‘काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालना’ का संदेश दिया। गरीब मज़दूर और कामगार में विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया। १ मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

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