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अयोध्या मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या में संबंधित स्थल पर विवाद सदियों पुराना है जहां मुगल बादशाह बाबर ने या उसकी तरफ से तीन गुंबद वाली बाबरी मस्जिद बनवाई गई थी। हिन्दुओं का मानना है कि मुस्लिम हमलावरों ने वहां स्थित राम मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बना दी थी, यह मामला १८८५ में तब कानूनी विवाद में तब्दील  हो गया था जब एक महंत ने अदालत पहुंचकर मस्जिद के बाहर छत डालने की अनुमति मांगी, यह याचिका खारिज कर दी गई थी।  दिसंबर १९४९ में अज्ञात लोगों ने मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति रख दी। कारसेवकों की बड़ी भीड़ ने छह दिसंबर १९९२ को ढांचे को ध्वस्त  कर दिया था, ढांचे को ध्वस्त किए जाने से देश में हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच दंगे भड़क उठे थे और उत्तर भारत तथा मुंबई में अधिक संख्या में दंगे हुए जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए, ढांचा ढहाए जाने और दंगों से गुस्साए मुस्लिम चरमपंथियों ने मुंबई में १२ मार्च १९९३ को सिलसिलेवार बम विस्फोट किए जिनमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई, न्यायालय ने कहा कि जो गलत हुआ, उसका निवारण किया जाए और पवित्र नगरी अयोध्या में मुसलमानों को मस्जिद के लिए पांच एकड़ का भूखंड आबंटित किया जाए, न्यायालय ने कहा कि विवादित २.७७ एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी, जो इसे सरकार द्वारा बनाए जाने वाले ट्रस्ट को सौपेंगे, पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए, फैसले में कहा गया कि यह धर्म और विश्वास से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसकी जगह मामले को तीन पक्षों-रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड के बीच भूमि के स्वामित्व से जुड़े वाद के रूप में देखा गया। न्यायमूर्ति गोगोई १७ नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल थे। संविधान पीठ ने १०४५ पन्नों का फैसला दिया। भगवान राम का जन्म होने के बारे में हिन्दुओं की आस्था अविवादित है, यही नहीं, सीता रसोई, राम चबूतरा और भण्डार गृह की उपस्थिति इस स्थान के धार्मिक तथ्य के गवाह हैं। न्यायालय ने कहा, ‘विवादित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी जमीन है’ यह तथ्य कि नष्ट ढांचे के नीचे मंदिर था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट से स्थापित हुआ है और नीचे का ढांचा कोई इस्लामी ढांचा नहीं था। घटनाक्रम १५२८: अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे कुछ हिंदू अपने आराध्य देवता राम का जन्म स्थान मानते हैं, समझा जाता है कि मुगल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी, इस वजह से इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था।१८५३: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए।१८५९: ब्रिटेन के शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी, परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति मिली।१८७७: अंग्रेजों ने रामचबुतरा और सीता रसोई में हिंदुओं के प्रवेश की सुविधा के लिए उत्तर की ओर एक दरवाजा खोला।१८८५: इतने वर्षों से अयोध्या विवाद किसी अदालत में नहीं गया था, वर्ष १८८५ में यह मामला पहली बार जिला अदालत में पहुंचा, इसका कारण मामले का बेहद तूल पकड़ लेना था, १८८५ में महंत रघुबर दास ने अदालत से मस्जिद परिसर में राम मंदिर बनवाने की याचिका दायर की, इस अपील को अदालत ने ठुकरा दिया था, इसके बाद विवाद और ज्यादा गहराता चला गया।१९४९: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं, ऐसा भी कहा गया कि कुछ हिंदूओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थी। मुसलमानों ने इस पर विरोध जताया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया, सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया।१९५०: गोपाल सिंह विशारद ने पैâजाबाद कोर्ट में याचिका दायर कर राम की पूजा की इजाजत मांगी, महंत रामचंद्र दास ने भी पूजा जारी रखने के लिए अपील की, वर्ष १९५० में पहली बार मस्जिद को ‘ढांचा’ के तौर पर संबोधित किया गया।१९५१-६१: वर्ष १९५९ में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरण के लिए मुकदमा दायर किया, इसके बाद साल १९६१ में उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक के लिए मुकदमा दर्ज कराया।१९८४: कुछ हिंदुओं ने विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्म स्थल को ‘मुक्त’ करने और वहां राम मंदिर बनाने के लिए एक समिति का गठन किया, इस अभियान को फिर बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया।१९८६: जिला मजिस्ट्रेट ने हिंदुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाजे से ताला खोलने का आदेश दिया, मुस्लिमों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।१९८९: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल के पास राम मंदिर की नींव रखी।

जीटीबी नगर में हुआ होली मिलन समारोह

मुंबई: जायसवाल फाउंडेशन की तरफ से रविवार, ७ अप्रैल को जीटीबी नगर स्थित श्री सनातन धर्म सभा हाईस्कूल सभागृह में काव्य संध्या ,होली स्नेह मिलन समारोह और युवक-युवती परिचय सम्मेलन का आयोजन किया गया था।फाउंडेशन के ट्रस्टी व मीडिया प्रभारी राजेश जायसवाल ने बताया कि शाम ६ बजे से आयोजित उक्त कार्यक्रम में पूर्व न्यायाधीश संतोष कुमार आर. जायसवाल,पूर्व जिला न्यायाधीश ओमप्रकाश एस.जायसवाल, लीलावती अस्पताल के सर्जन डॉक्टर ओमी जायसवाल, मुंबई महानगरपालिका के सहायक अभियंता राणा एन.जायसवाल,’सरस्वती चेरिटेबल ट्रस्ट’ के न्यासी राजदीप गुप्ता, भारतीय कलचुरी जायसवाल संवर्गीय महासभा के अध्यक्ष लालचंद गुप्ता, अखिल मुंबई जायसवाल सभा के अध्यक्ष प्रकाश गुप्ता, युवा भवन निर्माता दशरथ जायसवाल, खारघर स्थित एरला कॉलेज के डॉ. संतोष जायसवाल सहित समाज की कई अन्य गणमान्य हस्तियां उपस्थित थी। फाउंडेशन के अध्यक्ष ओमकार जायसवाल ने बताया कि समाज को एक मंच पर लाने का एक प्रयास हैं। संस्था के सचिव संतोष गुप्ता ने सभी स्वजातीय बंधुओं से कार्यक्रम में भारी संख्या में उपस्थित होने के लिए आभार प्रकट किया। प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होना आवश्यक- बर्वे अंबरनाथ, दुनिया के अधिकांश देशों में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाती है। अंग्रेजी भाषा की शिक्षा सीखना आवश्यक है और हमें अपनी मानसिकता को बदलना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में होना आवश्यक है। ऐसा मत मुंबई पुलिस आयुक्त संजय बर्वे ने व्यक्त किया है। अंबरनाथ के दी एजुकेशन सोसाइटी के महात्मा गांधी विद्यालय के ग्यारहवीं बैच के विद्यार्थियों का स्नेह सम्मेलन ४४ साल बाद बदलापुर के पास आंबेशिव में आयोजित किया गया था। जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी पूरे दिन स्कूल में एक साथ थे। इसी स्कूल के एक बैच के विद्यार्थियों ने मुंबई पुलिस आयुक्त संजय बर्वे को सम्मानित किया। संजय बर्वे ने कहा कि समाज में प्रत्येक समुदाय की मानसिकता को बदलना अब हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है। जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक पुलिस का काम समाज को बेहतर बनाने तक ज्यादा है और इस सामाजिक मानसिकता को बदलने में कम से कम बीस साल लगेंगे। बर्वे ने कहा कि सभी को सम्मान देना सिखाना भी एक चुनौती है। वंदना पालकर उर्फ पल्लवी वैद्य, दिलीप दलाल, विजय पनवेलकर, उमेश तायड़े और प्रशांत कुलकर्णी ने फूल का गुलदस्ता व शाल श्रीफल देकर संजय बर्वे का स्वागत किया। सतीश नवाथे ने मंच का संचालन किया। दिल्ली-NCR और हरियाणा में छठे चरण में वोटिंग लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और ७ चरणों में चुनाव संपन्न होना है, ११ अप्रैल से १९ मई तक लोकसभा सीटों पर वोट डाले जाने हैं जबकि मतगणना के लिए २३ मई की तारीख तय की गई है। राजधानी दिल्ली और हरियाणा में १२ मई को होने वाले छठे चरण में वोट डाले जाएंगे।राजधानी दिल्ली की ७ लोकसभा सीटों पर १२ मई को वोट डाले जाएंगे जबकि नतीजे २३ मई को आने हैं, फिलहाल दिल्ली की सभी सीटों पर बीजेपी का कब्जा है, लेकिन विधानसभा चुनाव में यहां आम आदमी पार्टी को बड़ी जीत मिली थी और अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, दिल्ली की चांदनी चौक, नॉर्थ ईस्ट दिल्ली, ईस्ट दिल्ली, नई दिल्ली, नॉर्थ वेस्ट दिल्ली, वेस्ट दिल्ली और साउथ दिल्ली लोकसभा सीटों पर १२ मई को वोट डाले जाएंगे।हरियाणा में १० लोकसभा सीटों पर भी १२ मई को छठे चरण में वोटिंग होगी, हरियाणा की अंबाला और सिरसा लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, भारतीय जनता पार्टी अक्टूबर २०१४ से हरियाणा पर शासन कर रही है, साल २०१४ लोकसभा चुनावों में बीजेपी को राज्य की १० में से ७ सीटों पर जीत हासिल हुई थी, बीते चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल ने दो सीटें और कांग्रेस ने एक सीट जीती थी।हरियाणा की अंबाला लोकसभा सीट, करनाल, सोनीपत, रोहतक, सिरसा, कुरुक्षेत्र, फरीदाबाद, गुरुग्राम, भिवानी-महेन्द्रगढ़ और हिसार लोकसभा सीट में भी १२ मई को मतदान होंगे, चुनाव कार्यक्रम के ऐलान के साथ ही देशभर में आचार संहिता भी लागू हो गई है। यूपी से एनसीआर में आने वाले गाजियाबाद, नोएडा और मेरठ हापुड़ में पहले चरण में ११ अप्रैल को वोटिंग संपन्न हुयी।हिमाचल प्रदेश में सातवें चरण में मतदान होंगे १९ मई को वोटिंग होगी, हिमाचल प्रदेश में लोकसभा की चार सीटें हैं, जिनमें कांगड़ा लोकसभा, मंडी सीट, शिमला सीट और हमीरपुर लोकसभा सीट शामिल है, इन सभी सीटों पर सातवें चरण यानी १९ मई को वोटिंग होगी।चुनावों की तारीखों का ऐलान करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा था कि चुनाव के दौरान आचार संहिता का कड़ाई से पालन होगा, अगर किसी ने इसका उल्लंघन किया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत के लिए मोबाइल ऐप की सुविधा होगी, सभी पोलिंग बूथों पर VM से मतदान होंगे, ईवीएम में सभी उम्मीदवारों की तस्वीरें भी होंगी, इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया की पूरी वीडियोग्राफी की जाएगी। बुद्ध पूर्णिमा

आवश्यकता मूल्यपरक शिक्षा की

वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश शासन की देन है जो कि राष्ट्रीय और सामाजिक चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह निष्फल साबित हो रही है, आजादी प्राप्त करने के बाद हमने अपनी आवश्यकता, अपनी समस्यायें अपनी संस्कृति के अनुसार शिक्षा पद्धति में कोई आमूल परिवर्तन नहीं किया, जो देश विश्व में कभी अपने आध्यात्मिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध था, वह आज चारित्रिक अवमूल्यन के लिए विश्व में ख्याति प्राप्त कर रहा है, दूषित और अपूर्ण शिक्षा का ही परिणाम है कि डिग्री लेकर हमारे युवक अवांछित गतिविधियों में लिप्त हो रह है, वे अपनी व राष्ट्र की समस्यायें हल करने के बजाय नित नई समस्यायें और पैदा कर रहे है। ऊँची डिग्री लेकर जैसे ही वे किसी रोजगार या व्यवसाय या राजनीति में प्रवेश करते हैं, दूसरों की देखा-देखी अनेक युवक भ्रष्टाचार, शोषण और अन्याय का सहारा लेकर अधिक से अधिक, जल्दी से जल्दी धन बटोरने की लिप्त हो जाते हैं।शिक्षा के विस्तार और प्रगति के नाम पर आज गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले ढेरों स्कूल और कॉलेज खुल गये। पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या बढ़ गई और साक्षरता का प्रतिशत बढ़ गया, किंतु गुणात्मक का प्रतिशत लगातार घटता चला गया।क्या इसी संख्यात्मक प्रगति को हम अपनी वास्तविक उन्नति या उपलब्धि मान सकते हैं? केवल साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने या डिग्रियाँ बांटने से हमारी समस्या का हल नहीं हो सकता, यह शिक्षा हमें अपने आप से, अपनी आत्मा से दूर ले जा रही है, हमें आध्यात्मिक निरक्षरता को भी दूर करना होगा, हमें देश के नव-निर्माण और विकास को गति देने के लिए कॉलेजों से हजारों डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, ऑफीसर आदि जरूर तैयार किये और सफेद पोश बाबुओं की विशाल फौज तैयार की किंतु इंसान बनाना ही भूल गये, इसलिए अधिकांश लोग देशहित में कार्य करने की बजाय अपने ही नव-निर्माण में जुट गये और अपने घर उजाला करने के लिए दूसरों के घर अंधेरा करने लगे, ज्ञान का दुरूपयोग कर समाज में मानव से दानव बनने लगे।शिक्षित होने, ऊँची शिक्षा लेने का उनके ऊपर कोई असर नहीं रह गया है। निष्कर्ष यह कि विषय वस्तु का ज्ञान हमारी चरित्रगत कमजोरियों को दूर करने में सक्षम नहीं है, ऐसा खोखला और ऊपरी ज्ञान में मनुष्यत्व की ओर, देवत्व की ओर नहीं ले जा सकता।गुणवत्ता से तात्पर्य यह नहीं है कि विषय वस्तु का उत्तम ज्ञान हो और न इसका अभिप्राय यह है कि प्रथम श्रेणी या मेरिट में अधिक से अधिक छात्र उत्तीर्ण हों बल्कि उनके अन्तर्निहित चारित्रिक मूल्यों से है। मेरिट में उत्तीर्ण होने वाला छात्र या अधिक प्रखर बुद्धि रखने वाला छात्र यदि अपने माता-पिता गुरूजनों का सम्मान नहीं करता, सच्चाई के पथ पर नहीं चलता, नौकरी प्राप्त कर लेने पर भ्रष्टाचार या शोषण में लिप्त हो जाता है, काम चोरी करता है, दूसरों के साथ छल-कपट पूर्ण व्यवहार करता है, समाज और राष्ट्रीय हितों के विरूद्ध कार्य करता हैं तो ऐसे छात्र का मेरिट में उत्तीर्ण होना या ऐसी बौद्धिक प्रखरता भला किस काम की, ऐसा छात्र न परिवार के लिए उपयोगी हो सकता है और न देश के लिए, जहां भी वह रहेगा अपनी बौद्धिक कुशलता का दुरूपयोग करेगा।किसी योजना या विभाग की सफलता केवल विषय वस्तु के सैद्धान्तिक ज्ञान हो जाने के ऊपर ही निर्भर नहीं करती बल्कि उस योजना के क्रियान्वयन में, विभाग को चलाने में व्यक्ति के चारित्रिक मूल्यों का महत्वपूर्ण योगदान होता है, किंतु दुर्भाग्य यह है कि आजाद भारत में चारित्रिक मूल्यों की लगातार उपेक्षा की जाती रही। चारित्रिक विकास को शिक्षा में महत्व न दिये जाने के कारण आज डॉक्टर की डाक्टरी, इंजीनियर की इंजीनियरी, ऑफीसर की अफसरी से जनता त्रस्त है, उच्च ज्ञान से विभूषित अनेक पद और अधिकारों, शासकीय धन, राशि, सुविधाओं का हर क्षेत्र में प्राय:दुरूपयोग कर रहे हैं।कानून तथा संविधान उन पर अंकुश लगाने में अपने आप को असहाय महसूस कर रहा है, हमारी चेतना इतनी नीचे गिर चुकी है, हमारा दैनिक जीवन चारों ओर इतना कलुषित और प्रदूषित हो गया है कि कोई भी कार्य बिना संभव नहीं है। प्रश्न यह है कि जिनके पास न राजनीतिक अप्रोच है और न ही पैसा है वे बेचारे क्या करें? पीड़ित जनता देश की यह दुर्दशा देख कर आंसू बहा रही है, हमारे सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक, मानवीय, आध्यात्मिक प्रशासनिक और राजनीतिक सभी मूल्यों का कितना अवमूल्यन हो गया है इस पर अधिक विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, सभी भली-भांति परिचित हैं कि एक अनपढ़ व्यक्ति से लेकर उच्च शिक्षित व्यक्ति तक इस पीड़ा को अनुभव कर रहा है और विवश होकर भोग रहा है, अत: हमारे सामने एक ज्वलंत प्रश्न उठता है कि ऐसे दुख और तनाव से ग्रसित मानव जाति को कैसे छुटकारा दिलाया जाये, जबकि मनुष्य अपने ही बनाये जाल में उलझ गया है। हमारे देश में ज्वलंत समस्याओं का समाधान न तो शिक्षा के विस्तार से हो सकता है, न राजनीति के माध्यम से, न भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए तरह-तरह के आयोग बैठाने से, न सी.बी.आई. और सर्तकता आयुक्त की जगह-जगह कार्यालय खोलने से, न विभागों और मंत्रियों की संख्या बढ़ाने से, न कानून और और न फौज पलटन बढ़ाने से और न गांव-गांव थाने तथा पुलिसों की संख्या बढ़ाने से, इन सब का हश्र वही होता है कि तू डाल-डाल मैं पात-पात, उपरोक्त उपाय समस्या का स्थाई समाधान नहीं है।ऐसे में घोर निराशा और अंधकार के माहौल में सिर्फ एक ही आशा की किरण दिखाई देती है जिससे जगत का अंधेरा दूर किया जा सकता वह आशा की किरण है-शैक्षणिक गुणवत्ता और चरित्र के विकास का। वर्तमान शिक्षा प्रणाली से गुणवत्ता और चरित्र का चिराग जलाकर परिस्थितियों पर काबू पाया जा सकता है, अर्थात शिक्षा को संस्कार से जोड़ना होगा, इसका स्थाई समाधान मनुष्य का चरित्र उठाने यानी मानवीय मूल्यों पर आधारित संस्कारित और आध्यात्मिक शिक्षा से ही सम्भव है, समस्त समस्याओं और अव्यवस्थाओं का जन्म-व्यक्ति की चरित्रहीनता के कारण ही होता है। इसलिए हमें विद्यालयों/महाविद्यालयों में युवा पीढ़ी का चरित्र गढ़ना होगा क्योंकि विद्यालय और महाविद्यालय रूपी फैक्टरी से ही लाखों युवकों को तैयार करके जीवन के हर क्षेत्र में प्रतिवर्ष आपूर्ति की जाती है।नई पीढ़ी, नये बीज का उत्पादन या निर्माण जहां से हो रहा है, उस श्रोत को ही ठीक करना होगा। उपचार जड़ से करना होगा, अत: युवकों को योग, स्वास्थ्य संस्कार और व्यावहारिक जीवन से जुड़ी गुणात्मक और उपयोगी शिक्षा देनी होगी। आत्म परिष्कार की शिक्षा देनी होगी। आजादी के ७१ साल बाद भी मानवीय मूल्यों के संरक्षण और विकास के लिए भारत देश में काई ठोस कार्य नहीं किया गया, मानव से निम्न चेतना को ऊपर उठाने के लिये कोई विभाग या संस्थान या ट्रेनिंग सेंटर खोलने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई।हाँ नीचे गिराने का कार्य देश की कुटिल राजनीति और अनेक विभागों ने अवश्य किया है, हम यही सोचते रहे कि समाज सुधार करना या नैतिकता की ओर देश को मोड़ना साधु सन्यासियों का कार्य है अथवा कानून का, यह हमारी कैसी सोच है, यह कैसी विडम्बना है कि हम अपने कृत्यों से समाज को गंदा करें, उसे दुर्गन्धित करें और साधु-संत इसकी सफाई करें, जिनके हाथों में कानून की रक्षा का दायित्व है यदि वे हाथ ही गंदे हों तो फिर समस्या का इलाज क्या है?समस्या का दूसरा पहलू यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ रहे हों या अपने स्वार्थ में कानून को बदलवाने का प्रयास कर रहे हों या न्याय देने वाली न्यायपालिका को धमकी दे रहे हों तो मनुष्य को सही रास्ते पर चलने का उपाय क्या है? ऐसी स्थिति में सही न्याय और समय पर न्याय पाने की आशा वैâसे की जा सकती है? ऐसा दुस्साहस का कार्य प्राय: वही लोग करते हैं जिनके पास पर्याप्त दौलत होती है या जिन्हें राजनीति संरक्षण प्राप्त है, तात्पर्य यह कि अब लोगों को कानून, संसद, संविधान और न्यायपालिका का भय भी समाप्त होता जा रहा है, इन सब घटनाओं का प्रभाव पूरे देश के चरित्र पर पड़ता है, हमारी सारी समस्या वास्तव में चरित्र से जुड़ी हुई है और व्यक्तिगत समस्या को कानून और पुलिस के भय से कभी सुधारा नहीं जा सकता, अत: चरित्रगत दोषों में सुधार लाने के लिये आज आध्यात्मिक शिक्षा, यौगिक शिक्षा और सांस्कारिक शिक्षा की नितांत आवश्यकता है, हमें अपना चरित्र सुधारने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी, बच्चों को उनकी मर्जी पर या प्रकृति के भरोसे न छोड़कर उन्हें संस्कारित करना होगा, न केवल विद्यालय में बल्कि घर में भी माता-पिता को उचित संस्कार देने होंगे, इतना ही नहीं परिणय सूत्र में बंधते समय ही वर-वधू को अग्नि को साक्षी मानकर यह प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि वे संस्कार हीन बच्चे नहीं पैदा करेंगे, जो पुरूष और स्त्री अपने बच्चे को अच्छा संस्कार और अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते उन्हें विवाह कदापि नहीं करना चाहिए, संस्कार विहिन बच्चे पैदा करके इस समाज या सरकार पर थोपें और धरती को बोझित करें यह राष्ट्रीय अपराध है, यह अनैतिक कार्य भी है। गलती माता-पिता करें और सरकार उन्हें सुधारे।यह सोच नहीं है, संस्कारों का निर्माण बचपन से ही करना होता है तभी संस्कारों का वृक्ष बड़ा होकर पुख्ता और मजबूत बनता है, इसकी नींव बचपन में ही डालनी होती है अर्थात् मानवीय मूल्यों के नन्हें पौधों का बीजारोपण किशोरवस्था से ही प्रारम्भ होगा क्योंकि कोरे कागज पर कुछ भी लिखा जा सकता है किंतु जो पहले ही लिखा जा चुका है, उसे मिटाना और पुन: लिखना कठिन होता है, छोटे पौधों को मनचाही दिशा में झुकाया जा सकता है, उसकी कांट-छांट करके वांछित आकार-प्रकार दिया जा सकता है किंतु बड़े होने पर उस पौधे को झुकाना कठिन होता है, ठीक इसी प्रकार छोटे बच्चों को वांछित दिशा में मोड़कर उनके अंदर वांछित संस्कार भरे जा सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ का हुआ सम्मान बिजय कुमार जैन का सम्मान करते हुए प्रसिद्ध समाजसेवी मोतीलाल ओसवाल, भारत जैन महामण्डल के अध्यक्ष के .सी. जैन (सी. ए.) के साथ उपस्थित कई -कई समाज सेवी मुंबई: मानव सेवा, समाज सेवा, राष्ट्र सेवा ही जिसका धर्म है जिसको पिछे मुड़कर देखना ही नहीं आता, उसका सम्मान तो होना ही चाहिए था, उसी कड़ी में १६ अप्रैल २०१९ को महावीर जन्मकल्याणक पर्व की पूर्व संध्या पर समाज के विशिष्ट लोगों द्वारा सम्मान किया गया, उस शख्सियत का नाम है बिजय कुमार जैन, जिन्हें कई-कई बार उनके द्वारा किए गए कार्यों के लिए पूर्व में भी सम्मानित भी किया है, क्योंकि बिजय जी ‘जिनागम फाउंडेशन’ के ट्रस्टी अध्यक्ष के साथ उनकी लेखनी ने कई-कई कीर्तिमान रचे हैं जैसे कि ‘जैन एकता’ राजस्थानी एकता, भारत की बनें राष्ट्रभाषा, भारत को भारत बोला जाए, राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में द़र्ज किया जाये, ऐसे कई-कई कार्यों के लिए बिजय जी का सम्मान किया जाता रहा है, जिसके लिए समस्त जैन समाज की पत्रिका ‘जिनागम’, राजस्थान समाज की विश्वस्तरीय पत्रिका ‘मेरा राजस्थान’, राजनीति क्षेत्र की विश्वस्नीय ‘मैं भारत हूँ’ व मुंबई का हृदय कहे जाने वाले अंधेरी को स्वच्छ व सुंदरता के लिए प्रयासरत ‘ईस्ट वेस्ट अंधेरी टाईम्स’ परिवार शुक्रगुजार है। महाराष्ट्र राज्य की स्थापना १ मई १९६० महाराष्ट्र राज्य का संक्षिप्त परिचयराजधानी : मुम्बईजिले : ३५भाषा : मराठी, हिंदी, अंग्रेजीमहाराष्ट्र भारत के सबसे अधिक औद्योगिक राज्यों में से एक है, यह देश के पश्चिमी और मध्य भाग में स्थित है, यहाँ विस्तृत सह्याद्री पहाड़ी है। अरब सागर तट पर ७२० किलोमीटर की एक सुंदर पृष्ठभूमि वाले महाराष्ट्र में एक विशाल आकर्षण है। महाराष्ट्र की स्थापना १ मई १९६० को हुई थी।महाराष्ट्र का भूगोल – आंध्र प्रदेश के उत्तरी और मध्य प्रदेश के पश्चिमी छोर पर बसा महाराष्ट्र अरब सागर से घिरा है, इस क्षेत्र की अनूठी विशेषता मुकुट पठार की एक श्रृंखला है। अरब सागर और सह्याद्री रेंज के बीच कोंकण सिर्फ ५० कि.मी. चौड़ा और २०० मीटर नीचे ऊँचाई के साथ संकीर्ण तटीय तराई है। तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है उत्तरी सीमा पर सतपुडा पहाड़ियां और भामरागढ़-चिरौली-गायखुरी पर्वतमाला। महाराष्ट्र का संक्षिप्त इतिहास – अहमदनगर जिले में महाराष्ट्र की प्राचीन सभ्यता के कई सबूत मिलते हैं। ६४०-६४१ (ईसा पूर्व) में इस क्षेत्र का दौरा करने वाले चीनी यात्री ह्यूंत्सांग ने इस क्षेत्र की समृद्धि की काफी सराहना की थी। तीसरी और चौथी शताब्दी (ईसा पूर्व) के दौरान कोंकण के क्षेत्र में व्यापार स्थापित था, बौद्ध के समय में काफी प्रगति हुई फिर मौर्य शासन हुआ। महाराष्ट्र की संस्कृति और कला का एक बड़ा केंद्र था राष्ट्रकूट। मौर्य शासन के विघटन के बाद कालक्रमानुसार मुस्लिम शासन मतबूत हुआ। महाराष्ट्र में मुगल शासन के मुंहतोड़ ज़वाब में सक्रिय रहे छत्रपति शिवाजी। शिवाजी मराठवाड़ा के पहले महान शासक थे, उन्होंने महाराष्ट्र स्वतंत्रता, स्वाभिमान व विकास के मार्ग प्रशस्त किये। शिवाजी की वीरता और महानता अभी भी इस प्रदेश के लोगों द्वारा याद की जाती है। महाराष्ट्र सरकार – वर्तमान में देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं।महाराष्ट्र के जिले – महाराष्ट्र राज्य छ: डिवीजनों में विभक्त है, जो ३५ जिलों से बना है।१) अमरावती क्षेत्र: अकोला, अमरावती, बुलढाना, वाशिम और यवतमाल२) औरंगाबाद क्षेत्र (मराठवाड़ा) : औरंगाबाद, बीड, हिंगोली, जालना, लातूर, नांदेड़, उस्मानाबाद और परभणी३) कोंकण क्षेत्र : मुम्बई शहर, मुम्बई उपनगरीय, रायगढ़, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और ठाणे४) नासिक क्षेत्र : अहमदनगर, धुले, जलगांव, नंदुरबार और नासिक ५) नागपुर क्षेत्र : भंडारा, चंद्रपुर, गढ़चिरौली, गोंदिया, नागपुर और वर्धा६) पुणे क्षेत्र : कोल्हापुर, पुणे, सांगली, सतारा और शोलापुर। महाराष्ट्र में अर्थव्यवस्था – महाराष्ट्र भारत की अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख स्थान रखता है। भारत की इस वाणिज्यिक राजधानी मुम्बई में देश के सभी प्रमुख औद्योगिक/कॉर्पोरेट घरानों की उपस्थिति है। महाराष्ट्र तिलहन के अलावा मूँगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन आदि के साथ कपास, गन्ना, हल्दी और सब्जी जैसी फसलें पैदा करता है। बागवानी-खेती का भी यहाँ विशाल क्षेत्र है।महाराष्ट्र संबंधी जानकारी – महाराष्ट्र राज्य का दर्शकों के मन और आत्मा पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। अन्य स्थलों में औरंगाबाद, खंडाला, लोनावाला, महाबलेश्वर, माथेरान, मुम्बई, नासिक, पुणे, संजय गांधी नेशनल पार्क, शिरडी, गणपति पुले, कारला गुफाएं आदि दर्शनीय व महत्वपूर्ण स्थान हैं।महाराष्ट्र की नदियाँ : अरब सागर में कई छोटी नदियों के दााोत हैं।तापी, नर्मदा व वाण गंगा आदि नदियाँ है, इन सबका प्रवाह बंगाल की दिशा में है।महाराष्ट्र में शिक्षा – महाराष्ट्र अपने उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए जाना जाता है। मुम्बई किसी भी क्षेत्र में बेहतर शिक्षा के लिए सबसे अच्छी जगह है। मुम्बई के अलावा ठाणे जैसे अन्य स्थानों- नासिक, पुणे, अहमदनगर, नागपुर, औरंगाबाद, सांगली, उस्मानाबाद, वसई, जलगांव, डोम्बिवली, कोल्हापुर और कराड आदि जिलों में प्रसिद्ध संस्थान हैं। महाराष्ट्र में स्कूल या तो नगर निगम द्वारा या निजी ट्रस्टों और व्यक्तियों द्वारा चलाए जा रहे हैं। निजी स्कूलों में बेहतर सुविधाओं और शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को शहरों में रहने वाले लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है। सभी निजी स्कूलों के अलावा महाराष्ट्र राज्य एसएससी बोर्ड या माध्यमिक शिक्षा (आईसीएसई) और सीबीएसई बोर्ड अखिल भारतीय प्रमाणपत्र के साथ संबद्ध हैं।राज्य इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे क्षेत्रों के लिए भी बहुत ही अच्छा है। उपरोक्त क्षेत्रों के लिए संस्थानों की बड़ी संख्या हैं। महाराष्ट्र राज्य में ३१ जिलों में ३९ विश्वविद्यालय हैं जो केंद्रीय, राज्य या डीम्ड श्रेणी में आते हैं।महाराष्ट्र विशेष – कई मायनों में महाराष्ट्र की संस्कृति भी अपने स्थानीय भोजन में परिलक्षित होती है। ज्यादातर लोग महाराष्ट्रीय व्यंजनों से बहुत परिचित नहीं हैं। एक बड़े और रोचक पाक प्रदर्शनी की सूची यहाँ मौजूद हैं। महाराष्ट्रीय भोजन में कोंकणी और वराडी दोनों प्रचलित है। नारियल तेल व्यापक रुप से खाना पकाने के लिए उपयोग में लाया जाता है।मूंगफली तेल का उपयोग मुख्यरुप से खाना पकाने के उपयोग में किया जाता है। कोकम का एक मनभावन मीठा और खट्टा स्वाद होता है।एक गहरे बैंगनी बेर का इसमें इस्तेमाल होता है। क्षुधावर्धक-पाचक के रुप में कोकम का इस्तेमाल होता है। ठंडा परोसा जाता है। समुद्री भोजन के अलावा, सबसे लोकप्रिय मछली बोंबिल है। सभी मांसाहारी और शाकाहारी व्यंजन उबले हुए चावल या चावल के आटे से बनी मुलायम रोटियों (भाकड़ी) के साथ खाया जाता है। विशेष चावल-पूरी, एक उड़द की दाल और सूजी से बनी पैनकेक भी मुख्य भोजन के रुप में खाया जाता है। शाकाहारी में सबसे लोकप्रिय सब्जी बैंगन है। महाराष्ट्रीयन ज्यादा भूना हुआ या तला हुआ खाना पसंद करते हैं। बड़ा, इडली, सांभर भी महाराष्ट्रीयन काफी पसंद करते हैं, उनका आहार पापड़ के बिना अधूरा है। यहाँ मछुआरों के समाज को ‘कोली’ कहा जाता है। मछलियों का व्यवसाय ही उनकी आजीविका है। महाराष्ट्र में मजबूत ब्राह्मण प्रभाव भी है, यहाँ संस्कृत शिक्षा के केंद्र भी हैं।नव बौद्ध विचारों के अनुयायी भी यहाँ काफी संख्या में हैं और वे आंबेडकर वादी हैं। महाराष्ट्र में सबसे प्रसिद्ध हस्तशिल्प के लिए कोल्हापुरी चप्पल और पैठानी साड़ियाँ है। महाराष्ट्र अच्छी तरह से अपने समृद्ध संगीत और नृत्य के लिए भी विश्व भर में जाना जाता है।राज्य में लोक संगीत का खास चलन है। महाराष्ट्रीयन समाज संगीत के क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्व और योगदान करते हैं। राज्य के मध्ययुगीन काल में संगीत रत्नाकर के रुप में भारतीय संगीत के सबसे बड़े ग्रंथ के लेखक थे शारंग देव। लता मंगेशकर, पंडित जसराज, भीमसेन जोशी जैसे भारतीय संगीतकारों के अलावा किशोरी अमोनकर भी महाराष्ट्र के गौरवस्तंभ हैं। महाराष्ट्र में थिएटर की परंपरा आज भी है। महाराष्ट्र के त्योहार – भारत के मुख्य त्योहारों के अलावा महाराष्ट्र गणेश चतुर्थी और गुडी पाड़वा खास तौर पर बड़ी धूमधाम से मनाता है। दुर्गा पूजा के समय में दस दिन की पूजा होती है, बहुत ज्यादा उत्साह के साथ यह पर्व मनाया जाता है। महाराष्ट्र के नए साल की शुरुआत के रुप में ‘गुडी पाडवा’ काफी महत्वपूर्ण है।महाराष्ट्र की पोशाक – महाराष्ट्र की महिलाओं की साड़ी उत्तर भारत में पहनी जानेवाली साड़ी से काफी अलग है, जो ‘नवारी’ के नाम से जानी जाती है, जो नौ गज की होती है। साड़ी, झुमके, भारी हार और चूड़ियों को काफी पसंद किया जाता है। छोटी लड़कियां पार्कर-पोल्का पहनती है, एक पार्कर लंबा परिधान स्कर्ट की तरह है और पोल्का हरे, लाल या नीले रंग का होता है जो पारंपरिक महाराष्ट्रीयन कपड़े से बना एक ठेठ ब्लाउज है। कुर्ते के साथ धोती आम पुरुषों के वस्त्र हैं। पुरुषों द्वारा हाल ही में सामरा नामक एक पारंपरिक शर्ट पहनी गयी थी, यहाँ सिर पर पगड़ी भी पहनते हैं। शहरी केंद्रों में ज्यादातर पुरुष पैंट और कमीज की तरह आधुनिक कपड़े पहनते हैं और औरतें विशेष सामाजिकत्योहारी अवसरों पर पारंपरिक वस्त्रों के अलावा आधुनिक कपड़े भी पहना करती हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस का इतिहास और उत्पत्ति अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस विश्व स्तर का एक बड़ा उत्सव है और इसे १ मई १८८६ के दिन को याद करने के लिये मनाया जाता है, शिकागो में हेयरमार्केट घटना के कारण (हेयरमार्केट हत्याकाण्ड)। ये उस वर्ष की एक बड़ी घटना थी जब मज़दूर अपने आठ घंटे के कार्य-दिवस के लिये आम हड़ताल पर थे और पुलिस आम लोगों को भीड़ से तितर-बितर करने का अपना कार्य कर रही थी। अचानक से, एक अनजाने व्यक्ति के द्वारा भीड़ पर एक बम फेंका गया और पुलिस ने गोली चलाना शुरु कर दिया, जिसमें चार प्रदर्शनकारी मारे गये।घटना के बारे में वास्तविक वक्तव्य है: ‘भरोसेमंद गवाहों ने बयान दिया है कि सड़क के बीच से बंदूकों से गोली आयी है, जहाँ पुलिस खड़ी थी, और भीड़ से कोई नहीं था, इसके अलावा, प्रारंभिक अखबार की रिपोर्ट ने आम नागरिकों के द्वारा गोली चलाने की कोई बात वर्णित नहीं की गयी थी, घटनास्थल पर एक तार का खंभा गोलियों के छेद से भरा पड़ा था, सभी पुलिस की दिशा की ओर से आ रहे थे।’रेमण्ड लेविग्ने के द्वारा एक प्रस्ताव के माध्यम से पेरिस के मीटिंग में (१८८९ में) मई दिवस के रुप में वार्षिक आधार पर इसे मनाने का फैसला किया गया कि शिकागो विद्रोह के वर्षगाँठ को मनाने के लिये अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन की जरूरत है। वर्ष १८९१ में, वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने के लिये दूसरे अंतरराष्ट्रीय काँग्रेस के द्वारा मई दिवस को अधिकारिक स्वीकृति मिली थी।हालाँकि, मई दिवस दंगा वर्ष १८९४ में और फिर १९०४ में हुआ, एम्सटर्डम के अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में निम्नलिखित वक्तव्य दिया गया ‘आठ घंटे के दिन के कानूनी स्थापना के लिये पहली मई को प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शन के लिये सभी देशों के समाजिक लोकतांत्रिक पार्टी संगठन और व्यापार यूनियनों, मजदूर वर्ग के श्रेणीबद्ध माँग के लिये, वैश्विक शांति के लिये और पहली मई को काम रोकने के लिये सभी देशों के मजदूर संगठनों के ऊपर बाध्यकारी है, इसे घोषित किया गया।’ मई दिवस क्यों मनाया जाता है?आठ घंटे के कार्य दिवस की जरुरत को बढ़ावा देने के लिये साथ ही संघर्ष को खत्म करने के लिये अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है, पूर्व में मजदूरों की कार्य करने की स्थिति बहुत ही कष्टदायक थी और असुरक्षित परिस्थिति में भी १० से १६ घंटे की कार्य-दिवस था। १८६० के दशक के दौरान मजदूरों के लिये कार्यस्थल पर मृत्यु, चोट लगना और दूसरी डरावनी परिस्थिति बेहद आम बात थी और पूरे कार्य-दिवस के दौरान काम करने वाले लोग बहुत क्षुब्ध थे जब तक कि आठ घंटे का कार्य-दिवस घोषित नहीं कर दिया गया।बहुत सारे उद्योगों में श्रमिक वर्ग के लोग (पुरुष, महिला और बच्चे) की बढ़ती मृत्यु, उद्योगों में उनके काम करने के घंटे को घटाने के द्वारा कार्यकारी दल के लोगों की सुरक्षा के लिये आवाज उठाने की जरुरत थी। मजदूरों और समाजवादियों के द्वारा बहुत सारे प्रयासों के बाद, मजदूरों की अमेरिकन संघ के द्वारा १८८४ में शिकागो के राष्ट्रीय सम्मेलन में मजदूरों के लिये वैधानिक समय के रूप में ‘आठ घंटे’ घोषित किया गया।हेयमार्केट हत्याकाण्ड के दौरान बहुत सारे लोगों ने अपने जीवन का बलिदान किया था जो मजदूरों की हड़ताल के दौरान शिकागो में हुआ था। कार्यकारी समूह के लोगों की समाजिक और आर्थिक उपलब्धियों को बढ़ावा देने के साथ ही हेयमार्केट नरसंहार की घटना को याद करने के लिये ‘मई दिवस’ मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस कैसे मनाया जाता हैमजदूरों की उपलब्धियों को मनाने के लिये पूरे विश्व भर में एक आधिकारिक अवकाश के रुप में वार्षिक तौर पर अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मनाया जाता है। बड़ी पार्टी और ढेर सारे कार्यक्रमों का प्रबंधन कर लोग मई दिवस या मजदूर दिवस को खुशी से मनाते हैं। स्वतंत्रता दिवस उत्सव की तरह वो रंगों से बैनर और झंडों को सजाते हैं।मजदूर दिवस के बारे में समाजिक जागरुकता बढ़ाने के लिये लोगों के बीच ‘मजदूर दिवस की बधाई’ कहने के साथ टीवी चैनल और रेडियो चैनल के द्वारा विभिन्न खबरों और संदेशों को फैलाया जाता है, ‘मई दिवस’ मनाने के लिये अंतरर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन के द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। श्रमिक दिवस पार्टी उत्सव का थीम कोई भी कार्टून चरित्र, पश्चिमी संस्कृति शो, खेल, टीवी शो, फिल्म, अवकाश क्रिया-कलाप, पागल-पन से भरा मजाकिया क्रियाकलाप आदि होता है, दूसरे श्रमिक दिवस गतिविधियों में वर्ग-पहेली, शब्द बदलकर नया शब्द बनाने वाली पहेली, शब्द खोज पहेली, कोड क्रैकर पहेली, शब्द गड्डमड्ड पहेली, शब्द मिलाना, खेल पहेली आदि शामिल है।ये उत्सव पूरे विश्व भर में एक ऐतिहासिक महत्व रखता है और पूरे विश्व भर में लेबर यूनियन के द्वारा मनाया जाता है। हिंसा को रोकने के लिये सुरक्षा प्रबंधन के तहत कार्यकारी समूह के द्वारा विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन, भाषण, विद्रोह जुलूस, रैली और परेड आयोजित किये जाते हैं।भारत में मजदूर दिवस सर्वप्रथम : भारत में मई दिवस सब से पहले चेन्नई में १ मई १९२३ को मनाना शुरू हुआ, उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर मनाया जाता था, इसकी शुरूआत भारती मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू किया था। भारत में मद्रास हाईकोर्ट के सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया गया और एक संकल्प पास कर यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और छुट्टी का ऐलान किया जाये। भारत समेत लगभग ८० मुल्कों में यह दिवस पहली मई को मनाया जाता है, इसके पीछे तर्क यह है कि यह दिन अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के तौर पर प्रमाणित हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। उद्योगपति, मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगें।लोकतन्त्रीय ढांचों में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है जो राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं, वह प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बनाए रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं। मज़दूरों और किसानों की बड़ी संख्या का राज, प्रबंध में बड़ा योगदान है।सरकार का रोल औद्योगिक शान्ति, उद्योगपतियों और मज़दूरों के दरमियान सुखदायक, शांतमयी और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में उनका समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना और उनके मसलों को औद्योगिक ट्रिब्यूनल कायम कर निरपेक्षता और पारदर्शी ढंग से न्याय सिद्धांत के अनुसार इंसाफ़ प्रदान करना और उनकी बेहतरी के लिए समय-समय से कानूनी और विवरण प्रणाली निर्धारित करना है।गुरु नानक और भाई लालो : भारतीय संदर्भ में गुरू नानक देव जी ने किसानों, मज़दूरों और कामगारों के हक में आवाज़ उठाई थी और उस समय के अहंकारी और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खा कर उसका अहंकार तोड़ा और भाई लालो के काम का कमाई को सत्कार किया था। गुरू नानक देव जी ने ‘काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालना’ का संदेश दिया। गरीब मज़दूर और कामगार में विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया। १ मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

३० मार्च राजस्थान स्थापना दिवस

वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ द्वारा ३० मार्च राजस्थान स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर मुंबई में भव्यातिभव्य ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम का आयोजन पूर्व संध्या पर हुआ राजस्थानी संस्थाओं का सम्मान राजस्थान स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित भव्यातिभव्य ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम में उपस्थित दिलिप सांगनेरिया, वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’, प्रसिद्ध समाजसेविका व लोढा फाऊंडेशन की संस्थापिका श्रीमती मंजु लोढा, कार्यक्रम समन्वयक एवं अग्रबंधु सेवा समिति के ट्रस्टी कानबिहारी अग्रवाल, राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त ‘जैन एकता’ के परम समर्थक हिरालाल साबद्रा व शब्दों के जाल बुनने वाले प्रख्यात मंच संचालक त्रिलोक सिरसरेवाला लोखंडवाला: मुंबई का ह्रदय कहा जाने वाला सभ्रांत इलाका लोखंडवाला कॉम्पलेक्स में स्थित लोखंडवाला गार्डेन क्र.२ में चतुर्थ वर्षीय ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम की रंगारंग शुरूआत २२-२४ फरवरी, त्रीदिवसीय रूप में शुरू हुयी, जिसका उद्घाटन २२ फरवरी को प्रसिद्ध समाजसेवी सुश्री मंजु लोढा ने किया और कहा कि ऐसे कार्यक्रम में आकर मुझे अपने बचपन की याद आ गयी, अपने भाषण में मंजु जी ने सम्पूर्ण राजस्थान का गुणगान कर श्रोताओं की तालियां बटोरी। विभिन्न परिधानों, खान-पान व सजावटी समानों की स्टॉल के साथ का आयोजन वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ने बच्चों के लिए विभिन्न झूले, कठपुतली, नृत्य, बाईस्कोप आदि का भी आयोजन किया, जिसका लुत्फ कार्यक्रम में पधारे राजस्थानी परिवारों ने उठाया।आयोजक वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ ने कहा कि ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम के आयोजन का उद्देश्य मुंबई में फैले राजस्थानी संस्थाओं को एकमंच पर लाना ही एकमात्र है जिसमें दिनों-दिन सफलता भी मिल रही है, लोग जुड़ते चले जा रहे हैं कारवॉ बनते जा रहा है, इसी कड़ी में इस वर्ष १३५ राजस्थानी संस्थाओं का सम्मान किया जा रहा है, श्री जैन ने कहा कि मेरे जीवन का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान बढाना है, और भारत की एक राष्ट्रभाषा को प्रतिष्ठापित करवानी है जिसमें मुझे सफलता भी प्राप्त हो रही है और एक दिन विश्व के सभी राष्ट्रों की तरह मेरे भारत का भी एक राष्ट्रभाषा घोषित होकर रहेगी। श्री जैन ने कहा कि मेरे आदर्श महात्मा गांधी जी कहा करते थे कि ‘जिस देश की कोई राष्ट्रभाषा नहीं होती वो राष्ट्र गूंगा होता है’ साथ यह भी कहा कि भारतीय आजादी के योद्धा नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था कियदि भारत को अखंड रखना है तो हम सभी को ‘हिंदी’ में ही संवाद करना चाहिए।श्री जैन ने ‘राजस्थान स्थापना दिवस’ के बारे में भी उल्लेख करते हुए कहा कि वीरों की भूमि आज के राजस्थान को बनने के लिए सात साल लगे थे, जिसके लिए अथक परिश्रम सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया था, जिनके कार्यों का भुलाया नहीं जा सकता।रंगारंग ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम की संगीतमय प्रस्तुति बंटी ठाकूर-प्रिया ठाकूर के सहयोगियों द्वारा की गयी थी।गणेश वंदना व विभिन्न राजस्थानी गीतों को कोकिला कंठी इंदु श्यामसुंदर अग्रवाल ने प्रस्तुति दी।राजस्थानी नृत्य की छटा बिखेरी प्रसिद्ध नृत्यांगना व अभिनेत्री बरखा पंडित ने, प्रसिद्ध गीतकार व संगीतकार दिलिप सेन द्वारा गीतों की प्रस्तुति पर प्रसिद्ध राजस्थानी अभिनेता अरविंद कुमार ने जमकर नृत्य कर दर्शकों का मन मुग्ध कर दिया।सुनिल चौहान, जो दिलिप सेन जी के शिष्य हैं गीत गाकर पुराने दिनों की याद दिला दी। अतिथि स्वतंत्रता संचालन प्रसिद्ध समाजसेवी कानबिहारी जी अग्रवाल व शब्दों के जाल बुनने के लिए प्रख्यात त्रिलोक सिरसलेवाला ने किया।२२ मार्च यानि पहले दिन राजस्थानी कर्मठता सम्मान ‘राजस्थानश्री’ से सम्मानित होने वाले सर्वश्री हीरालाल सबाद्रा, सुधीर अग्रवाल, गोपालदास गोयल, श्रीधर गुप्ता, श्रीमती मंजू लोढ़ा, श्रीमती ऊषा सरावगी, दिलीप सेन, सतीश सुराणा, अरविंद वाघेला व अन्य है।कार्यक्रम में अपनी विशेष उपस्थिति दी सर्वश्री ओमप्रकाश शाह, बंकेश अग्रवाल, अमित अग्रवाल, छोटेलाल अग्रवाल, शिव कुमार बागड़ी, प्रमोद अग्रवाल, श्री बुबना, दिलीप सांगानेरिया, अजय माहेश्वरी, टिवी सिरियल निर्माता सन्नी मंडावरा, सुश्री वर्षा जालान, सुमन बोहरा, ललिता अग्रवाल, शीला गोयल, श्रीमति संतोष बिजय जैन, पायल सौरभ जैन आदि-आदि ने उपस्थिति दी, कार्यक्रम में लगे स्टॉल (दुकानों) के सहयोगी, कठपुतली, राजस्थानी बाईस्कोप के साथ आगंतुकों का स्वागत अम्रत भट्ट एण्ड कम्पनी ने किया। ‘आपणो राजस्थान’ कार्यक्रम के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार व संपादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’, सर्वश्री श्रीधर गुप्ता (उपाध्यक्ष मुंबई अग्रवाल सामुहिक विवाह सम्मेलन), गोपालदास गोयल (मंत्री: आगरा नागरिक संघ), सुधीर अग्रवाल (ट्रस्टी: अग्रवाल जनसेवा चेरिटेबल ट्रस्ट), हीरालाल साबद्रा (अध्यक्ष, नवी मुंबई स्थानकवासी जैन संघ) समाज सेवी कानबिहारी अग्रवाल व ओमप्रकाश शाह विभिन्न खाद्य बच्चों के लिए झूले वगैरह की व्यवस्था श्री राजेश जैसवाल ने की थी।सुरक्षा व्यवस्था विश्वनाथ द्वारा की गयी थी।कार्यक्रम के आर्थिक सहयोगी जीटीव्ही इंफ्रा. लि., अग्रवाल बिल्डर, जालान वायर्स, शारदा वल्र्ड वाइड, राजस्थानी सेवा संघ, बांसवारा सिन्टेक्स, मुरारका फाउंडेशन, पदमा ट्रेडर्स, पुश इन्टरप्राइजेस, मोगरा असोसियेशन, डॉ. श्याम अग्रवाल (नेत्र चिकित्सक विशेषज्ञ), लोढा फाउंडशेन, आर.एन. तिवारी, ब्लेन्ड फाइनेन्श, गुरूजी ठंडाईवाला, कुचामण विकास परिषद मुंबई, सिद्धार्थ कुलिंग कॉरपोरेशन, भारत बैंक व आकाश मार्बल आदि एम.टी.सी. ग्रुप, गुप्ता इन्वेसमेंट, ब्युटीफुल ग्रुप, श्रीधर गुप्ता अग्रवाल जनसेवा चेरिटेबल ट्रस्ट रहे। प्रथम दिवसीय कार्यक्रम के विशेष सहयोगी ‘आपणों राजस्थान’ के सह संयोजिका सुश्री अनुपमा शर्मा के साथ गेलार्ड ग्रुप के सर्वश्री आकाश कुम्भार, संध्या मौर्या, आशा कुमार, भूपेंन्द्र कोरी, विजय जांगड़ा, रंजना पाटील, रोशनी जाधव, राजेश्री पेडणेकर, अक्षय डोंगरे, रोशनी माने, ज्योति नाईक, करिश्मा पाटोळे, मोनिका खरात, स्वरूपा दळवी, अंकिता माने, मंगेश चव्हाण, अस्मिता मस्कर, रंगारंग कार्यक्रम के विशेष सहयोगी ‘राजस्थानी मंडल लोखंडवाला कॉम्पलेक्स’ के साथ स्थानीय पुलिस विभाग, मनपा विभाग, अग्निशमन दल के साथ लोखंडवाला गार्डन के पदाधिकारियों के सहयोग को सराहा जा सकता है। चतुर्थ वर्षीय ‘आपणोंं राजस्थान’ कार्यक्रम में राजस्थानी एकता का बिगुल बजा महाराष्ट्र की भूमि पर देखा गया राजस्थान दिनांक २३ मार्च २०१९ को ‘आपणों राजस्थान’ कार्यक्रम के दूसरे दिन की शुरूवात बड़े हर्षोल्लास व उमंग भरी रही, कार्यक्रम की शुरूवात नैनमल सुराणा फांउडेशन के ट्रस्टी श्री कैलाश सुराणा, सतीश सुराणा, सुमन अग्रवाल द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया, सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रारंभ पाश्र्वगायक व संगीतकार रवि जैन ने गीत के माध्यम से किया, जिसमें उनका सहयोग दिया गायिका अर्चना जैन ने दिया, राजस्थानी महिला मण्डल की बच्चियों ने कथक नृत्य प्रस्तुत कर सभी को अपनी ओर आकर्षित कर किया। नृत्यांगना बरखा पंडित के ‘इंजन की सीटी’ पर नृत्य प्रस्तुती से सभी दर्शक झुम उठे। राजस्थान लोखण्डवाला मंडल के तीन बच्चों ने आज की पीढी का प्रतिनिधित्व करते हुए नृत्य प्रस्तुत किया, श्रीमती शीतल जी के मधुर गीत सुन सभी दर्शक-श्रोतागण उनकी तारिफ किए बगैर नहीं रह सके, कार्यक्रमों के बीच विभिन्न संस्थाओं के पधारे अध्यक्षों का सम्मान किया गया, सम्मानित होने वाली हस्तीयों में सर्वश्री जगदीश लढ्ढा, जगदीश प्रसाद अग्रवाल, आशीर्वाद संस्था के उमाशंकर वाजपेयी, राजस्थानी मुस्लिम समाज के हाजी इकबाल तंवर, बच्छराज दुग्गड़, दीनदयाल मुरारका, राम प्रकाश बुबना, गोपाल सारडा आदि, इसी दौरान पद्मकथा श्री जैन रामायण, सीरियल के पोस्टर का विमोचन किया गया, जिसमें जैन रामायण की पूर्ण टीम मंच पर उपस्थित रही, संगीतकार दिलीप सेन को उनके राजस्थानी गीत व संगीत के प्रति समर्पण के लिए सम्मान पत्र प्रदान किया गया। कोकिला कंठी इंदु अग्रवाल ने अपनी सुमधुर आवाज में गणेश वंदना व होली गीत प्रस्तुत की, जिससे पुरा माहोल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंज उठा।   ना देखा गया आज तक-ना ही सोचा गया, २४ मार्च को आपणों राजस्थान का कार्यक्रम दिनांक २४ मार्च को सुबह आयोजित विश्व प्रसिद्ध अमृतवाणी सत्संग के पश्चात अमृतवाणी प्रवर्तक आध्यात्मिक गुरू डॉ. श्री राजेन्द्र जी महाराज जी को ‘आपणों राजस्थान’ की तरफ राजस्थान रत्न से संस्थापक बिजय कुमार जैन जी द्वारा सम्मानित किया गया।दिनांक २४ मार्च को कार्यक्रम का शुभारंभ शाम को आए हुए अतिथियों द्वारा ईश्वर के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर किया गया, स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन निवास करता है, इसी की तर्ज पर कोकीला बेन धीरूभाई अम्बानी हॉस्पीटल से पधारे डॉक्टर्स की श्रृंखला में डॉ. विलास लढ्ढा, हृदय चिकित्सा डॉ. प्रविण कहाले, कैंसर विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत न्याति ने लोगों को बीमारीयों के कारण व उनसे बचने के उपायों पर चर्चा प्रस्तुत की, मुख्य रूप से कैंसर के लक्षण पर चर्चा की गई तत्पश्चात गायक सतिश देहरा द्वारा संगीतमय संध्या का कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, इसी बीच विभिन्न संस्थाओं के अध्यक्ष को सम्मान पत्र व पगड़ी पहना कर सम्मानित होने वाली हस्तियां सर्वश्री सतिश देहरा, बंटी ठाकुर (गायक), कानबिहारी अग्रवाल, अमरीशचंद अग्रवाल, महेश बंसीधर अग्रवाल, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल (मन्नुसेठ), उदेश अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल (बिरजू भाई), अशोक जैन, विजय सिंह सिसोदिया, तुलसीराम कयाल, नवरत्न दुग्गड, विश्वनाथ जोशी, मुरली बालाण, जे. पी. खेमका, तुलसीराम कयाल, सुभाष जांगीड, सुरजमल माकड़, पन्नालाल सारडा आदि ने अपनी उपस्थिति देकर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिया। पूर्व अध्यक्ष मुंबई कांग्रेस संजय निरूपम ने अपनी उपस्थिति देकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ा दी, कार्यक्रम को सम्पन्न बनाने के लिए सर्वश्री कानबिहारी अग्रवाल व राजस्थानी मंडल के पदाधिकारी दिलीप सांगानेरिया, ओम प्रकाश शाह, अमित अग्रवाल, गगन गुप्ता, शिव बागड़ी, श्रीमती अनुपमा शर्मा, स्वरूपा, आशा कुमार, संध्या मौर्या, आकाश कुंभार, मंगेश, भूपेंद्र कोरी का विशेष सहयोग रहा। ने संभाली तीन दिवसीय भव्यातिभव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का समापन जय-जय राजस्थान के घोष के साथ सम्पन्न हुआ। -मैं भारत हूॅ

रामनवमी पर्व का महत्व, पूजा विधि और पूजन मुहूर्त

रामनवमी पर्व का महत्व, पूजा विधि और पूजन मुहूर्त चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इस दिन पूरे देश भर में श्रीराम जन्मोत्सवों की धूम रहती है, साथ ही हिंदुओं के लिए यह दिन अंतिम नवरात्र होने के कारण भी काफी महत्वपूर्ण होता है।चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इस दिन को रामनवमी के नाम से मनाया जाता है, इस वर्ष यह पर्व २५ मार्च को पड़ रहा है। रामनवमी हिंदुओं के लिए बहुत महत्व का पर्व है, इस दिन पूरे देश भर में श्रीराम जन्मोत्सवों की धूम रहती है, साथ ही यह दिन अंतिम नवरात्र होने के कारण भी काफी महत्वपूर्ण होता है, इस दिन देवी की विशिष्ट पूजा, हवन और कन्या पूजन भी किया जाता है।गोस्वामी तुलसीदास ने अपने अमर काव्य रामचरितमानस की रचना भी इसी दिन अयोध्या में आरम्भ की थी, अयोध्या नगर और रामभक्तों के लिए तो यह पर्व काफी महत्ता रखता है और इस पर्व को देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदुओं के बीच आनंद और उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।इस तरह करें पूजन पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीराम का जन्म मध्याह्न काल में हुआ था, यही कारण है कि इस दिन तीसरे प्रहर तक व्रत रखा जाता है और दोपहर में ही मनाया जाता है राम महोत्सव। आज के दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और रामचरितमानस की पूजा करनी चाहिए, भगवान श्रीराम की मूर्ति को शुद्ध पवित्र ताजे जल से स्नान कराकर नवीन वस्त्राभूषणों से सज्जित करें और फिर धूप दीप, आरती, पुष्प, पीला चंदन आदि अर्पित करते हुए भगवान की पूजा करें। रामायण में वर्णित श्रीराम जन्म कथा का श्रद्धा भक्ति पूर्वक पाठ और श्रवण तो इस दिन किया ही जाता है अनेक भक्त रामायण का अखण्ड पाठ भी करते हैं। भगवान श्रीराम को दूध, दही, घी, शहद, चीनी मिलाकर बनाया गया पंचामृत तथा भोग अर्पित किया जाता है। भगवान श्रीराम का भजन, पूजन, कीर्तन आदि करने के बाद प्रसाद को पंचामृत सहित श्रद्धालुओं में वितरित करने के बाद व्रत खोलने का विधान है। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं श्रीरामभगवान श्रीराम सदाचार के प्रतीक हैं, उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। भगवान राम को उनके सुख-समृद्धि पूर्ण व सदाचार युक्त शासन के लिए याद किया जाता है। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्वी पर अजेय रावण से युद्ध लड़ने के लिए आए। आज के दिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में मन्दिरों में जाते हैं और उनके जन्मोत्सव को मनाने के लिए उनकी मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। भगवान राम का जन्म स्थान अयोध्या, रामनवमी त्यौहार के अनुष्ठान का केंद्र बिन्दु है, यहां राम जन्मोत्सव से संबंधित रथ यात्राएं बहुत से मंदिरों से निकाली जाती हैं। अयोध्या का तो रामनवमी पर लगने वाला चैत्र रामनवमी मेला काफी प्रसिद्ध है जिसमें देश भर से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं।भगवान श्रीराम जीव मात्र के कल्याण के लिए अवतरित हुए थे, वह हिन्दू धर्म में परम पूज्य हैं, हिन्दू धर्म के कई त्यौहार जैसे रामनवमी, दशहरा और दीपावली, राम की जीवन-कथा से जुड़े हुए हैं, श्रीराम आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति, आदर्श मित्र, आदर्श स्वामी, आदर्श वीर, आदर्श देश सेवक होने के साथ ही साथ साक्षात परमात्मा भी थे। भगवान श्रीराम ने त्रेतायुग में देवताओं की प्रार्थना सुनकर पृथ्वी का भार हरण करने के लिए अयोध्यापति महाराज दशरथ के यहां चैत्र शुक्ल नवमी के दिन जन्म लिया और राक्षसों का वध कर त्रिलोक में अपनी कीर्ति को स्थापित किया। व्रत कथाराम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे थे। सीता जी और लक्ष्मण को थका हुआ देखकर राम जी ने थोड़ा रुककर आराम करने का विचार किया और एक बुढिया के घर गए। बुढिया सूत कात रही थी। बुढिया ने उनकी आवभगत की और बैठाया, स्नान-ध्यान करवाकर भोजन करवाया। राम जी ने कहा- बुढिया माई, ‘पहले मेरा हंस मोती चुगाओ, तो मैं भी करूं।’ बुढिया बेचारी के पास मोती कहां से आता जो कि सूत कात कर गुजारा करती थी। अतिथि को ना कहना भी वह ठीक नहीं समझती, दुविधा में पड़ गई, अत: दिल को मजबूत कर राजा के पास पहुंच गईं और अंजली मोती देने के लिये विनती करने लगीं, राजा अचम्भे में पड़ा कि इसके पास खाने को दाने नहीं हैं और मोती उधार मांग रही है, इस स्थिति में बुढिया से मोती वापस प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं उठता, आखिर राजा ने अपने नौकरों से कहकर बुढिया को मोती दिला दिये।बुढिया मोती लेकर घर आई, हंस को मोती चुगाए और मेहमानों की आवभगत की, रात को आराम कर सवेरे राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी जाने लगे।राम जी ने जाते हुए उसके पानी रखने की जगह पर मोतियों का एक पेड़ लगा दिया, दिन बीतते गये और पेड़ बड़ा हुआ, पेड़ बढ़ने लगा, पर बुढिया को कुछ पता नहीं चला।मोती के पेड़ से पास-पड़ोस के लोग चुग-चुगकर मोती ले जाने लगे। एक दिन जब बुढिया उसके नीचे बैठी सूत कात रही थी, तो उसकी गोद में एक मोती आकर गिरा। बुढिया को तब ज्ञात हुआ, उसने जल्दी से मोती बांधेऔर अपने कपड़े में बांधकर वह किले की ओर ले चली, उसने मोती की पोटली राजा के सामने रख दी, इतने सारे मोती देख राजा अचम्भे में पड़ गया, उसके पूछने पर बुढिया ने राजा को सारी बात बता दी। राजा के मन में लालच आ गया, वह बुढिया से मोती का पेड़ मांगने लगा, बुढिया ने कहा कि आस-पास के सभी लोग ले जाते हैं, आप भी चाहें तो ले लें, मुझे क्या करना है।राजा ने तुरन्त पेड़ मंगवाया और अपने दरबार में लगवा दिया, पर रामजी की मर्जी, मोतियों की जगह कांटे हो गये और लोगों के कपड़े उन कांटों से खराब होने लगे, एक दिन रानी की ऐड़ी में एक कांटा चुभ गया और पीड़ा करने लगा, राजा ने पेड़ उठवाकर बुढिया के घर वापस भिजवा दिया, पेड़ पर पहले की तरह से मोती लगने लगे, बुढिया आराम से रहती और खूब मोती बांटती रही। राम नवमी डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर एक महान विचारक अंबेडकर जयंती २०१९ को पूरे भारत के लोगों द्वारा १४ अप्रैल, रविवार को मनाया जायेगा।भारत के लोगों के लिये डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस और उनके योगदान को याद करने के लिये १४ अप्रैल को एक उत्सव से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ लोगों के द्वारा अंबेडकर जयंती को मनाया जाता है, उनके स्मरणों को श्रद्धांजलि देने के लिये वर्ष २०१५ में, १२४ वाँ जन्मदिवस उत्सव था, ये भारत के लोगों के लिये एक बड़ा क्षण था, वर्ष १८९१ में उनका जन्म हुआ था, इस दिन को पूरे भारत वर्ष में सार्वजनिक अवकाश के रुप में घोषित किया गया, नयी दिल्ली, संसद में उनकी मूर्ति पर हर वर्ष भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री (दूसरे राजनैतिक पार्टियों के नेताओं सहित) द्वारा सदा की तरह एक सम्माननीय श्रद्धांजलि दिया गया, अपने घर में उनकी मूर्ति रखने के द्वारा भारतीय लोग एक भगवान की तरह उनकी पूजा करते हैं, इस दिन उनकी मूर्ति को सामने रख लोग परेड करते हैं, वो लोग ढोल बजाकर नृत्य का भी आनन्द लेते हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर के बारे में : डॉ भीमराव अंबेडकर का जन्म १४ अप्रैल १८९१ को ब्रिटिश भारत (मध्य प्रदेश) के केन्द्रीय प्रांत के महू जिले में एक गरीब महार परिवार में हुआ था, इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था और माता का नाम भीमाबाई था, इनका निधन ६ दिसंबर १९५६ को दिल्ली में हुआ था। भारतीय समाज में अपने दिये महान योगदान के लिये वो लोगों के बीच बाबासाहेब नाम से जाने जाते थे, आधुनिक बौद्धधर्मी आंदोलन लाने के लिये भारत में बुद्ध धर्म के लिये धार्मिक पुनरुत्थानवादी के साथ ही अपने जीवन भर उन्होंने एक विधिवेत्ता, दर्शनशास्त्री, समाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, इतिहासकार, मनोविज्ञानी और अर्थशास्त्री के रुप में देश सेवा की, वो स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे और भारतीय संविधान का ड्रॉफ्ट तैयार किया था। शुरुआती जीवन : भारत में सामाजिक भेदभाव और जातिवाद को जड़ से हटाने के अभियान के लिये उन्होंने अपने पूरे जीवनभर तक संघर्ष किया, निम्न समूह के लोगों को प्रेरणा देने के लिये उन्होंने खुद से बौद्ध धर्म को अपना लिया था जिसके लिये भारतीय बौद्धधर्मियों के द्वारा एक बोधिसत्व के रुप में उन्हें बताया गया था, उन्होंने अपने बचपन से ही सामाजिक भेदभाव को देखा था जब उन्होंने सरकारी स्कूल में दाखिला लिया था, उन्हें और उनके दोस्तों को उच्च वर्ग के विद्यार्थियों से अलग बैठाया जाता था और शिक्षक उन पर कम ध्यान देते थे, यहाँ तक कि, उन्हें कक्षा में बैठने और पानी को छूने की अनुमति भी नहीं थी, उन्हें उच्च जाति के किसी व्यक्ति के द्वारा दूर से ही पानी दिया जाता था। शिक्षा : अपने शुरुआती दिनों में उनका उपनाम अंबावेडेकर था, जो उन्हें रत्नागिरी जिले में ‘अंबावड़े’ के अपने गाँव से मिला था, जो बाद में उनके ब्राह्मण शिक्षक, महादेव अंबेडकर के द्वारा अंबेडकर में बदल दिया गया था, उन्होंने १८९७ में एकमात्र अस्पृश्य के रुप में बॉम्बे के एलफिनस्टोन हाई स्कूल में दाखिला लिया था, १९०६ में ९ वर्ष की रामाबाई से शादी की, १९०७ में अपनी मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने सफलता पूर्वक दूसरी परीक्षा के लिये कामयाबी हासिल की। अंबेडकर साहब ने वर्ष १९१२ में बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल की। बाबा साहेब ३ साल तक हर महीने ११.५० यूरो के बड़ौदा राज्य छात्रवृत्ति से पुरस्कृत होने के बाद न्यू यार्क शहर में कोलंबिया विश्वविद्यालय में अपने परास्नातक को पूरा करने के लिये १९१३ में अमेरिका चले गये थे, उन्होंने अपनी एमए की परीक्षा १९१५ में और अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री १९१७ में प्राप्त की, १९२१ में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अपनी मास्टर डिग्री और १९२३ अर्थशास्त्र में डी.एस. सी. प्राप्त की। अंबेडकर जयंती क्यों मनायी जाती है : भारत के लोगों के लिये उनके विशाल योगदान को याद करने के लिये बहुत ही खुशी से भारत के लोगों द्वारा अंबेडकर जयंती मनायी जाती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीयसंविधान के पिता थे जिन्होंने भारत के संविधान का ड्रॉफ्ट (प्रारुप) तैयार किया था, वो एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिनका जन्म १४ अप्रैल १८९१ को हुआ था, उन्होंने भारत के निम्न स्तरीय समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा की जरुरत के लक्ष्य को फैलाने के लिये भारत में वर्ष १९२३ में ‘बहिष्कृत हितकरनी सभा’ की स्थापना की थी, इंसानों की समता के नियम के अनुसरण के द्वारा भारतीय समाज को पुनर्निर्माण के साथ ही भारत में जातिवाद को जड़ से हटाने के लक्ष्य के लिये ‘शिक्षित करना-आंदोलन करना-संगठित करना’ के नारे का इस्तेमाल कर लोगों के लिये वो एक सामाजिक आंदोलन चला रहे थे।अस्पृश्य लोगों के लिये बराबरी के अधिकार की स्थापना के लिये महाराष्ट्र के महाड में वर्ष १९२७ में उनके द्वारा एक मार्च का नेतृत्व किया गया था जिन्हें ‘सार्वजनिक चॉदर झील’ के पानी का स्वाद या यहाँ तक की छूने की भी अनुमति नहीं थी। जाति विरोधी आंदोलन, पुजारी विरोधी आंदोलन और मंदिर में प्रवेश आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत करने के लिये भारतीय इतिहास में उन्हें चिन्हित किया जाता है।वास्तविक मानव अधिकार और राजनीतिक न्याय के लिये महाराष्ट्र के नासिक में वर्ष १९३० में उन्होंने मंदिर में प्रवेश के लिये आंदोलन का नेतृत्व किया था, उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के लोगों की सभी समस्याओं को सुलझाने के लिये राजनीतिक शक्ति ही एकमात्र तरीका नहीं है, उन्हें समाज में हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिलना चाहिये। १९४२ में वाइसराय की कार्यकारी परिषद की उनकी सदस्यता के दौरान निम्न वर्ग के लोगों के अधिकारों को बचाने के लिये कानूनी बदलाव बनाने में वो गहराई से शामिल थे। भारतीय संविधान में राज्य नीति के मूल अधिकारों (सामाजिक आजादी के लिये, निम्न समूह के लोगों के लिये समानता और अस्पृश्यता का जड़ से उन्मूलन) और नीति निदेशक सिद्धांतों (संपत्ति के सही वितरण को सुनिश्चित करने के द्वारा जीवन निर्वाह के हालात में सुधार लाना) को सुरक्षा देने के द्वारा उन्होंने अपना बड़ा योगदान दिया। बुद्ध धर्म के द्वारा अपने जीवन के अंत तक उनकी सामाजिक क्रांति जारी रही। भारतीय समाज के लिये दिये गये उनके महान योगदान के लिये १९९० के अप्रैल महीने में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।पूरे भारत भर में वाराणसी, दिल्ली सहित दूसरे बड़े शहरों में बेहद जुनून के साथ अंबेडकर जयंती मनायी जाती है। कचहरी क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर जयंती समारोह समिति के द्वारा डॉ. अंबेडकर के जन्मदिवस उत्सव के लिये कार्यक्रम वाराणसी में आयोजित होता है, वो विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हैं जैसे चित्रकारी, सामान्य ज्ञान प्रश्न-उत्तर प्रतियोगिता, चर्चा, नृत्य, निबंध लेखन, परिचर्चा, खेल प्रतियोगिता और नाटक जिसके लिये पास के स्कूलों के विद्यार्थीयों सहित कई लोग भाग लेते हैं, इस उत्सव को मनाने के लिये, लखनऊ में भारतीय पत्रकार लोक कल्याण संघ द्वारा हर वर्ष एक बड़ा सेमीनार आयोजित किया जाता है।वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर बाबा शमशान नाथ मंदिर में तीन दिवसीय लंबा (१५ अप्रैल से १७ अप्रैल) उत्सव रखा गया, जहाँ नृत्य और संगीत के कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये थे। सुबह में जूनियर हाई स्कूल और प्राईमरी स्कूल के विद्यार्थियों ने एक प्रभात फेरी बनायी और सेकण्डरी स्कूल के विद्यार्थी इस दिन रैली में भाग लिये, कई जगहों पर, गरीब लोगों के लिये मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण और दवा उपलब्ध कराने के लिये मुफ्त स्वास्थ्य परीक्षण कैंप भी आयोजित किया गया था।निम्न वर्ग समूह के लोगों के लिये अस्पृश्यता के सामाजिक मान्यता को मिटाने के लिये उन्होंने काम किया। बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत करने के दौरान उनकी सामाजिक स्थिति को बढ़ाने के लिये समाज में अस्पृश्यों को ऊपर उठाने के लिये उन्होंने विरोध किया। दलित वर्ग के जातिच्युतता लोगों के कल्याण और उनके सामाजिक-आर्थिक सुधार के लिये अस्पृश्यों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये ‘बहिष्कृत हितकरनी सभा’ कहे जाने वाले एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। ‘मूक नायक, बहिष्कृत भारत और जनता समरुपता’ जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन द्वारा उन्होंने दलित अधिकारों की भी रक्षा की, उन्होंने एक सक्रिय सार्वजनिक आंदोलन की शुरुआत की और हिन्दू मंदिरों (१९३० में कालाराम मंदिर आंदोलन) में प्रवेश के साथ ही जल संसाधनों के लिये अस्पृश्यता को हटाने के लिये १९२७ में प्रदर्शन किया। दलित वर्ग के अस्पृश्य लोगों के लिये सीट आरक्षित करने के लिये पूना संधि के द्वारा उन्होंने अलग निर्वाचक मंडल की माँग की। १५ अगस्त १९४७ को भारत की स्वतंत्रता के बाद पहले कानून मंत्री के रुप में सेवा देने के लिये उन्हें काँग्रेस सरकार द्वारा आमंत्रित किया गया था और २९ अगस्त १९४७ को संविधान सभा के अध्यक्ष के रुप में नियुक्त किये गये जहाँ उन्होंने भारत के नये संविधान का ड्रॉफ्ट तैयार किया जिसे २६ नवंबर १९४९ में संवैधानिक सभा द्वारा अंगीकृत किया गया।भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में इन्होंने एक बड़ी भूमिका निभायी क्योंकि वो एक पेशेवर अर्थशास्त्री थे। अर्थशास्त्र पर अपने तीन सफल अध्ययनशील किताबों जैसे ‘प्रशासन और ईस्ट इंडिया कंपनी का वित्त, ब्रिटिश इंडिया में प्रान्तीय वित्त के उद्भव और रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और समाधान’ के द्वारा हिल्टन यंग कमीशन के लिये अपने विचार देने के बाद १९३४ में भारत के रिजर्व बैंक को बनाने में वो सफल हुये, इन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की योजना में अपनी भूमिका निभायी,क्योंकि कि उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री विदेश से हासिल की थी। देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिये औद्योगिकीकरण और कृषि उद्योग की वृद्धि और विकास के लिये लोगों को बढ़ावा दिया। खाद्य सुरक्षा लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने सरकार को सुझाव दिया था, अपनी मूलभूत जरुरत के रुप में इन्होंने लोगों को अच्छी शिक्षा, स्वच्छता और समुदायिक स्वास्थ्य के लिये बढ़ावा दिया, इन्होंने भारत की वित्त कमीशन की स्थापना की थी।भारत के जम्मू कश्मीर के लोगों के लिये विशेष दर्जा उपलब्ध कराने के लिये भारतीय संविधान में अनुच्छेद ३७० के खिलाफ थे। महावीर जन्मकल्याणक पर्व २०१९ जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को ५९९ ईसवीं पूर्व बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के घर हुआ।भगवान महावीर जी के बचपन का नाम वर्धमान था, उनके जन्म के बाद राज्य दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था, जिसके चलते इनका नाम वर्धमान रखा गया। महावीर जयंती का पर्व जैन अनुयायियों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३ वें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त करने के १८८ वर्ष बाद भगवान महावीर का जन्म हुआ था। अहिंसा परमो धर्म: अर्थात् अहिंसा सभी धर्मों से सर्वोपरि है, यह संदेश उन्होंने पूरी दुनिया को दिया व संसार का मार्गदर्शन किया, पहले स्वयं अहिंसा का मार्ग अपनाया और फिर दूसरों को इसे अपनाने के लिये प्रेरित किया ‘जियो और जीने दो’ का मूल मंत्र इन्हीं की देन है। वर्धमान महावीर से जुड़ी मान्यताएं जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि वर्धमान ने १२ वर्षों की कठोर तप कर अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लिया, जिससे उन्हें जिन कहा गया, विजेता कहा गया, उनका यह तप किसी पराक्रम से कम नहीं था, इसी के चलते उन्हें महावीर नाम से संबोधित किया गया और उनके दिखाए मार्ग पर चलने वाले जैन कहलाते हैं। जैन का तात्पर्य ही है जिन के अनुयायी, जैन धर्म का अर्थ है जिन द्वारा परिवर्तित धर्म, दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने कठिन दिगम्बर चर्या को अंगीकार किया और निर्वस्त्र रहे, हालाँकि श्वेताम्बर संप्रदाय के अनुसार महावीर दीक्षा उपरान्त कुछ समय छोड़कर निर्वस्त्र रहे और उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति दिगम्बर अवस्था में की, ऐसा माना जाता है कि भगवान महावीर अपने पूरे साधना काल के दौरान मौन रहे। महावीर के पांच सिद्धांत मोक्ष पाने के बाद, भगवान महावीर ने पांच सिद्धांत दर्शाए जो समृद्ध जीवन और आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं, जिनमें शामिल हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अंतिम पांचवा सिद्धांत अपरिग्रह। पहला सिद्धांत है अहिंसा: इस सिद्धांत के अनुसार जैनों को किसी भी परिस्थिति में हिंसा से दूर रहना चाहिए, भूल कर भी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाना है। दूसरा सिद्धांत है सत्य: भगवान महावीर कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ, जो बुद्धिमान सत्य के सानिध्य में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है, लोगों को हमेशा सत्य बोलना चाहिए। तीसरा सिद्धांत है अस्तेय: अस्तेय का पालन करने वाले किसी भी रूप में अपने मन के मुताबिक वस्तु ग्रहण नहीं करते, ये लोग संयम से रहते हैं और केवल वही लेते हैं जो उन्हें दिया जाता है। चौथा सिद्धांत है ब्रह्मचर्य: इस सिद्धांत के लिए जैनों को पवित्रता के गुणों का प्रदर्शन करने की आवश्यकता होती है; जिसके कारण वे कामुक गतिविधियों में भाग नहीं लेते। पांचवा अंतिम सिद्धांत है अपरिग्रह:यह शिक्षा सभी पिछले सिद्धांतों को जोड़ती है, अपरिग्रह का पालन करके, जैनों की चेतना जागती है और वे सांसारिक एवं भोग की वस्तुओं का त्याग कर देते हैं। महावीर जन्म कल्याणक उत्सव की गतिविधियांजैन धर्म का अनुसरण करने वाले ऐसी कई गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं जो उन्हें अपने परिजनों से जुड़ने और भगवान महावीर को याद करने का मौका देते हैं, इस दिन लोग महावीर की प्रतिमा को जल और सुगंधित तेलों से धोते हैं, यह महावीर की शुद्धता का प्रतीक है, यह नियमित पूजी जाने वाली सुंदर धार्मिक प्रतिमाओं को धोने के व्यावहारिक उद्देश्यों को भी पूरा करता है, जैनों द्वारा भगवान महावीर की प्रतिमा की शोभायात्रा निकाली जाती है, इस दौरान जैन भिक्षु एक रथ पर भगवान महावीर की प्रतिमा को लेकर हर जगह घुमाते हैं, उनके द्वारा बताये गए जीवन के सार को लोगों तक पहुँचाते हैं, महावीर जन्म कल्याणक के दौरान, दुनिया भर से लोग भारत के जैन मंदिरों में दर्शन करने के लिए आते हैं, मंदिरों में जाने के अलावा, लोग महावीर और जैन धर्म से संबंधित पुरातन स्थानों पर भी जाते हैं।गोमटेश्वर, दिलवाड़ा, रणकपुर, सोनागिरि और शिखरजी जैन धर्म के कुछ सबसे लोकप्रिय स्थानों में से एक हैं, महावीर जन्म कल्याणक पर्व तीर्थंकर महावीर के जन्म व जैन धर्म की स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। क्या प्रश्न उत्तर नहीं हो सकता? नाम:सलिल सरोजपता: बी ३०२, तीसरी मंजिलसिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्समुखर्जी नगरनई दिल्ली-११०००९उम्र:३१ वर्षशिक्षा: सैनिक स्कूल तिलैया, कोडरमा, झारखण्ड से १०वीं और १२वीं उतीर्ण।१२वीं में स्कूल का बायोलॉजी का सर्वाधिक अंक ९५/१०० जी डी कॉलेज, बेगूसराय, बिहार से इग्नू से अंग्रेजी में स्नातक एवं केंद्र टॉपर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से रूसी भाषा में स्नातक और तुर्की भाषा में एक साल का कोर्स और तुर्की जाने का छात्रवृति अर्जित। जीजस एन्ड मेरी कॉलेज, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली इग्नोउ से समाजशास्त्र में परास्नातक एवं नेट की परीक्षा पास।व्यवसाय: कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा, वैज्ञानिक विभाग, नई दिल्ली में सीनियर ऑडिटर के पद पर २०१४ से कार्यरत।सामाजिक एवं साहित्यिक सहयोग: बेगूसराय में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को अंग्रेज़ी की मुफ्त कोचिंग। मोहल्ले के बच्चों के कहानी, कविता और पेंटिंग को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय पत्रिका ‘कोशिश’ का प्रकाशन और सम्पादन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में विदेशी भाषा में स्नातक की परीक्षा के लिए ‘Splendid World Informatica’ किताब का सह लेखन एवं बच्चों को कोचिंग।बेगूसराय बिहार एवं अन्य राज्यों के हिंदी माध्यम के बच्चों के लिए ‘Remember Complete Dictionary’ किताब का अनुवाद। बेगूसराय,बिहार में स्थित अनाथालय में बच्चों को छोटा अनुदान। बचपन में राजहंस, क्रिकेट वल्र्ड की प्रतियोगिताओं में इनाम प्राप्त। सोशल मीडिया पर सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचारों को प्रस्तुत करना।उपलब्द्धियाँ: अमर उजाला काव्य, हिंदुस्तान समाचार पत्र, पटना, सांध्य दर्पण इंदौर, अन्तर शब्द शक्ति इंदौर, परिचय टाइम्स, विजय दर्पण टाइम्स, सरिता, पर्यटन प्रणाम सहित ८० से अधिक पत्रिकाओं, अखबार, ऑन लाइन साइट्स पर कविता, कहानी, लेख, व्यंग प्रकाशित, मातृभाषा के द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह ‘नवांकुर’ में मेरी कविताओं को स्थान प्राप्त, रवीना प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित निभा पत्रिका और मेरी रचना काव्य संग्रह में मेरी कविताएँ शामिल।विश्व पुस्तक मेला के दौरान ‘मेरे काव्य संग्रह’ यूँ ही सोचता हुआ’ का विमोचन।अपने कार्यालय में हिंदी दिवस पर आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में ३ साल से प्रथम स्थान प्राप्त, आरषी फाउंडेशन,भोपाल के द्वारा विकलांगों पर आयोजिय काव्य प्रतियोगिता में अखिल भारतीय २०वां स्थान, जिसका निर्णय गुलज़ार साहब ने किया था, मातृभाषा द्वारा काव्य प्रतियोगिता में तीसरा स्थान, जिसके तहत आशीष दलाल का उपन्यास पुरस्कार के रूप में प्राप्त हुआ। दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ खेल के दौरान पर्यटन मंत्रालय के द्वारा आयोजित ‘Earn while you learn’ कार्यक्रम का सफल प्रतिभागी, आगामी ४ किताबों पर काम चालू, यु ट्यूब पर शार्ट फिल्मों में सांग्स और डायलॉग, पश्चिम मध्य रेलवे महालेखा कार्यालय की पत्रिका ‘साँची’ में कविताओं को स्थान प्राप्त, कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा, वैज्ञानिक विभाग, कोलकाता शाखा से प्रकाशित पत्रिका में रचनाओं को स्थान प्राप्त। भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा विभाग अकादमी, शिमला द्वारा मेरी फोटोग्राफी के लिए सम्मान पत्र, प्रतियोगिता दर्पण पत्रिका अंग्रेज़ी अंक में डिबेट और निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त, मेरे द्वारा किए गए ड्राइंग की सराहना और पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त।

भारतीय संस्कृति एक संपूर्ण संस्कृति

‘‘संस्कृति का उद्गम शब्द संस्कार है।संस्कार का अर्थ है क्रिया जिससे व्यक्ति अथवा मानवीय काल- सापेक्ष दोष को दूर कर शुद्ध कर दिया जाए। मानवीय दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत उपक्रम ही संस्कृति है।’’वस्तुतः संस्कृति इतना व्यापक अर्थ वाला शब्द है जिससे एक बहुत बड़े मानव समुदाय के उन्नत होने का बोध होता है, एक लम्बे मानवीय अनुभव से सिद्ध उन सम्यक् चेष्टाओं का ज्ञान मिलता है जो उसके आचार, विचार, व्यवहार को उत्कृष्ट बनाते हैं, उसकी संस्थाओं को चलाते हैं तथा जिनके ऊपर उस भोगोलिक सीमा का आन्तरिक बाह्य विकास निर्भर करता है जहाँ वो निवास करते हैं। संक्षेप में संस्कृति मानव समुदाय के जीवन यापन की वह परम्परागत किंतु निरन्तर विकासोन्मुखी शैली है जिसका प्रशिक्षण पाकर मनुष्य संस्कारित सुघड़, प्रौढ़ और विकसित होता है। प्रत्येक संस्कृति के कुछ सार्वभौमिक आधार हैं, जिनके कारण वह जीवित रहती है, जिसमें ये सार्वभौम गुण जितने प्रचुर मात्रा में होते हैं, उतनी वह संस्कृति व्यापक और प्रभावशाली बन जाती हैं। सार्वभौमिक सत्यों पर ही संस्कृति अजर-अमर रहती है वह कभी नहीं मरती, भले ही समाज-राष्ट्र मर जाये। संकीर्णता-क्षुद्रता पर आधारित संस्कृतियाँ नष्ट हो जाती हैं, अतः किसी भी संस्कृति की महानता इस पर निर्भर करती है कि वह कितने सार्वभौमिक सत्यों पर खड़ी है और इसी कारण वह सब ओर गतिशील होती है।विश्व में अनेक संस्कृतियाँ पनपीं और मिट गई। आज उनका सिर्फ अवशेष ही बचा है, सिर्फ उनकी स्मृति बाकी है, लेकिन भारतीय संस्कृति का मूल अस्तित्व कभी नहीं मिटा, उसे मिटाने के बहुत प्रयास हुए और यह सिलसिला आज भी जारी है, पर कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी, भारतीय संस्कृति में आखिर क्या है, जो उसे हमेशा बचाए रखती है, जिसकी वजह से वह हजारों साल से विदेशी हमलावरों से लोहा लेती रही और लेती रहेगी, आखिर ऐसा कौन-सा तंत्र है जो हमलावार संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति को छिन्न-भिन्न नहीं पर पाती? हर बार उन्हें लगता है कि इस बार वे इसे अवश्य पदाक्रांत कर देंगी, पर हुआ हमेशा उलटा, वे खुद ही पदाक्रांत होकर भारतीय संस्कृति में विलीन हो गई।हजारों साल से क्यों और कैसे जीवित है भारतीय संस्कृति, क्या है इसके मूल तत्व, जो इसे नष्ट होने से हमेशा बचाते और विरोधी संस्कृतियों का मुकाबला करने की शक्ति देते रहे है, भारत में पनपी इस संस्कृति ने कैसे एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बड़े भूभाग को अपने प्रभाव में ले लिया।सिर्फ देह की शक्ति को महत्वपूर्ण मानने वाला स्पार्टा वीरों के लिए भले ही जाना जाता है, मगर विश्व की संस्कृतियों पर वह कोई प्रभाव नहीं डाल सका, वहाँ मनुष्य के मन को भारतीय संस्कृति जितना महत्त्व नहीं दिया गया, शायद इसीलिए रोम, मिस्र और काबुल आदि की प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट हो गई।‘भारतीय संस्कृति’ विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है, इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी कहा जाता है, जीने की कला हो या विज्ञान और राजनीति का क्षेत्र, भरतीय संस्कृति का सदैव विशेष स्थान रहा है, अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय की धारा के साथ-साथ नष्ट होती रही है, किन्तु भारत की संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है।विश्व के सभी क्षेत्रों और धर्मों की अपने रीति-रिवाजों, परम्पराओं और परिष्कृति गुणों के साथ अपनी संस्कृति है, भारतीय संस्कृति स्वाभाविक रूप से शुद्ध है जिसमें प्यार, सम्मान, दूसरों की भावनाओं का मान-सम्मान और संस्कार अन्तर्निहित है, भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वों, जीवन मूल्यों और वचन पह्ति में एक ऐसी निरन्तरता रही है कि आज भी करोड़ों भारतीय स्वयं को उन मूल्यों एवं चिन्तन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं और इससे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।भौगोलिक दृष्टि से भारत विविधताओं का देश है फिर भी सांस्कृतिक रूप से एक इकाई के रूप में इसका अस्तित्व प्राचीनकाल से बना हुआ है। भौगोलिक विभिन्नता के अतिरिक्त इस देश में आर्थिक और सामाजिक भिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान है, वस्तुत: इन भिन्नताओं के कारण ही भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित होकर पल्लवित और पुष्पित हुई हैं, अनेक विभिन्नताओं के बावजूद भी भारत की पृथक सांस्कृतिक सत्ता रही है। संस्कृति किसी समाज में गहराई तक व्याप्त गुणों के समग्र रूप का नाम है जो उस समाज के सोचने, विचारने, कार्य करने, खाने-पीने, बोलने, नृत्य, गायन, साहित्य, कला, वास्तु आदि में परिलक्षित होती है, संस्कृति का वर्तमान रूप किसी समाज के दीर्घ काल तक अपनायी गयी पद्धतियों का परिणाम होता है। मनुष्य स्वभावत: प्रगतिशील प्राणी है, यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है। सभ्यता से मनुष्य के भौतिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है, जबकि संस्कृति से मानसिक क्षेत्र की प्रगति सूचित होती है। हिमालय सम्पूर्ण देश के गौरव का प्रतीक रहा है, गंगा-यमुना और नर्मदा जैसी नदियों की स्तुति यहाँ के लोग प्राचीनकाल से करते आ रहे हैं। राम, कृष्ण और शिव की आराधना यहाँ सदियों से की जाती रही है। भारत की सभी भाषाओं में इन देवताओं पर आधारित साहित्य का सृजन हुआ है, उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सम्पूर्ण भारत में जन्म, विवाह और मृत्यु के संस्कार एक समान प्रचलित हैं, विभिन्न-रीति-रिवाज, आचार-व्यवहार और तीज-त्यौहारों में भी समानता है। भाषाओं की विविधता अवश्य है फिर भी संगीत, नृत्य और नाटय के मौलिक स्वरूपों में आश्चर्यजनक समानता है, संगीत के सात स्वर और नृत्य के त्रिताल सम्पूर्ण भारत में समान रूप प्रचलित हैं। भारत अनेक धर्मों, सम्प्रदायों, मतों और पृथक आस्थाओं एवं विश्वासों का महादेश है तथापि इसका सांस्कृतिक समुच्चय और अनेकता में एकता का स्वरूप संसार के अन्य देशों के लिए विस्मय का विषय रहा है। हमारी संस्कृति की विशेषताओं पर गौर करें तो इसकी प्राचीनता वैश्विक संस्कृतियों में सर्वोपरि है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। सिन्धु घाटी की सभ्यता के विवरणों से भी प्रमाणित होता है कि आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले उत्तरी भारत के बहुत बड़े भाग में एक उच्च कोटि की संस्कृति का विकास हो चुका था, इसी प्रकार वेदों में परिलक्षित भारतीय संस्कृति न केवल प्राचीनता का प्रमाण है, अपितु वह भारतीय अध्यात्म और चिन्तन की भी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर भारतीय संस्कृति से रोम और यूनानी संस्कृति को प्राचीन तथा मिस्र, असीरिया एवं बेबीलोनिया जैसी संस्कृतियों के समकालीन माना गया है।दरअसल, भारतीय संस्कृति की सहिष्णु प्रकृति ने उसे दीर्घ आयु और स्थायित्व प्रदान किया है। भारतीय हिन्दू किसी देवी-देवता की आराधना करें या न करे, पूजा-हवन करे या न करे, स्वतंत्रता पर धर्म या संस्कृति के नाम पर कभी कोई बंधन नहीं लगाये गए, इसीलिए प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रतीक हिन्दू धर्म को धर्म न कहकर कुछ मूल्यों पर आधारित एक जीवनपद्धति की संज्ञा दी गई और हिन्दू का अभिप्राय किसी धर्म विशेष के अनुयायी से न लगाकर भारतीय से लगाया गया। भारतीय संस्कृति के इस लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई तब किसी न किसी महापुरुष ने इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा से मंडित कर दिया, इस दृष्टि से प्राचीनकाल में बुद्ध और महावीर के द्वारा, मध्यकाल में शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक और चैतन्य महाप्रभु के माध्यम से तथा आधुनिक काल में स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द एवं महात्मा ज्योतिबा फुले के द्वारा किये गए प्रयास इस संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर बन गए।भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हजारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियां अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्या तथा अन्य प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है, देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतनी ही है, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी।गीता और उपनिषदों के सन्देश हजारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। किंचित परिवर्तनों के बावजूद भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में एक ऐसी निरन्तरता रही है कि आज भी करोड़ों भारतीय स्वयं को उन मूल्यों एवं चिन्तन प्रणाली से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता एवं उदारता के कारण उसमें एक ग्रहणशीलता प्रवृत्ति को विकसित होने का अवसर मिला, वस्तुत: जिस संस्कृति में लोकतन्त्र एवं स्थायित्व के आधार व्यापक हों, उस संस्कृति में ग्रहणशीलता की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो जाती है, हमारी संस्कृति में यहाँ के मूल निवासियों ने समन्वय की प्रक्रिया के साथ ही बाहर से आने वाले शक, हूण, यूनानी एवं कुषाण जैसी प्रजातियों के लोग भी घुलमिल कर अपनी पहचान खो बैठे।भारत में इस्लामी संस्कृति का आगमन भी अरबों, तुर्कों और मुगलों के माध्यम से हुआ, इसके बावजूद भारतीय संस्कृति का पृथक अस्तित्व बना रहा और नवागत संस्कृतियों से कुछ अच्छी बातें ग्रहण करने में भारतीय संस्कृति ने संकोच नहीं किया, ठीक यही स्थिति यूरोपीय जातियों के आने तथा ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत में विकसित हुई ईसाई संस्कृति पर भी लागू होती है, यद्यपि ये संस्कृतियाँ अब भारतीय संस्कृतियों का अभिन्न अंग हैं तथापि ‘भारतीय इस्लाम’ एवं ‘भारतीय ईसाई’ संस्कृतियों का स्वरूप विश्व के अन्य इस्लामी और ईसाई धर्मावलम्बी देशों से कुछ भिन्न है, इस भिन्नता का मूलभूत कारण यह है कि भारत के अधिकांश मुसलमान और ईसाई मूलतः भारत भूमि के ही निवासी हैं, संभवत: उनके सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक आचरण में कोई परिवर्तन नहीं हो पाया और भारतीयता ही उनकी पहचान बन गई।भारतीय संस्कृति में आश्रम-व्यवस्था के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों का विशिष्ट स्थान रहा है, वस्तुत: इन पुरुषार्थों ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अद्भुत समन्वय कर दिया। हमारी संस्कृति में जीवन के ऐहिक और पारलौकिक दोनों पहलुओं से धर्म को सम्बद्ध किया गया था, धर्म उन सिद्धान्तों, तत्त्वों और जीवन प्रणाली को कहते हैं, जिससे मानव जाति परमात्मा प्रदत्त शक्तियों के विकास से अपना लौकिक जीवन सुखी बन सके तथा मृत्यु के पश्चात जीवात्मा शान्ति का अनुभव कर सके।शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, यह अमरता मोक्ष से जुड़ी हुई है और यह मोक्ष पाने के लिए अर्थ और काम के पुरुषार्थ करना भी जरूरी है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में धर्म और मोक्ष, आध्यात्मिक सन्देश एवं अर्थ और काम की भौतिक अनिवार्यता परस्पर सम्बद्ध है। आध्यात्मिकता और भौतिकता के इस समन्वय में भारतीय संस्कृति की वह विशिष्ट अवधारणा परिलक्षित होती है, जो मनुष्य के इस लोक और परलोक को सुखी बनाने के लिए भारतीय मनीषियों ने निर्मित की थी। सुखी मानव-जीवन के लिए ऐसी चिन्ता विश्व की अन्य संस्कृतियाँ नहीं करती। साहित्य, संगीत और कला की सम्पूर्ण विधाओं के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति के इस आध्यात्मिक एवं भौतिक समन्वय को सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। भौगोलिक दृष्टि से भारत विविधताओं का देश है, फिर भी सांस्कृतिक रूप से एक इकाई के रूप में इसका अस्तित्व प्राचीनकाल से बना हुआ है, इस विशाल देश में उत्तर का पर्वतीय भू-भाग, जिसकी सीमा पूर्व में ब्रह्मपुत्र और पश्चिम में सिन्धु नदियों तक विस्तृत है, इसके साथ ही गंगा, यमुना, सतलुज की उपजाऊ कृषि भूमि, विन्ध्य और दक्षिण का वनों से आच्छादित पठारी भू-भाग, पश्चिम में थार का रेगिस्तान, दक्षिण का तटीय प्रदेश तथा पूर्व में असम और मेघालय का अतिवृष्टि का सुरम्य क्षेत्र सम्मिलित है, इस भौगोलिक विभिन्नता के अतिरिक्त इस देश में आर्थिक और सामाजिक भिन्नता भी पर्याप्त रूप से विद्यमान है, वस्तुत: इन भिन्नताओं के कारण ही भारत में अनेक सांस्कृतिक उपधाराएँ विकसित होकर पल्लवित और पुष्पित हुई हैं।भारत ही केवल एक ऐसा देश है जहाँ सर्वधर्म समभाव का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है, जितनी इज्जत हम अपने धर्म की करते हैं, उतनी ही इज्जत हमें दूसरों के धर्म की करनी चाहिये, यहाँ सुबह-सुबह मंदिर से मन्त्रोच्चार की ध्वनि, मस्जिद से अजान, गुरूद्वारे से शबद कीर्तन की आवाज और चर्च के प्रार्थना की पुकार एक साथ सुनी जा सकती है, जितनी भाषायें यहाँ बोली जाती हैं, विश्व में कहीं और नहीं बोली जाती। बोल-चाल, खान-पान, रहनसहन में अनेकता होते हुए भी हम एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे के तीज त्योहार में शिरकत करते हैं, होली, दीवाली, ईद, बाराबफात, मुहर्रम, गुरपर्ब और क्रिसमस साथ-साथ मनायी जाती है, मजारों और मकबरों पर हिन्दुओं द्वारा चादर चढ़ाना और दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का मंदिरों और गुरुद्वारों पर दर्शन करना, मत्था टेकना बहुत आम बात है, यह हमारे धर्म और लोकाचार की सहनशीलता का जीता-जागता उदाहरण है, रही बात हमारे विभिन्न प्रकार के देवी देवता होने की, तो हिन्दू धर्म में प्रकृति को हर तरह से पूजा गया है, चाहे वह वायु, जल, पृथ्वी, अग्नि या आकाश हो। इस प्रकार से हम प्रकृति के हर रूप की पूजा करते हैं, चाहे वह पहाड़ हो या कोई जीव जन्तु या हमारी वन्य संपदा, हमारी संस्कृति में इन सबको विशेष स्थान दिया गया है। दुनिया में ऐसी कोई संस्कृति नहीं होगी जहाँ प्रकृति को विभिन्न रूपों और स्वरूपों में पूजा गया है, अगर बात त्योहारों से जुड़ी कहानियों की करें, तो सामान्य जनता जो उपनिषदों वेदों की लिखी गूढ़ बातों को नहीं समझ सकती, उनको लोक आचरण के लिये विभिन्न ऋषि-मुनियों ने अनेक गाथायें लिखीं और उनको विभिन्न त्योहारों से इस तरह से जोड़ा कि सामान्य जन भी उसके साथ जुड़ सके और उसे अपना सके साथ ही ईश्वर का ध्यान और मनन कर सके, इससे अतिरिक्त और भी चीजें हमारी संस्कृति में जुड़ती रहीं, सभी का उल्लेख करना तो सम्भव नहीं हो सकेगा… प्रमुख रूप से क्रिकेट की संस्कृति है, यह खेल अब हमारी संस्कृति में शामिल हो गया है, क्रिकेटरों के अच्छे-बुरे प्रदर्शन पर हम हंसते-रोते हैं, इनको अपने बच्चों से भी ज्यादा प्यार करते हैं, भगवान जैसी पूजा करते हैं, जब जीतते हैं तो तालिया बजाते हैं, जब हारते हैं तो गालिया देते हैं, समस्या यहाँ आती है कि हम अपनी संस्कृति का कितना मान रख पाते हैं, वेद शास्र आपको रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन आपको उन पर चलते के लिये बाध्य नहीं कर सकते, एक और बात, चूंकि ये सारे शास्र गूढ़ भाषा में लिखे गये थे, इसलिये समय-समय पर अनेक स्वार्थी धर्माचार्यों ने अपने और कुछ राजनीतिज्ञों के निहित स्वार्थों के लिये, इन शास्त्रों का मनमाने ढंग से विवेचना कर अपने फायदे के लिये इस्तेमाल किया और अपनी दुकानें चलायीं, भाई को भाई से लड़ाया और विभिन्न समुदायों में आपस में बैर और नफरत फैलायी, जो आज तक जारी है, इन्हीं लोगों की वजह से हमारी यहाँ कभी-कभी दंगे फसाद होते हैं, लेकिन आपसी भाईचारा कभी खत्म नहीं होता।मार्क ट्वेन ने १८५६ में जब भारत का दौरा किया था तो उसने लिखा था, ‘‘भारत सांस्कृतिक रूप से परिपूर्ण राष्ट्र है’’ वैसे भी समय-समय पर कई विदेशी विद्वानों ने भारत का दौरा किया और यहाँ की संस्कृति को दुनिया में सबसे उन्नत माना, यही हमारी संस्कृति है और हम सभी भारतीयों को इस पर गर्व है।भारतीय संस्कृति स्थिर एवं अद्वितीय है जिसके संरक्षण की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी पर है, इसकी उदारता तथा समन्वयवादी गुणों ने अन्य संस्कृतियों को समाहित तो किया है, किन्तु अपने अस्तित्व के मूल को सुरक्षित रखा है। एक राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के दिल और आत्मा में बसती है। सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा भारतीय संस्कृति अग्रणी है। – डॉ. आशीष कंधवे गुड़ी प़ाडवा २०१९ गुड़ी पाड़वा का पर्व महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गोवा सहित दक्षिण भारतीय राज्यों में उल्लास के साथ मनाया जाता है, चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पाड़वा का त्यौहार मनाया जाता है, इस दिन को नवसंवत्सर के रुप में पूरे देश भर में मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व को लेकर खास मान्यताएं हैं, गुड़ी ध्वज यानि झंडे को कहा जाता है और पड़वा, प्रतिपदा तिथि को, मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था।दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा की लोकप्रियता का कारण इस पर्व से जुड़ी कथाओं से समझा जा सकता है। दक्षिण भारत का क्षेत्र रामायण काल में बालि का शासन क्षेत्र हुआ करता था, जब भगवान श्री राम माता को पता चला की लंकापति रावण माता सीता का हरण करके ले गये हैं तो उन्हें वापस लाने के लिये उन्हें रावण की सेना से युद्ध करने के लिये एक सेना की आवश्यकता थी, दक्षिण भारत में आने के बाद उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई। सुग्रीव ने बालि के कुशासन से उन्हें अवगत करवाते हुए अपनी असमर्थता जाहिर की, तब भगवान श्री राम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को उनसे मुक्त करवाया। मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ही वो दिन था, इसी कारण इस दिन गुड़ी यानि विजयपताका फहराई जाती है।एक और प्राचीन कथा शालिवाहन के साथ भी जुड़ी है कि उन्होंने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया, इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है, इस दिन लोग अपने घरों को आम के पत्तों की बंदनवार से सजाते हैं। खासकर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र में इसे लेकर बहुत उल्लास होता है। आम केपत्तों की यह बंदनवार लोगों में खुशहाल जीवन की एक उम्मीद जगाती है। अच्छी फसल होने व घर में समृद्धि आने की आशाएं भी लोगों को होती हैं। गुड़ी पड़वा की गिनती वर्ष के तीन मुंहतारे में होती है।स्वास्थ्य के नज़रिये से भी इस पर्व का महत्व है, इसी कारण गुड़ी पड़वा के दिन बनाये जाने वाले व्यंजन खास तौर पर स्वास्थ्य वर्धक होते हैं, चाहे वह आंध्र प्रदेश में बांटा जाने वाला प्रसाद पच्चड़ी हो या फिर महाराष्ट्र में बनाई जाने वाली मीठी रोटी पूरन पोली हो, पच्चड़ी के बारे में कहा जाताहै कि खाली पेट इसके सेवन से चर्म रोग दूर होने के साथ-साथ मनुष्य का स्वास्थ्य बेहतर होता है, वहीं मीठी रोटी भी गुड़, नीम के फूल, इमली, आम आदि से बनाई जाती है, इसी दिन चूंकि नवरात्र भी आरंभ होते हैं इसलिये इस पर्व का उल्लास पूरे देश में अलग-अलग रुपों में देखने को मिलता है जो कि दुर्गा पूजा के साथ रामनवमी के दिन समाप्त होता है, इस दिन लोगों अपने घरों की सफाई कर रंगोली, बंदनवार आदि से घर के आंगन व द्वार को सजाते हैं।घर के आगे एक गुड़ी यानि झंडा रखा जाता है, इसी में एक बर्तन पर स्वास्तिक चिन्ह बनाकर उस पर रेशम का कपड़ा लपेट कर उसे रखा जाता है, पारंपरिक वस्त्र पहने जाते हैं। सूर्यदेव की आराधना की जाती है, इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्त्रोत, देवी भगवती के मंत्रों का जाप भी किया जाता है। डॉ. प्रेमचंद तिवारी शिक्षक सेना के बने जिलाध्यक्ष ठाणे: प्राचार्य डॉ प्रेमचंद तिवारी की नियुक्ति महाराष्ट्र राज्य शिक्षक सेना हिंदी माध्यमिक विद्यालय के ठाणे जिला अध्यक्ष पद पर की गई है। महाराष्ट्र शिक्षक सेना के अध्यक्ष जे एम अभ्यंकर ने इसकी नियुक्त प्रदान की है। तिवारी को अध्यक्ष बनाए जाने पर इनका अभिनन्दन जिले के पालकमंत्री एकनाथ शिंदे, समाज सेवी व शिक्षाविद नानजीभाई ठक्कर, ज्ञानेश्वर म्हात्रे, पूजा कुलकर्णी, प्रवीण पाटिल, गोकुल पाटिल आदि ने किया है। आखिर शर्त क्या है हिम्मत करें इन्सां तो क्या कर नहीं सकता नवी मुंबई: मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया, जब दिल में हो कुछ कर गुजरने की तमन्ना, तो मंजिल खुद ब खुद अपनी राह दिखा देती है, बस व्यक्ति का हौसला बुलंद होना चाहिए। लीवर कैंसर से ग्रसित हिम्मत भाई सोमैया ने जो कर दिखाया है, वह सच में काबिले तारीफ रहा।नवी मुंबई के कोपर खैराने में १९९६ में सिडको ने लोहाणा समाज के नाम पर भूखंड आवंटित किया, लेकिन भवन निर्माण का कार्य शुरू नहीं होने के कारण सिडको ने १९९८ में नोटिस जारी किया, भूखंड को बचाने एवं समाज के अस्तित्व के साथ-साथ भवन तैयार करने की चुनौती लोहाणा समाज के सामने थी, लेकिन आर्थिक व्यवस्था के कारण भवन निर्माण के लिए अड़चन थी, तब समाज के लोगों से मिलकर धन एकत्रित करने का बीड़ा उठाया, उसी दरम्यान समाज के आधार स्तंभ महेंद्र भाई घेलाणी से मुलाकात हुई और वे भवन निर्माण के लिए पिलर बनकर खड़े हो गए।आज कोपर खैराने सेक्टर-१० में लोहाणा समाज का पांच मंजिला ईमारत लोहाणा समाज की गतिविधियों का मुख्य केन्द्र बन चुका है, जहां-जहां हम जाते हैं, गाथा रघुवंश की सुनाते हैं, रघुवंश हमारा कुल गौरव, यह बात सभी को बताते हैं।लोहाणा समाज के ट्रस्टी हिम्मत सोमैया को १९८५ में लिवर वैंâसर होने की जानकारी चिकित्सकों ने दी तो वे इलाज के लिए टाटा हॉस्पिटल गए जहां डॉक्टर जी.के.ठक्कर से उनकी मुलाकात हुई, डॉक्टर ठक्कर ने उन्हें बताया कि उनके पास समय कम है, इसलिए मुंबई शहर की घनी आबादी को छोड़कर लोनावला व खंडाला में जाकर रहे, तब उन्होंने नवी मुंबई शहर को चुना और वाशी में आकर किराए के मकान में रहने लगे, धीरे-धीरे समाज के लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया, उसके बाद समाज के संगठन बनाने की कोशिश शुरू हो गई, लोग एकजुट होने लगे तब इनके पास बैठने या सभा करने की जगह नहीं थी, तो वाशी सेक्टर-९ स्थित दैवज्ञ भवन में उठने-बैठने एवं सभा करने के लिए जगह उपलब्ध कराई गई, वहीं से २१ लोगों ने मिलकर समाज के संगठन का निर्माण किया और वर्ष १९८६ में लोहाणा समाज का गठन हुआ, इसके बाद यह कारवां आगे बढ़ता चला गया। जमीन वापस लेने के नोटिस ने जाग्रत किया सिडको ने १९९६ में समाज को भवन के लिए कोपर खैराने में जमीन उपलब्ध कराई, लेकिन भवन का निर्माण कार्य शुरू नहीं होने के कारण १९९८ में सिडको ने जमीन वापस लेने के लिए नोटिस जारी किया, उस समय समाज के लोगों की चिंता इसलिए बढ़ गई थी कि उनके पास भवन निर्माण के लिए पैसे नहीं थे, अगर भवन का काम शुरू नहीं किया गया तो जमीन हाथ से निकल जाएगी तब मुंबई में रहने वाले महेंद्र भाई सॉलिसिटर ने २१ लाख रूपए का सहयोग दिया, साथ ही २१ लाख रूपए समाज के अन्य लोगों से मदद दिलवाई, इस तरह से समाज के पास लगभग ५० लाख रूपए जमा हो गए। पहले श्मशान भूमि का कराया जीर्णोद्धार भवन निर्माण की तैयारी शुरू हुई, तभी समाज के एक वृद्ध व्यक्ति की मौत हो गई और जब उनके अंतिम संस्कार के समय देखा गया कि तुर्भे स्थित श्मशान भूमि की हालत इतनी दयनीय थी कि नीचे उतरने में लोगों को डर लगता था, यह नजारा देख भवन निर्माण के कार्य को पीछे धकेल दिया गया और समाज की तरफ से वहीं पर श्मशान भूमि को सुधारने के लिए पांच लाख रूपए देने की घोषणा की गई, उसके बाद तो कई लोगों ने मिलकर ३५ लाख रूपए जमा किए, नवी मुंबई में तुर्भे श्मशान भूमि का कायाकल्प हो गया। लोहाणा समाज के भवन का निर्माण वर्ष २००३ में पूरा हुआ था। वृद्ध व्यक्तियों के लिए तीर्थ यात्रा संगठन की ओर से वृद्ध लोगों को तीर्थ यात्रा पर ले जाने की व्यवस्था कराई जाती है, नवी मुंबई में २२ स्कूलों के लगभग दो सौ मुकबधिर व अपंग छात्रों के लिए हर साल अप्रैल में चार घंटे के लिए संगीत का आयोजन कर उन्हें पुरस्कृत किया जाता है, कैंसर के ११ बच्चों को पूरे महीने का खर्च समाज की तरफ से दिया जाता है, बच्चों को कम्प्यूटर ट्रेनिंग सेंटर, कर्राटा क्लासेस और समाज के बच्चों को कल्चर ट्रेनिंग, क्रिकेट स्पर्धा, ड्रॉइंग कम्पटीशन, वृद्ध पति-पत्नी के लिए प्रोग्राम, युवक-युवती की शादी के लिए आयोजन, नवरात्रि, झूलेलाल जयंती, गायत्री परिवार की तरफ से गायत्री पाठ का आयोजन जैसी अन्य गतिविधियां संचालित की जाती हैं। मुंबई में ४० यूनिट कर रही है सेवा का कार्य मुंबई में समाज की ४० यूनिट लोगों की सेवा कर रहा है, लोहाणा समाज भवन की तीसरी मंजिल पर सभी वर्ग के लोगों के लिए पैथोलॉ जी लैब, जहां आंख, दंत चिकित्सा, एक्सरे, हॉर्ट, ऑर्थोपेडिक के डॉक्टर मौजूद रहते हैं, मरीजों से मामूली राशि बतौर शुल्क ली जाती है, तल मंजिल एवं पहले मंजिल पर बने हॉल को शादी समारोह व सभा आयोजन के लिए किराए पर दिया जाता है, दूसरी मंजिल पर कांप्रेंâस हॉल, चौथे माले पर १० रूम और पांचवें मंजिल पर मंदिर तैयार किया गया है, समाज की तरफ से सभी वर्ग के छात्रों के लिए पहली कक्षा से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक निशुल्क पुस्तकें दी जाती है।विद्यार्थी पढ़ाई पूरी होने के बाद किताबों को वापस कर देते हैं, मृत व्यक्ति का परिवार यदि दाह संस्कार करने में सक्षम नहीं है तो उसकी पूरी सहायता समाज की तरफ से की जाती है, मृत्यु के बाद शव रखने के लिए जरूरत पड़ी तो नि:शुल्क फ्रीजर की व्यवस्था कराई जाती है। इन लोगों की रही महत्वपूर्ण भूमिका लोहाणा समाज की नींव रखने और समाज को आगे बढ़ाने में महेंद्र घेलाणी, मोहन ठक्कर, हिम्मत सोमैया, मीनाक्षी रूपारेल, धरमजी पालन, मगन सेठिया, संजय डी. पालन, धर्मेंद्र बी. कारिया सहित अन्य लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। -लोहाणा समाज

आम चुनाव २०१९

कांग्रेस ने दो राज्यों में किया था सफाया अब पार्टियों को करना होगा पुरजोर प्रयास पांच साल में काफी बदल गई है तस्वीर मुंबई : वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में भाजपा ने १० राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में क्लीन स्वीप किया था, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और उत्तराखंड में सभी सीटें भाजपा व कांग्रेस की कुल सीटों में बड़ा फासला आ गया, अब भाजपा के सामने इन राज्यों में उसी कामयाबी को दोहराने की चुनौती है, हालांकि ५ साल में राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल चुकी है, यही नहीं, कांग्रेस सहित अन्य दलों ने भी कुछ राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में सभी सीटें जीती थी। बदल गए हैं समीकरण गुजरात में २०१४ में भाजपा ने सभी २६ सीटें जीती, पीएम नरेंद्र मोदी उस समय राज्य के मुख्यमंत्री थे। गुजरात से उठी मोदी लहर ही पूरे देश में फैंली, इसके बाद भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनाव २०१७ में फिर से सरकार बनाई, पर उसे १६ विधानसभा सीटों का नुकसान उठाना पड़ा, पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक समीकरण बदले हैं, विस चुनाव परिणाम के आधार पर लोकसभा सीटों की तुलना करें तो भाजपा ८ सीटों को गंवा रही है, ऐसे में उसके लिए फिर से ‘स्पेशल २६’ का जादुई आंकड़ा बनाना चुनौती होगी इस बार। फिर से जीतना है विश्वास राजस्थान में २०१४ लोकसभा चुनाव में सभी २५ सीटों पर काबिज होने वाली भाजपा को २०१८ के विधानसभा चुनाव में राज्य में सत्ता से हाथ धोना पड़ा, यही नहीं भाजपा २०१३ के विधानसभा चुनाव की तुलना में आधी सीट भी नहीं जीत पाई, उसे ९० सीटों का भारी नुकसान हुआ, विस चुनाव परिणामों के आधार पर भाजपा को १३ लोकसभा सीटों का नुकसान हो रहा है, इन पर कांग्रेस की स्थिति मजबूत हुई है, ऐसे में आगामी लोकसभा चुनाव में राजस्थान भाजपा के लिए खुद को साबित करने की किसी परीक्षा से कम नहीं है। दिल्ली में जीत का ‘सत्ता’ आसान नहींदिल्ली में २०१४ में भाजपा सभी सात सीटों पर काबिज हुई थी, हालांकि इससे पहले २००९ में सभी सीटें कांग्रेस के खाते में थी, २००४ में भी भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं थी, तब कांग्रेस ने छह और भाजपा ने एक सीट जीती थी, अब दिल्ली में भाजपा व कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी (आप) भी मुकाबले में है, आप ने ६ सीटों पर प्रत्याशी भी घोषित कर दिए हैं, बता दें कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव २०१५ में आप ने ७० में से ६७ सीटें जीत सरकार बनाई। भाजपा ३ सीट पर सिमट गई। कांग्रेस तो खाता भी नहीं खोल पाई थी, इसके आधार पर देखें तो भाजपा को लोस की सभी सीटों पर नुकसान हुआ, लिहाजा भाजपा के लिए दिल्ली में २०१४ की जीत का ‘सत्ता’ दोहराना मुश्किल ही होगा।काँग्रेस के लिए हैट्रिक की चुनौती काँग्रेस ने २०१४ में मणिपुर की दोनों व मिजोरम की एकमात्र सीट जीती थी। २००९ में भी दोनों राज्यों में सभी सीट कांग्रेस के ही नाम थी, अब कांग्रेस के सामने क्लीन स्वीप की हैट्रिक बनाने की चुनौती रहेगी, मिजोरम में २०१८ विस चुनाव में कांग्रेस को एमएनएफ से करारी हार मिली, ऐसे में एकमात्र लोस सीट पर कांग्रेस आगे बढ रही है। मुश्किल है वैसी कामयाबीभाजपा के लिए २०१४ के चुनाव नतीजों को इस बार दोहराना मुश्किल है, कुछ एंटी इनकबेंसी है, विपक्षी दलों का एक साथ आना चुनौती बन सकता है। राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ विस चुनाव परिणामों का भी असर देखने को मिलेगा। सरकार कुछ मोर्चों पर विफल रही। फिर भी पीएम मोदी की ओवरऑल गुडविल है। –नीरजा चौधरी, राजनीतिक विश्लेषक जानें किस राज्य में किस तारीख को होंगे चुनाव लोकसभा चुनाव कार्यक्रम २०१९ चुनाव आयोग ने लोकसभा की सभी सीटों के लिए चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। प्रथम चरण के चुनाव में ९१ लोकसभा सीटों और दूसरे चरण के चुनाव में ९७ लोकसभा सीटों पर चुनाव होंगे। तीसरे चरण में ११५ सीटों, चौथे चरण में ७१, पांचवें चरण में ५१, छठे चरण में ५९ और सातवें चरण में ५९ सीटों पर चुनाव होंगे, जानें कब-कब होंगे मतदान:पहला चरण- ११ अप्रैल- ९१ सीटों- आंध्र प्रदेश (२५ सीटें), अरुणाचल (२ सीटें) असम (५ सीटें) बिहार (४ सीटें) छत्तीसगढ़ (१ सीटें) जम्मूकश्मीर (२ सीटें), महाराष्ट्र (१ सीट), मेघालय (१ सीट), मिजोरम (१ सीटें), ओडिशा (४ सीटें), सिक्किम (१ सीट), तेलंगाना (१७ सीटें) त्रिपुरा (१ सीट), उत्तर प्रदेश (८ सीटें), उत्तराखंड (५ सीटें), पश्चिम बंगाल (२ सीटें), अंडमान निकोबार (१ सीट), लक्षद्वीप (१ सीट)दूसरा चरण– १८ अप्रैल- ९१ सीटें- असम ५, बिहार ५, छत्तीसगढ़ ३, जम्मू-कश्मीर-२, कर्नाटक-१४, महाराष्ट्र-१०, मणिपुर-१, ओडिशा-५, तमिलनाडु-३९, त्रिपुरा-१, उत्तर प्रदेश-८, पश्चिम बंगाल-३, पुद्दुचेरी-१तीसरा चरण– २३ अप्रैल- ११५ सीटें- असम ४, बिहार ५, छत्तीसगढ़ ७, गुजरात २६, गोवा २, जम्मू-कश्मीर-१, कर्नाटक-१४, केरल-२०, महाराष्ट्र-१४, ओडिशा-६, उत्तर प्रदेश-१०, पश्चिम बंगाल-५, दादर नागर हवेली-१, दमन दीव-१.चौथा चरण– २९ अप्रैल- ७१ सीटें- बिहार ५, जम्मू-कश्मीर १, झारखंड ३, मध्यप्रदेश ६, महाराष्ट्र १७, ओडिशा ६, राजस्थान १३, उत्तर प्रदेश १३, पश्चिम बंगाल ८पांचवां चरण– ६ मई- ५१ सीटें- बिहार ५, जम्मू कश्मीर २, झारखंड ४, मध्यप्रदेश ७, राजस्थान १२, उत्तर प्रदेश १४, पश्चिम बंगाल ७छठवां चरण– १२ मई- ५९ सीटें- बिहार ८, हरियाणा १०, झारखंड ४, मध्यप्रदेश ८, उत्तर प्रदेश १४, पश्चिम बंगाल ८, दिल्ली ७सातवां चरण-१९ मई- ५९ सीटें- बिहार ८, झारखंड ३, मध्यप्रदेश ८, पंजाब १३, चंडीगढ़ १, पश्चिम बंगाल ९, हिमाचल ४ अब तक नौ बार राजनीतिक दलों को मिले २७२ से ज्यादा सीटें लेकिन… पूर्ण बहुमत की सरकारों को कभी भी नहीं मिले ५०% वोट देश में आजादी के बाद से अब तक हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सात तो भाजपा व जनता पार्टी ने १-१ बार पूर्ण बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई, लेकिन कोई भी दल ५० फीसदी वोट हासिल नहीं कर सका, १९८४ के बाद से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के चलते वोट शेयर भी बंटा, लिहाजा ३० वर्ष तक गठबंधन सरकारें रहीं, २०१४ में भाजपा ने २८२ सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई, पर उसे भी वोट केवल ३१.४% ही मिले, इस चुनाव में कांग्रेस सिर्फ ४४ सीटों पर सिमट गई, कांग्रेस को १९.६% वोटों पर संतोष करना पड़ा।किसी पार्टी को लहर में ही मिलता है पूर्ण बहुमत१९८०: इंदिरा लहर१९८४: इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर२०१४: बदलाव और विकास की नारा देने वाले नरेंद्र मोदीकी लहरविपक्षी दल को सबसे कम वोट२०१४ – कांग्रेस – १९.६%१९८४- भाजपा – ७.४% कांग्रेस को १९८४ में मिले ४८.१% वोट कांग्रेस ने १९५२, १९५७, १९६२, १९६७, १९७१, १९८० के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई, इस दौरान सभी चुनावों में उसे ४० फीसदी से अधिक वोट मिले, सबसे अधिक वोट ४८.१ फीसदी वर्ष १९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर के दौरान मिले थे। बैंकिंग ने आसान बनाया घर व शिक्षा का सपना सरकारी क्षेत्र के बैंक पंजाब नेशनल बैंक में महाप्रबंधक रहे हैं।पिछले कुछ समय से भारतीय बैंकिंग प्रणाली एनपीए, धोखाधड़ी और घोटालों को लेकर इतनी चर्चा में रही कि इनके द्वारा हिंदुस्तान की तस्वीर बदलने में दिए गए महत्त्वपूर्ण योगदान को हमने अनदेखा कर दिया, जबकि राष्ट्र निर्माण के संक्रमण काल में बैंकों ने आम आदमी से लेकर बड़े उद्योगपतियों तक को वित्त उपलब्ध करवा कर हमारी अर्थव्यवस्था को प्रगति की ओर अग्रसर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।कुछ दशक पहले आम आदमी के लिए घर का सपना देखना भी मुश्किल था। आज घर बनाना आसान हो गया है। आम आदमी का बच्चा भी शिक्षा ऋण लेकर देश ही नहीं, विदेश में पढ़ सकता है, ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जिन्होंने हजारों-लाखों का ऋण लिया और आज करोड़ों का टर्नओवर करके लाभ अर्जित कर रहे हैं।किसानों की हालत भले ही संतोषजनक नहीं हो, लेकिन गांव में टै्रक्टर व दूसरे आधुनिक उपकरणों का बहुल है। किसानों का एक वर्ग बैंक सुविधाओं से सम्पन्न भी हुआ है। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति व कृषि उत्पादन में स्वावलंबन के सफर में बैंकों ने किसान के मित्र के रूप में उसकी मदद की और उसे सूदखोरों के चंगुल से छुड़ाने का भी हर संभव प्रयास किया। कृषि के आधुनिक तकनीक का प्रचार प्रसार, भंडारण तथा विपणन की उचित व्यवस्था और बिचौलियों की समाप्ति हो जाती तो शायद किसानों की कर्ज माफी की मांग नहीं उठती।बैंकों के आलोचकों को यह सोचना होगा कि यदि बैंकों का सुगम होगा, यदि बैंकों की सुगम ऋण योजनाएं नहीं होती तो कृषि, उद्योग एवं अन्य क्षेत्रों में हमारी विकास दर क्या होती? बैंकों ने वित्तीय समावेश के माध्यम से लगभग हर भारतीय को बैंकिंग सेवा प्रदान की है।एक ओर तो बड़े ऋण खातों में डिफॉल्ट, घोटालों व धोखाधड़ी से हुई हानि और जनआलोचना तथा दूसरी ओर जवाबदेही, स्टाफ की कमी, बढ़ते कार्यभार व वेतन बढोत्तरी न होने से बैंक कर्मियों का हौसला टूटने लगा है, वे ऋण देने में घबराने लगे हैं, यह घबराहट अर्थव्यवस्था की गति में स्पीड ब्रेकर का कार्य कर रही है। कुछ ऐसे क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे कि बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधरे।आज बैंकर्स के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द जानबूझकर ऋण नहीं चुकाने वाले बड़े उद्योगपति हैं, जिन्हें ‘विलफुल डिफॉल्टर’ कहा जाता है, इन पर लगाम कसने के लिए पांच करोड़ रूपए से ऊपर के सभी एनपीए खातों में फॉरेंसिक ऑडिट अनिवार्य होनी चाहिए, विलफुल डिफॉल्ट को यदि गैर जमानती अपराध बनाकर विलफुल डिफॉल्टर्स को जेल भेजा जाए तो भी बैंकों की खरबों रूपए की वसूली रातों रात हो सकती है, एक महत्वपूर्ण मुद्दा बैंकों से कृषि, शिक्षा और स्वरोजगार के लिए समय पर, सुगमतापूर्वक तथा पर्याप्त ऋण मिलने का है।ईज ऑफ डुइंग बिजनेस : पायदान की छलांग लगाई तीन साल में २०१४ में १९० देशों में १२४वां स्थान, २०१६ में १३१वें स्थान पर आया, २०१७ में १००वें स्थान पर आ गया। -वेद माथुर बैंकिंग मामलों के जानकर भाषा, संस्कृति पर जरूरी आक्षेप पूरी दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है, सत्ता की चाह रखने वालों के बीच प्रतिद्वंद्विता, आपसी खींचतान, आरोपप्रत्यारोप सामान्य बात है लेकिन यह शोध का विषय है कि क्या भारत के अतिरिक्त भी कोई ऐसा देश है जहां पक्ष-विपक्ष की कटुता इतनी जहरीली हो कि अपने राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करते हुए अपने ही देश की अस्मिता, भाषा और संस्कृति तक को अपमानित करने वाले मौजूद हैं।सर्वविदित है कि पूर्व राजनयिक, मंत्री और वर्तमान सांसद शशि थरूर ने पिछले दिनों ट्वीट किया, ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व की विचारधारा देश (भारत) को बांट रही है, ‘थरूर विदेशों में पढ़े हुए बुद्धिजीवी कहलाते हैं, उनका बड़बोलापन कोई नई बात नहीं है। पिछली सरकार में मंत्री होते हुए किफायत को ‘कैटल क्लास’ घोषित करने वाले थरूर के अंदर का कैटल (पशु) बार-बार अपने असली रूप में आ जाता है। आखिर थरूरी मानसिकता ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व’ को कोसने में सुख क्यों महसूस करती है? क्या विदेश में पढ़ने या रहने से उनकी बुद्धि इतनी मलिन हो गई कि उन्हें स्मरण नहीं रहा कि हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व ने कभी किसी व्यक्ति, समाज अथवा देश पर स्वयं को नहीं थोपा है, न किसी को अपना उपनिवेश बनाया और न ही किसी का शोषण किया, वास्तविकता तो यह है कि दुनिया भर में जब भी किसी को सताया गया तो भारत ने उसे शरण दी, उसकी भाषा और संस्कृति को अक्षुण रखने में मदद की, उसके धार्मिक विश्वास का सम्मान करते हुए उन्हें हर संभव सहायता दी।यदि हिन्दुस्तान में ऐसी सहिष्णुता न होती तो अभारतीय विश्वासों के मानने वाले कभी इतने सशक्त और सक्षम हो ही नहीं सकते थे कि ‘अलग कौम’ के नाम पर ‘बंटवारे’ की सोच भी सकते।क्या थरूर जैसे लोग नहीं जानते या नहीं जानना चाहते कि भारत की प्रथम मस्जिद एक हिन्दू राजा ने बनवायी थी, दुनिया में यदि वास्तविक अर्थों में सहिष्णुता है तो वह भारत में ही है जहां अल्पसंख्यक कहे जाने वाले भी करोड़ों में हैं, यहां जबरन धर्मान्तरण बहुसंख्यकों ने नहीं किया, भिन्न विश्वास को मानने वालों पर जजिया किसी हिन्दू राजा ने नहीं लगाया, मुठी भर विदेशी आक्रांताओं के वंशजों की संख्या करोड़ों होना अगर असहिष्णुता है तो सहिष्णुता आखिर क्या है? थरूर जैसे लोग जानबूझ कर अपने ही देश की संस्कृति को बदनाम करते हैं जबकि वे बखूबी जानते हैं कि हिन्दुत्व आज से नहीं, सदियों से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वधर्म सद्भाव’ का पर्याय रहा है हालांकि निष्पक्ष इतिहासकारों ने ‘अति उदार’ व्यवहार के कारण उसकी सीमाएं लगातार सिकुड़ने की बात भी कही है, सबको जोड़ने वाली विचारधारा पर थरूरी आक्षेप और कुछ नहीं बल्कि स्वयं और स्वयं के दल के अप्रासंगिक हो जाने की बौखलाहट है, यह किसी विवेकशील देशभक्त की भाषा नहीं।‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व’ का सम्मान करने वाले समझते हैं कि ‘थरूरों के पैरों तले की जमीन खिसक रही है वे स्वयं को चर्चा में लाने अथवा अपना महत्व प्रदर्शित करने के लिए देश की जनता का मनोबल तोड़ने का उपक्रम कर रहे हैं’ थरूर और उनके आका जिन्हें बेवकूफ समझ रहे हैं या बेवकूफ बनाने का प्रयास कर रहे हैं, पूरी दुनिया ने उनके उस कौशल को देखा है जब उसने क्रूरों थरूरों को भूलुंठित किया है।ऐसा नहीं कि कांग्रेसी नेता शशि थरूर भारतीय जीवन शैली और भाषाओं से परिचित ना हों, वास्तव में वे जानबूझ कर भारत, भारतीयता और भारतीय विश्वास को कमजोर करना चाहते हैं, ऐसा करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ के अपने आकाओं के पुराने दांव आजमा रहे हैं, वे जानबूझ कर भ्रम पैदा कर रहे हैं जबकि ‘हिंदी बांटने वाली नहीं, जोड़ने वाली भाषा’ है, इस देश का सामान्यजन अपनी मातृभाषा और हिंदी दोनों का सम्मान करता है, उसके लिएये दोनों उसकी दो आंखों के समान है, दोनों को जरूरी परंतु इन दोनों आंखों को लड़ा कर तीसरी आंख को सशक्त करने वालों की बेचैनी जगजाहिर है, यदि थरूर उसी अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।जानते हुए भी वह यह मानने को तैयार नहीं कि विश्व में प्राचीनतम एवं सर्वाधिक समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा संस्कृत कभी हर हिंदुस्तानी की भाषा रही है। भाषायी विकास की प्रक्रिया में ‘हिंदी’ सहित लगभग सभी भारतीय भाषाओं का उद्भव हुआ, इस तरह सभी भारतीय भाषाएं सहोदर हैं, हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा नहीं है, यह मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख सहित सभी भारतीयों की भाषा है, सभी भाषा भाषियों ने इसे समृद्ध करने में अपना योगदान दिया है, स्वतंत्रतासंग्राम हो या अन्य कोई आंदोलन ‘हिंदी’ की भूमिका सबको जोड़कर सफलता के द्वार पर दस्तक देने की रही है। गांधी जी ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अनेक प्रयास किये, क्या थरूर इतने अल्पज्ञ हैं कि उन्हें गांधी जी द्वारा ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ की स्थापना की जानकारी न हो, संभवत: सेक्युलर रोग उन्हें बौद्धिक रूप से दिवालिया बना रहा है।स्वयं को बुद्धिजीवी घोषित करने वाले थरूर को देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा हिन्दुत्व को जीवन शैली मानने के बारे में जानना चाहिए, उन्हें फिर से समझना चाहिए कि हिन्दुत्व ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ का उद्घोषक, प्रचारक और पालक है, उसकी स्थापना किसी पैगंबर या ईश्वरीय दूत ने नहीं की है।सिंधु नदी के ‘उस’ पार वालों द्वारा ‘इस’ पार वालों के लिए प्रयुक्त शब्द हिंदु विशुद्ध रूप से भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान है, संकीर्ण मानसिकता वाले ही इसे नकार कर बदनाम करते हैं, वास्तव में इस देश का हर व्यक्ति जो स्वयं को भारत माता की संतान मानता है, भिन्न-भिन्न पूजा उपासना पद्धति को मानने के बावजूद सहोदर है, हिन्दुस्तानी है और विभाजक थरूरी आपेक्षों का निंदक है।वैसे यह कम कष्ट की बात नहीं कि ‘स्वयं को हिन्दुत्व का पेरोकार साबित करने के लिए बेचैन थरूर के दल कांग्रेस के अध्यक्ष ने हिन्दी और हिन्दुत्व के विरुद्ध विषवमन करने वाले अपने इस नेता से असंबंद्धता की जानकारी अब तक इस देश को नहीं दी, उन्हें तत्काल सामने आकर इस विभाजक अंग्रेजीदां को अपने दल से निकाल बाहर करने की घोषणा करनी चाहिए क्योंकि मगरूर थरूर उनके लिए भी बोझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। – डॉ. विनोद बब्बर

शिवाजी महाराज का इतिहास

भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक अभ्यासों में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वे बड़े ध्यान से करते थे।पूरा नाम – शिवाजी शहाजी भोसलेजन्म – १९ फरवरी, १६३०/अप्रिल १६२७जन्मस्थान – शिवनेरी दुर्ग (पुणे)पिता – शहाजी भोसलेमाता – जिजाबाई शहाजी भोसलेविवाह – सइबाई के साथशिवाजी का प्रारभिक जीवन – शिवाजी का जन्म १६२७ में पुणे जिले के जुन्नर शहर में शिवनेरी दुर्ग में हुआ, इनके जन्मदिवस पर विवाद है लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने १९ फरवरी १६३० को उनका जन्म दिवस स्वीकार किया है, उनकी माता ने उनका नाम भगवान शिवाय के नाम पर शिवाजी रखा जो उनसे स्वस्थ सन्तान के लिए प्रार्थना करती रहती थी, शिवाजी के पिताजी शाहजी भोसले एक मराठा सेनापति थे जो डेक्कन सल्तनत के लिए काम करते थे। माँ जीजाबाई सिंधखेड़ व लाखूजीराव जाधव की पुत्री थी। शिवाजी के जन्म के समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शाहजी अक्सर अपनी निष्ठा निजामशाही, आदिलशाह और मुगलों के बीच बदलते रहते थे लेकिन अपनी जागीर हमेशा पुणे ही रखी और उनके साथ उनकी छोटी सेना भी रहती थी। सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शाहजी अक्सर अपनी निष्ठा निजामशाही, आदिलशाह और मुगलों के बीच बदलते रहते थे लेकिन अपनी जागीर हमेशा पुणे ही रखी और उनके साथ उनकी छोटी सेना भी रहती थी।शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई से बेहद समर्पित थे जो बहुत ही धार्मिक थी। धार्मिक वातावरण ने शिवाजी पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था जिसकी वजह से शिवसाजी महाराज ने महान हिन्दू ग्रंथों रामायण और महाभारत की कहानियां भी अपनी माता से सुनी, इन दो ग्रंथों की वजह से वो जीवनपर्यन्त हिन्दू महत्वों का बचाव करते रहे, इसी दौरान शाहजी ने दूसरा विवाह किया और उनकी दुसरी पत्नी तुकाबाई के साथ शाहजी कर्नाटक में आदिलशाह की तरफ से सैन्य अभियानों के लिए चले गये, उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को छोड़ कर उनका संरक्षक दादोजी कोंणदेव को बना दिया। दादोजी ने शिवाजी को बुनियादी लड़ाई, तकनीकें जैसे घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी सिखाई।शिवाजी बचपन से ही उत्साही योद्धा थे, हालांकि इस वजह से उन्हें केवल औपचारिक शिक्षा दी गयी जिसमें वो लिख-पढ़ नहीं सकते थे लेकिन फिर भी उनको सुनाई गई बातों को उन्हें अच्छी तरह याद रहता था। शिवाजी ने मावल क्षेत्र से अपने विश्वस्त साथियों और सेना को इकट्टा किया, मावल साथियों के साथ शिवाजी खुद को मजबूत करने और अपनी मातृभूमि के ज्ञान के लिए सहयाद्रि रेंज की पहाड़ियों और जंगलों में घूमते रहते थे, ताकि वो सैन्य प्रयासों के लिए तैयार हो सके। १२ वर्ष की उम्र में शिवाजी को बंगलौर ले जाया गया, जहां उनका ज्येष्ठ भाई साम्भाजी और उनका सौतेला भाई एकोजी पहले ही औपचारिक रूप से प्रशिक्षित थे। शिवाजी का १६४० में निम्बालकर परिवार की सइबाई से विवाह कर दिया गया। १६४५ में किशोर शिवाजी ने प्रथम बार हिंदवी स्वराज्य की अवधारणा दादाजी नरस प्रभु के समक्ष प्रकट की। शिवाजी का आदिलशाही सल्तनत के साथ संघर्ष –१६४५ में १५ वर्ष की आयु में शिवाजी ने आदिलशाह सेना को आक्रमण की सुचना दिए बिना हमला कर तोरणा किला विजयी कर लिया। फिरंगोजी नरसला ने शिवाजी की स्वामी भक्ति स्वीकार कर ली और शिवाजी ने कोंडाना का किले पर कब्जा कर लिया, कुछ तथ्य बताते हैं कि शाहजी को १६४९ में इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि शिवाजी और संभाजी कोड़ना का किला छोड़ देवे लेकिन कुछ तथ्य शाहजी को १६५३ से १६५५ तक कारावास में बताते हैं। शाहजी की रिहाई के बाद वो सार्वजनिक जीवन से सेवामुक्त हो गये और शिकार के दौरान १६४५ के आस पास उनकी मृत्यु हो गयी। पिता की मौत के बाद शिवाजी ने आक्रमण करते हुए फिर से १६५६ में पड़ोसी मराठा मुखिया से जावली का साम्राज्य हथिया लिया।१६५९ में आदिलशाह ने एक अनुभवी और दिग्गज सेनापति अफज़ल खान को शिवाजी को तबाह करने के लिए भेजा गया, ताकि वो क्षेत्रीय विद्रोह को कम कर देवे। १० नवम्बर १६५९ को वे दोनों प्रतापगढ़ किले की तलहटी पर एक झोपड़ी में मिले, इस तरह का हुक्मनामा तैयार किया गया था कि दोनों केवल एक तलवार के साथ आयेगें, शिवाजी को संदेह हुआ कि अफज़ल खान उन पर हमला करने की रणनीति बनाकर आएगा इसलिए शिवाजी ने अपने कपड़ों के नीचे कवच, दायी भुजा पर छुपा हुआ और बाए हाथ में एक कटार साथ लेकर आये। तथ्यों के अनुसार दोनों में से किसी एक ने पहले वार किया, मराठा इतिहास में अफज़ल खान को विश्वासघाती बताया है जबकि पारसी इतिहास में शिवाजी को विश्वासघाती बताया गया है। इस लडाई में अफज़ल खान की कटार को शिवाजी के कवच ने रोक दिया और शिवाजी के हथियार ने अफज़ल खान पर इतने घातक घाव कर दिए जिससे उसकी मौत हो गयी, इसके बाद शिवाजी ने अपने छिपे हुए सैनिकों को बीजापुर पर हमला करने के संकेत दिए। १० नवम्बर १६५९ को प्रतापगढ़ का युद्ध हुआ, जिसमें शिवाजी की सेना ने बीजापुर के सल्तनत की सेना को हरा दिया। चुस्त मराठा पैदल सेना और घुड़सवार बीजापुर पर लगातार हमला करने लगे, मराठा सेना ने बीजापुर सेना को पीछे धकेल दिया। बीजापुर सेना के ३००० सैनिक मारे गये और अफज़ल खान के दो पुत्रों को बंदी बना लिया गया, इस बहादुरी से शिवाजी मराठा लोकगीतों में एक वीर और महान नायक बन गये। बड़ी संख्या में जब्त किये गये हथियारों, घोड़ों और दुसरे सैन्य सामानों से मराठा सेना और ज्यादा मजबूत हो गयी, मुगल बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी को मुगल साम्राज्य के लिए बड़ा खतरा बताया। प्रतापगढ़ में हुए नुकसान की भरपाई करने और नवोदय मराठा शक्ति को हराने के लिए इस बार बीजापुर के नये सेनापति रुस्तमजमन के नेतृत्व में शिवाजी के विरुद्ध १०००० सैनिकों को भेजा गया। मराठा सेना के ५००० घुड़सवारों की मदद से शिवाजी ने कोल्हापुर के निकट २८ दिसम्बर १६५९ को धावा बोल दिया। आक्रमण को तेज करते हुए शिवाजी ने दुश्मन की सेना को मध्य से प्रहार किया और दो घुड़सवार सेना ने दोनों तरफ से हमला कर दिया। कई घंटो तक ये युद्ध चला और अंत में बीजापुर की सेना बिना किसी नुकसान के पराजित हो गयी और सेनापति रुस्तमजमन रणभूमि छोड़ कर भाग गया। आदिलशाही सेना ने इस बार २००० घोड़े और १२ हाथी खो दिए। १६६० में आदिलशाह ने अपने नये सेनापति सिद्दी जौहर ने मुगलों के साथ गठबंधन कर हमले की तैयारी की, उस समय शिवाजी की सेना ने पन्हाला वर्तमान कोल्हापुर में डेरा डाला हुआ था। सिद्दी जौहर की सेना किले से आपूर्ति मार्गाें को बंद करते हुए शिवाजी की सेना को घेर लिया, पन्हाला में बमबारी के दौरान सिद्दी जौहर ने अपनी युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए अंग्रेजों से हथगोले खरीद लिए थे और साथ ही कुछ बमबारी करने के लिए कुछ अंग्रेज तोपची भी नियुक्त किये थे, इस कथित विश्वासघात से शिवाजी नाराज हो गये क्योंकि उन्होंने राजापुर के एक अंगरेजी कारखाने से हथगोले लुटे थे।घेराबंदी के बाद अलग-अलग लेखों में अलग-अलग बात बताई गयी है जिसमें से एक लेख में शिवाजी बचकर भाग जाते हैं और इसके बाद आदिल शाह खुद किले में हमला करने आता है और चार महीनों तक घेराबंदी के बाद किले पर कब्जा कर लेता है। दुसरे लेखों में घेराबंदी के बाद शिवाजी सिद्दी जौहर से बातचीत कर विशालगढ़ का किला उसको सौंप देते हैं। शिवाजी के समर्पण या बच निकलने पर भी विवादित लेखों के अनुसार शिवाजी रात के अँधेरे में पन्हला से निकल जाते हैं और दुश्मन सेना उनका पीछा करती है। मराठा सरदार बंदल देशमुख के बाजी प्रभु देशपांडे अपने ३०० सैनिकों के साथ स्वेच्छा से दुश्मन सेना को रोकने के लिए लड़ते है और कुछ सेना शिवाजी को सुरक्षित विशालगढ़ के किले तक पहुंचा देती है। पवन खिंड के युद्ध में छोटी मराठा सेना विशाल दुश्मन सेना को रोककर शिवाजी को बच निकलने का समय देती है। बाजी प्रभु देशपांडे इस युद्ध में घायल होने के बावजूद लड़ते रहे जब तक कि विशालगढ़ से उनको तोप की आवाज नहीं आ गयी, तोप की आवाज इस बात का संकेत था कि शिवाजी सुरक्षित किले तक पहुंच गये हैं। शिवाजी का मुगलों के साथ संघर्ष और शाइस्ता खाँ पर हमला, १६५७ तक शिवाजी ने मुगल साम्राज्य के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाये रखे। शिवाजी ने बीजापुर पर कब्ज़ा करने में औरंगजेब को सहायता देने का प्रस्ताव दिया और बदले में उसने बीजापुरी किले और गाँवों को उसके अधिकार में देने की बात कही। शिवाजी का मुगलों से टकराव १६५७ में शुरू हुआ जब शिवाजी के दो अधिकारियों ने अहमदनगर के करीब मुगल क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया, इसके बाद शिवाजी ने जुनार पर आक्रमण कर दिया और ३ लाख सिक्के और २०० घोड़े लेकर चले गये। औरंगजेब ने जवाबी हमले के लिए नसीरी खान को आक्रमण के लिए भेजा, जिसने अहमदनगर में शिवाजी की सेना को हराया था, लेकिन औरंगजेब का शिवाजी के खिलाफ ये युद्ध बारिश के मौसम और शाहजहां की तबियत खराब होने की वजह से बाधित हो गया।बीजापुर की बड़ी बेगम के आग्रह पर औरंगजेब ने उसके मामा शाइस्ता खाँ को १५०,००० सैनिकों के साथ भेजा, इस सेना ने पुणे और चाकन के किले पर कब्ज़ा कर आक्रमण कर दिया और एक महीने तक घेराबंदी की। शाइस्ता खाँ ने अपनी विशाल सेना का उपयोग करते हुए मराठा प्रदेशों और शिवाजी के निवास स्थान लाल महल पर आक्रमण कर दिया। शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर अप्रत्याशित आक्रमण कर दिया, जिसमें शिवाजी और उनके २०० साथियों ने एक विवाह की आड़ में पुणे में घुसपैठ कर दी। महल के पहरेदारों को हराकर, दीवार पर चढ़कर शहिस्ता खान के निवास स्थान तक पहुंच गये और वहां जो भी मिला उसको मार दिया। शाइस्ता खाँ की शिवाजी से हाथापाई में उसने अपना अंगूठा गवां दिया और बच कर भाग गया, इस घुसपैठ में उसका एक पुत्र और परिवार के दुसरे सदस्य मारे गये, शाइस्ता खाँ ने पुणे से बाहर मुगल सेना के यहां शरण ली और औरंगजेब ने शर्मिंदगी के मारे सजा के रूप में उसको बंगाल भेज दिया। शाइस्ता खाँ ने एक उज़बेक सेनापति करतलब खान को आक्रमण के लिए भेजा। ३०००० मुगल सैनिकों के साथ वो पुणे के लिए रवाना हुए और प्रदेश के पीछे से मराठों पर अप्रत्याशित हमला करने की योजना बनाई । उम्भेरखिंड के युद्ध में शिवाजी की सेना ने पैदल सेना और घुड़सवार सेना के साथ उम्भेरखिंड के घने जंगलों में घात लगाकर हमला किया, शाइस्ता खाँ के आक्रमणों का प्रतिशोध लेने और समाप्त राजकोष को भरने के लिए १६६४ में शिवाजी ने मुगलों के व्यापार केंद्र सुरत को लुट लिया। औरंगजेब ने गुस्से में आकर मिर्जा राजा जय सिंह को १५०,००० सैनिकों के साथ भेजा। जय सिंह की सेना ने कई मराठा किलों पर कब्जा कर लिया, शिवाजी ने ओर अधिक किलो को खोने के बजाय औरंगजेब से शर्तों के लिए बाध्य किया। जय सिंह और शिवाजी के बीच पुरन्दर की संधि हुयी जिसमें शीवाजी ने अपने २३ किले सौंप दिए और जुर्माने के रूप में मुगलों को ४ लाख रूपये देने पड़े, उन्होंने अपने पुत्र साम्भाजी को भी मुगल सरदार बनकर औरंगजेब के दरबार में सेवा की बात पर राजी हो गये। शिवाजी के एक सेनापति नेताजी पलकर धर्म परिवर्तन कर मुगलों में शामिल हो गये और उनकी बहादुरी पर पुरस्कार भी दिया गया।मुगलों की सेवा करने के दस वर्ष बाद वो फिर शिवाजी के पास लौटे और शिवाजी के कहने पर फिर से हिन्दू धर्म स्वीकार किया।१६६६ में औरंगजेब ने शिवाजी को अपने नौ साल के पुत्र संभाजी के साथ आगरा बुलाया, औरंगजेब की शिवाजी को कांधार भेजने की योजना थी ताकि वो मुगल साम्राज्य को पश्चिमोत्तर सीमांत संघटित कर सके। १२ मई १६६६ को औरंगजेब ने शिवाजी को दरबार में अपने सबदारो के पीछे खड़ा रहने को कहा। शिवाजी ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध में दरबार पर धावा बोल दिया। शिवाजी को तुरंत आगरा के कोतवाल ने गिरफ्तार कर लिया।शिवाजी को आगरा में बंदी बनाना और बच कर निकल जानाशिवाजी ने कई बार बीमारी का बहाना बनाकर औरंगजेब को धोखा देकर डेक्कन जाने की प्रार्थना की, हालांकि उनके आग्रह करने पर उनकी स्वास्थ्य की दुवा करने वाले आगरा के संत, फकीरों और मन्दिरों में प्रतिदिन मिठाइयाँ और उपहार भेजने की अनुमति दी गई थी। कुछ दिनों तक ये सिलसिला चलने के बाद शिवाजी ने संभाजी को मिठाइयों की टोकरी में बिठाकर और खुद मिठाई की टोकरियां उठाने वाले मजदूर बनकर वहां से भाग गये, इसके बाद शिवाजी और उनका पुत्र साधू के वेश में निकलकर भागे, भाग निकलने के बाद शिवाजी ने खुद को और संभाजी को मुगलों से बचाने के लिए संभाजी की मौत की अफवाह फैला दी। इसके बाद संभाजी को विश्वनीय लोगों द्वारा आगरा से मथुरा ले जाया गया।शिवाजी के बच निकलने के बाद शत्रुता कमजोर हो गयी और संधि की शर्ते १६७० के अंत तक खत्म हो गयी, इसके बाद शिवाजी ने एक मुगलों के खिलाफ एक बड़ा आक्रमण किया और चार महीनों में उन्होंने मुगलों द्वारा छीने गये प्रदेशों पर फिर कब्जा कर लिया, इस दौरान तानाजी मालुसरे ने सिंघाड़ का किला जीत लिया था। शिवाजी दुसरी बार जब सुरत को लुट कर आ रहे थे तो दौड़ खान के नेतृत्व में मुगलों ने उनको रोकने की कोशिश की गई, लेकिन उनको शिवाजी ने युद्ध में परास्त कर दिया। अक्टूबर १६७० में शिवाजी ने अंग्रेजों को परेशान करने के लिए अपनी सेना बॉम्बे भेजी, अंग्रेजों ने युद्ध सामग्री बेचने से मना कर दिया तो उनकी सेना से बॉम्बे के कड़हारों के दल को अवरुद्ध कर दिया। नेसारी की जंग और शिवाजी का राज्याभिषेक– १६७४ में मराठा सेना के सेनापति प्रतापराव गुर्जर को आदिलशाही सेनापति बहलोल खान की सेना पर आक्रमण के लिए बोला। प्रतापराव की सेना पराजित हो गयी और उसे बंदी बना लिया गया, इसके बावजूद शिवाजी ने बहलोल खान को प्रतापराव के रिहा करने की धमकी दी वरना वो हमला बोल देंगे। शिवाजी ने प्रतापराव को पत्र लिखकर बहलोल खान की बात मानने से इंकार कर दिया, अगले कुछ दिनों में शिवाजी को पता चला कि बहलोल खान की १५००० लोगों की सेना कोल्हापुर के निकट नेसरी में रुकी है। प्रतापराव और उसके छ: सरदारों ने आत्मघाती हमला कर दिया ताकि शिवाजी की सेना को समय मिल सके। मराठों ने प्रतापराव की मौत का बदला लेते हुए बहलोल खान को हरा दिया और उनसे अपनी जागीर छीन ली। शिवाजी प्रतापराव की मौत से काफी दुखी हुए और उन्होंने अपने दुसरे पुत्र की शादी प्रतापराव की बेटी से कर दी।शिवाजी ने अब अपने सैन्य अभियानों से काफी जमीन और धन अर्जित कर लिया था लेकिन उन्हें अभी तक कोई औपचारिक ख़िताब नहीं मिला था। एक राजा का ख़िताब ही उनको आगे आने वाली चुनौती से रोक सकता था। शिवाजी को रायगढ़ में मराठों के राजा का ख़िताब दिया गया। पंडितों ने सात नदियों के पवित्र पानी से उनका राज्याभिषेक किया। अभिषेक के बाद शिवाजी ने जीजाबाई से आशीर्वाद लिया, एक समारोह में लगभग रायगढ़ के ५००० लोग इक्ठटा हुए थे। शिवाजी को छत्रपति का खिताब भी यहीं दिया गया। राज्याभिषेक के कुछ दिनों बाद जीजाबाई की मौत हो गयी, इसे अपशकुन मानते हुए दुसरी बार राज्याभिषेक किया गया।दक्षिणी भारत में विजय और शिवाजी के अंतिम दिन– १६७४ की शुरुवात में मराठों ने एक आक्रामक अभियान चलाकर खानदेश पर आक्रमण कर बीजापुरी पोंडा, कारवार और कोल्हापुर पर कब्जा कर लिया, इसके बाद शिवाजी ने दक्षिण भारत में विशाल सेना भेजकर आदिलशाही किलों को जीता। शिवाजी ने अपने सौतेले भाई वेंकोजी से सामंजस्य करना चाहा लेकिन असफल रहे, इसलिए रायगढ़ से लौटते वक्त उसको हरा दिया और मैसूर के अधिकतर हिस्सों पर कब्जा कर लिया।१६८० में शिवाजी बीमार पड़ गये और ५२ वर्ष की उम्र में इस दुनिया से चले गये। शिवाजी के मौत के बाद उनकी पत्नी सोयराबाई ने उसके पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बिठाने की योजना बनाई। संभाजी महाराज की बजाय १० साल के राजाराम को सिंहासन पर बिठाया गया, हालांकि संभाजी ने इसके बाद सेनापति को मारकर रायगढ़ किले पर अधिकार कर लिया और खुद सिंहासन पर बैठ गया। संभाजी महाराज ने राजाराम, उसकी पत्नी जानकी बाई को कारावास भेज दिया और माँ सोयराबाई को साजिश के आरोप में फांसी पर लटका दिया। संभाजी महाराज इसके बाद वीर योद्धा की तरह कई वर्षों तक मराठों के लिए लड़े। शिवाजी के मौत के बाद २७ वर्ष तक मराठों का मुगलों से युद्ध चला और अंत में मुगलों को हरा दिया, इसके बाद अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को समाप्त किया। शिवाजी महाराज मराठी लोगों के लिए देवता समान हैं और हिन्दुओं में उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है होना चाहिये अब भी है…….? भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता वर्तमान उत्तर आधुनिक दौर में जब वैश्वीकरण की आँधी चल रही है और सम्पूर्ण विश्व को एक रीति-नीति के अंतर्गत लाने का प्रयास हो रहा है तब यह जरूरी है जाता है कि हम अपनी हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार करें। भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीनता और कालजयता के कारण विश्व प्रसिद्ध है, यह आरंभ से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के महती आदर्श को लेकर चली है, आज वैश्वीकरण अर्थशास्त्र और प्रौद्योगिकी के सानुपातिक समायोजन द्वारा एक ऐसी विश्व-व्यवस्था कायम करने का हिमायती है कि जहाँ किस्म-किस्म की अर्थव्यवस्थाओं में स्वाभाविक संश्लेषण होगा, यह अंग्रेजी के ‘ग्लोबलाइजेशन’ शब्द का हिंदी रूपांतर है जो एक ही विश्व-व्यवस्था को कायम करने के लक्ष्य को लेकर संकल्पित है। वैश्वीकरण विश्व बाजारवाद के रथ पर आरूढ़ होकर शिक्षण प्रौद्योगिकी के सहारे वैश्विक अर्थ तंत्र को प्रतिष्ठित एवं विकसित करने के लिए हरेक देश की व्यवस्था से अनिवार्य रूप से जुड़ने के लिए कृत संकल्प है, इसे साकार करने के लिए पहले ‘गेट’ के द्वारा तथा बाद में विश्व व्यापार संगठन के सटीक माध्यम द्वारा सक्रिय अभियान चलाया गया, इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण विश्व के अर्थ तंत्र को एक खुली व्यवस्था के तहत लाकर निश्चित विधान का दायरा प्रदान किया गया, आज वैश्वीकरण एक विराट वर्चस्वी संरचना के रूप में हमारे सामने है तथा विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, कारपोरेट जगत, बहुराष्ट्रीय निगम तथा तकनीकी आविष्कृतियाँ उसके आधार-स्तंभ के रूप में कार्यरत हैं।ऐसे तीव्र बदलाव वाले समय में भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता पर खुला विमर्श होना चाहिए जिससे उसके सर्वोत्तम पक्षों को विश्व मनुष्यता के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।आज जब समूचा विश्व मूल्यहीनता और भयावह अनास्था का शिकार हो रहा है तब भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, वस्तुतः भारतीय संस्कृति एक विशेष भौगोलिक और ऐतिहासिक परंपरा के भीतर मनुष्य के सर्वोत्तम अंश को प्रकाशित करने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, उसकी प्रमुख विशेषता, चिंतन की स्वतंत्रता, बाहरी ग्रहण करने योग्य तत्वों को पचा कर हजम कर जाने की क्षमता और समय के अनुवूâल इसी में परिवर्तन कर देने की योग्यता है, अनेक धर्मों, विचारधाराओं, जीवन प्रणालियों और भौगोलिक विविधता के रहते हुए उसमें विद्यमान एकता असंदिग्ध और रमणीय है।भारतीय संस्कृति चराचर जगत के प्रति अभेदता एवं एकता का भाव लेकर चली है। सर्वप्रथम वेदों और उपनिषदों में यह विचार आया कि एक ही प्राणवान सत्ता सभी स्थानों पर व्याप्त है, वह ऊर्जा के विभिन्न रूपों में सारे संसार में महसूस की जा सकती है-ईशावास्यम इदम् सर्वम यात्किंच जगत्यम जगत। धूल के इस कण को जिसे हम पृथ्वी कहते हैं, उसी में नहीं बल्कि उस जैसी अरबों पृथ्वियों, आकाश गंगाओं तथा समूचे ब्रह्माण्ड में ईश्वरीय शक्ति के संधान की दृष्टि ही भारतीय संस्कृति की मूल चेतना है, हमारे ऋषियों द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त, एक ही उâर्जा और एक ही शक्ति समूची सृष्टि में हजारों साल पुराना है जबकि पश्चिम में आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक की समझ में यह बात एक शताब्दी पूर्व आई है।इस सूत्र को व्यावहारिक अर्थ देने वाली एक संकल्पना और है जो भारतीय संसद के मुख्य द्वार पर भी अंकित है- ‘‘अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसां। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकं।।’’अर्थात् यह मेरा है, और वह तेरा, संकुचित ह्रदय वाले ही सोच सकते हैं जिसका चित विशाल है, उसके लिए तो सारा विश्व एक परिवार के समान है, यही बात गोस्वामी तुलसीदास ‘रामचरितमानस’ में दूसरे ढंग से कहते हैं-‘मैं अरु मोर तोर यह माया, जिहि बस कीन्हें जीव निकाया।’इससे बचने का वे मार्ग भी सुझाते हैं- ‘सीय-राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि जुग पाणी।’ प्रसाद जी ने कामायनी में दिखलाया है कि जब मनु श्रद्धा की सहायता से आनंद की प्राप्ति करते हैं तब तब वे विराट विश्वचेतना से पुलकित होकर कह उठते हैं-‘‘हम अन्य न और कुटुम्बी, हम न केवल एक हमी हैं।तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ कमी नहीं है।’’कहना न होगा कि इस विराट दृष्टिकोण ने भारतीय संस्कृति को अविरोधी रूप में विकसित किया। हमारे ऋषियों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा अविरोधी धर्म एवं संस्कृति की जो संकल्पना विकसित की, वह सम्पूर्ण विश्व में अपना दृष्टान्त आप ही है। गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकले दो सूत्र भारतीय संस्कृति को उस ऊंचाई पर ले जाते हैं जिसके आगे राह नहीं, कहा जा सकता है, सारे जगत में भारतीय संस्कृति ही यह प्रतिपादित कराती है कि किसी भी धर्म के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति संभव है। ऋग्वेद में एक मन्त्र है कि ‘एकम सत विप्र: बहुधा वदन्ति ‘अर्थात् सत्य एक है, विद्वान उसे भिन्न नामों से पुकराते हैं। हिंदी के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने भी लिखा हैविधना के मारण हैं तेते। सरग नखत तन रोवां तेते।’भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने तथा संगठित रखने में इस चिंतानात्मकता का विशेष योगदान रहा है। महाभारतकार वेदव्यास ने भारतीय संस्कृति की एक सूत्रता प्रमाणित करते हुए बहुलात्मक समाज वाले सामासिक संश्लिष्टता से युक्त भारत का सपना देखा, उन्होंने समग्र भारतीय समाज को कुल का स्वरूप दिया, जिसके अंतर्गत सात-सात कुल नदियों का समावेश किया गया, इसमें अनंत की एकता प्रमाणित करने के लिए अनजान क्षितिज को सहारा देने वाले बन्धुसागर को विशेष स्थान दिया गया। देशव्यापी सात पुरियों की अवधारणा से यह कुल परिपुष्ट हुआ, इस कुल का जो स्वभावसिद्ध आचार नियत हुआ वह देश भक्ति और लोकशक्ति के अंतरालंबन पर आधारित था, फलत: इस कुल के लिए कोई भी पराया नहीं था, सब अपने थे, समूचा विश्व एक अद्वितीय नीड़ के रूप में देखा गया। समूची पृथ्वी सबकी माता मानी गयी, केवल मनुष्य की ही नहीं, चर और अचर की भी, इस संकल्पना ने समूचे देश को पुष्पहार की भाँति एक सूत्र में पिरो दिया। भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने में शिव का सबसे बड़ा योगदान रहा है। शिव ने सती के शव को लेकर जो तांडव किया उसी के फलस्वरूप इस देश का चप्पा-चप्पा एक सूत्र में ग्रंथित हो गया, वह शव खंड-खंड होकर सारे देश में गिरा और चौरासी शक्तिपीठों की स्थापना का कारण बना, ये पीठ अथवा साधना केंद्र अरुणाचल से लेकर सिंध तक तथा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हुए हैं। भारत वर्ष की आध्यात्मिक एवं धार्मिक एकता बनाए रखने में इनका विशेष योगदान रहा है। विश्व के किसी भी साहित्य अथवा संस्कृति में अपनी पत्नी को प्यार करने वाला ऐसा नायक अत्यंत दुर्लभ है, जो कि शिव के चरित्र का प्रकर्ष है।संस्कृति जीवनचर्या के मूल्यों और मानों का नाम है, इस देश में देवालय, तीर्थस्थान, आध्यात्मिक मान्यताएँ, कलात्मक स्थल एवं दर्शनीय वस्तुएँ सर्वत्र मिल जाती हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा देश के चार बड़े तीर्थस्थानों की उसके चारों कोनों में स्थापना होने से भी भारतीय संस्कृति की मूलभूत एकता को बल मिला, यहाँ कथित कुल लोगों की जीवनचर्या के भीतर सात ऐसी पुरियों के नाम मुक्तिदायनी के रूप में आते हैं जो देश के बहुत बड़े भूभाग में छिटकी हुई हैं- ‘‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिका।।’’इसी तरह एकता मंत्र की चर्चा भी लोगों की दिनचर्या के भीतर हुई है जिसमें व्यक्ति अपने कल्याण के लिए देश की समस्त प्रसिद्ध नदियों और समुद्र का स्मरण करता है-‘‘गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदाकावेरी सरयू महेंद्रतनया चर्मणवती वेदिकाक्षिप्रा वेत्रवती महासुर नदी ख्याता जाया गण्डकीपूर्णा: पूर्णजलै: समुद्रसहिता: कुर्वन्तु में मंगलम।।’’इसी तरह देश भर के पर्वतों का भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया गया है जो देशवासियों के पारस्परिक रागात्मक बोध का परिचायक है-‘‘महेन्द्रो मलय: सह्यो देवतात्मा हिमालय:ध्येयो रैवतको विंध्यो गिरीश्वारावालिस्तथा।।’’ हमारे यहाँ धार्मिक और साहित्यिक ग्रन्थ भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं, उनका प्रतिपाद्य भी एकता, समरसता और सामंजस्य है, उनका प्राचुर्य और वैविध्य तो अपूर्व है ही, उनकी मौलिक एकता और भी रमणीय है। भारतीय साहित्य का विकासक्रम लगभग एक सा ही है। संस्कृत भाषा के साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों का प्रभाव देशव्यापी रहा है और भारतीय संस्कृति को सबसे ज्यादा खुराक वहीं से प्राप्त हुई है, इस देश में राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना में सांस्कृतिक परिस्थितियों एवं अंतर्वृत्तियों में अपेक्षाकृत ज्यादा समानता पाई जाती है, यदि हम पिछली अनेकानेक शताब्दियों पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि इस देश में अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक आन्दोलन ऐसे हुए हैं जिनका प्रभाव भारतव्यापी था। बौद्ध धर्म के युग में उसकी कई शाखाओं और शैव शाक्त धर्मों के संयोग से नाथ संप्रदाय उठ खड़ा हुआ, जो ईसा के द्वितीय सहदाााब्दी के आरम्भ में उत्तर तिब्बत, दक्षिण में पूर्व घाट के प्रदेशों, पश्चिम में महाराष्ट्र और पूर्व में प्राय: सर्वत्र फैला हुआ था, इनमें नाथ, सिद्ध और शैव सभी थे जो योगी होते हुए भी जीवन के विचार और भावपक्ष की उपेक्षा नहीं करते थे, इनके उतराधिकारी संत सम्प्रदायों और सूफियों के मत का प्रसार भी देश के भिन्न-भिन्न लोगों में हुआ। संत सम्प्रदाय पर वेदांत दर्शन का प्रभाव था और वे निर्गुण भक्ति की साधना तथा प्रचार पर बल देते थे। भक्ति के आविर्भाव के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है-‘‘भगति द्राविड उळपजी लाए रामानंद।परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड।।’’यहाँ सप्त द्वीप नवखंड शब्द भक्ति के भारतव्यापी प्रभाव का ही द्योतक है।भक्तिकाल के प्रायः सभी कवियों ने भारतीय समाज को एकजुट रखने के लिए सामान्य भक्ति मार्ग का सिंह द्वार सबके लिए खोल दिया, इन कवियों में विशेषकर तुलसीदास ने रामकथा का लोकभाषा में प्रणयन करके व्यक्ति, समाज, संस्कृति, राजनीति, धर्म-दर्शन और साहित्य के परस्पर विपरीत धु्रवों के बीच अंतरावलंबन, सह अस्तित्व, सहयोग और सौमनस्य का भाव भर कर बिखर रहे भारतीय समाज को भावनात्मक धरातल पर समन्वित कर दिया। वर्तमान सन्दर्भ में जिसे हम तनाव और संघर्ष का निराकरण कहते हैं तुलसी का समन्वयवाद उसका साकार विग्रह है, इसके द्वारा वे भारतीय संस्कृति तथा सामाजिक व्यवस्था में हिंसा, आतंक और संघर्ष के बजाय अनुकूलन, लचीलापन और एकीकरण बनाये रखने में कामयाब होते हैं, उनकी समन्वय भावना भारतीय संस्कृति का तत्त्व बन जाती हैं गोस्वामी तुलसीदास ने रामलीला मंडलियों का बाकायदा गठन एवं मंचन करवाकर भारतीय सांस्कृतिक एकता के लिए मंच उपलब्ध करवाया। भारतीय संस्कृति में भावात्मक एकता का गुण पैदा करने में मुल्ला दाउद, जायसी, रहीम, रसखान जैसे मुस्लिम कवियों की विशेष भूमिका रही, जिसके चलते भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे जन-कवि को लिखना पड़ा कि-‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिक हिन्दू वारिये।’ भक्त कवियों द्वारा जब राम कृष्ण की लीलाओं का गान समूचे देश में बड़े वेग से व्याप्त हो गया तब राम और कृष्ण की अनेक मधुर पद्धतियों का देश भर में प्रसार हुआ और समस्त भारतवर्ष सगुण ईश्वर के लीलागान से गुंजरित हो उठा, इसके बाद ईरानी संस्कृति के प्रभाव के कारण सांस्कृतिक शिथिलता का दौर चला, आगे चलकर पाश्चात्य संस्कृति एवं भारतीय संस्कृति के बीच के द्वन्द्व ने देशव्यापी सांस्कृतिक नवजागरण को उपस्थित किया, नतीजतन भारतीय संस्कृति अपनी एकरूपता और समन्वय में पुन: उठ खड़ी हुई। सन् १८५७ की क्रांति के उपरांत भारतीय समाज में जो पुनर्जागरण उपस्थित हुआ उसके कारण भारतीय समाज में असाधारण बौद्धिक क्षमता से सम्पन्न अनेक समाज-सुधारक आते हैं जो भारतीय संस्कृति का परिष्कार करते हैं। साथ ही भारतीय समाज-व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने के बजाय उसमें रासायनिक परिवर्तन उपस्थित करते हुए उसे स्वस्थ एवं संगठित बनाने का उपक्रम करते हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविन्द भारतीय संस्कृति का नया पाठ तैयार करते हुए उसे विश्वव्यापी प्रतिष्ठा और वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं। महर्षि अरविन्द ‘भारतीय संस्कृति के आधार’ जैसा ग्रन्थ लिखकर उसकी सैद्धांतिकी निर्मित करते हैं।लोकमान्य तिलक सार्वजनिक गणेशोत्सव की प्रतिष्ठा द्वारा भारतीय संस्कृति में निहित सांगठनिक क्षमता को उजागर करते हैं, इससे स्वाधीनता संग्राम के कठिन संघर्ष के दिनों में भारतीयों के समक्ष ‘संघे शक्ति: कलियुगे’ को चरितार्थ करने का सुअवसर उपलब्ध हुआ, इसी क्रम में गाँधी जी और डॉ. अम्बेडकर भारतीय संस्कृति एवं समाज में व्याप्त जड़ता दूर करते हुए नूतन लक्ष्य के प्रति सन्नद्ध करते हैं। हिंदी के विश्वस्तरीय आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल यदि कर्म सौन्दर्य की प्रतिष्ठा करते हुए उसे भारतीय संस्कृति के केन्द्र में लाते हैं तो महाकवि जयशंकर प्रसाद ‘कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन आनंद’ कहकर कर्म-फल का पुनर्विश्लेषण करते हैं।भारतीय संस्कृति नाना जातियों, नाना धर्मों, नाना विश्वासों तथा अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियों का संश्लेषण है, यह जिन अभिलक्षणों के आधार पर वैविध्य में एकत्व बनाए हुए है उसमें मानवजाति की एकता में विश्वास सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति मानवजाति की एकता को लेकर संकल्पित है जो किसी अन्य संस्कृति में शायद ही मिले, हमारी संस्कृति काल, महाकाल तथा इतिहास विधाता की अवधारणा में विश्वास रखती है, साथ ही यह प्रतिपादित करती है कि काल जितना न्यायी है उतना ही क्रुर भी, वह अपने साथ उन्हीं को ले चलना पसंद करता है जिनमें उसके कंधे पर सवार होने की शक्ति होती है। भारतीय संस्कृति ‘चयन’ और ‘वरण’ के प्रति अतिशय सतर्क है, वह हजारों वर्षों की अपनी जय यात्रा में अनेक अनुपयोगी चीजों का त्याग कर चुकी है, उसमें बहुत सारे बाहरी तत्त्वों ने अपना स्थान सुरक्षित भी कर लिया है। भाषा, भवन, भेष और भोजन चारों ही आधारों पर इसकी पड़ताल की जा सकती है।भारतीय संस्कृति ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।’जैसे आदर्श का पुरस्करण करती है। वह ‘नहिं मानुषात् परा धर्म:’ अर्थात् मनुष्यता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है, के उद्घोष द्वारा अपनी व्यापक दृष्टि तथा उच्चतर मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, वह मानवीय धर्म की प्रतिष्ठा करते हुए सर्वधर्म समभाव ओर सर्वजन हिताय की संकल्पना प्रस्तुत करती है, वह मानव के देवत्व और आत्मोन्नयन में विश्वास व्यक्त करती है। मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से जो सवाल ‘राम तुम मानव हो देवता नहीं हो क्या?’ के रूप में करते हैं उसका उत्तर वे स्वयं राम से दिलवाते हैं- ‘‘सन्देश यहाष्ट नहीं मैं स्वर्ग का लाया।इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’’इस देश की संस्कृति आत्मिक उत्कर्ष में विश्वास रखते हुए अतिशय भौतिकवादिता तथा स्वार्थन्धता का निषेध करती है, आज जब विश्व बाजारवाद की आयोजक-नियोजक शक्तियाँ उपभोक्तावाद, स्वार्थपरकता और लाभवृत्ति को विश्व स्तर पर प्रसारित कर रही हैं तब ‘‘कामायनी’’ में अग्रांकित पंक्तियाँ अतिशत प्रसांगिक एवं दिशादर्शक बन पड़ी हैं- ‘‘अपने भर सब कुछ केसे व्यक्ति विकास करेगा, यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।औरों को हंसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।।भारतीय संस्कृति अपनी विराट दृष्टि और सर्वसमावेशकता के साथ-साथ प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के मध्य संतुलन साधती है, वह निर्मल भाव से गृहस्थ जीवन जीने के आदर्श की प्रतिष्ठा करती है, इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास का निम्न दोहा विशेष रूप से चिंतनीय बन पड़ा है- घर राखे घर जात है, घर छोड़े घर जाय। तुलसी घर-वन बीच ही, राम प्रेमपुर छाय।।...

पश्चिम भारत सनाढय गौड़ सभा मुंबई की स्थापना

हमारी संस्था सन् १९७८ में श्रीबंशीधर पंडया, मधुरा प्रसाद, रामेश्वर दयाल, वृजेन्द्र जी, रामप्रसाद, श्री विश्वनाथ (पंचम पुरीवाले) श्री डा वल्लभदास तिवारी, श्री हरीशचंद्र मैन गुरियाजी एवम अन्य बुद्धजीनाओं सदस्यों के अथक प्रयास से शुरू हुई। संस्था ने अपना खुद का भवन सन् १९९५ में श्री झाऊलाल जी, श्री धर्मजी, श्री अनोखे लाल, श्री जगदीश प्रसादजी अध्यक्ष श्री सुरेद्रजी, श्री त्रिलोक चंदजी, श्री रामेश्वर दयालजी एव अन्य पदाधिकारिओं एवं दान दाताओं की मदत से घरटन पाडा, दहिसर (पूर्व) में लिया।हमारी संस्था का मुख्य उद्देश्य सम्पूर्ण भारत में जो भी सनाढय गौड़ ब्राह्मणवर्ग है। उसको जोड़कर एक दूसरे से परिचित कराना है। संस्था गरीब बच्चों, गरीब महिलाओं को अधिक मदत एवम् प्रतिवर्ष युवक-युवतिओं का वर-वधु सम्मेलन का आयोजन करती है, हमारी संस्था मेघावी छात्रों को छात्रवृत्ति एवम् पुरस्कार देकर उन्हें उत्साहित करती है। हमारी संस्था पिछले ८१ वर्षों से निरंतर वार्षिक सम्मेलन, परशुराम जयंति, होली उत्सव एवम् हरियाली तीज का आयोजन करती आ रही है हमारी संस्था मुंबई में पश्चिम भारतीय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी एवम् पुरानी संस्था है।हमारी संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी श्री भवानी शंकर एवम् अन्य ट्रस्टी श्री कपिल जी, श्री त्रिलोक चंदजी, श्री रामेश्वर दयालजी, श्री अशोक रावत, श्रीमती बीना अशोक जी, श्री सत्येन्द्रजी, श्री राजेश, श्री बिजेश, श्री ब्रह्मानंदा, श्री राजेन्द्रप्रसाद जी के मार्गदर्शन में करती है, हमारी संस्था उपरोक्त ट्रस्टीओं एवं कार्यकारिणी सदस्यों, दानदाताओं, नये एवम् पुराने सदस्यों द्वारा की गयी आर्थिक मदत से मुंबई में अपना एक नया भवन बनाने का प्रयास कर रही है।वर्तमान अध्यक्ष श्री प्रकाश, मंत्री श्री महावीरजी एवम् ट्रस्टी श्री रामेश्वर दयाल जी, युवा कार्यकत्र्ता श्री मनीष अशोकजी एवम् सभी कार्यकारिणी पदाधिकारी एवम् सदस्यों के प्रयास से निरंतर नई ऊचाईयों को छुने की कोशिश कर रही है।नेतृत्व में हमारे पदाधिकारी श्रीमती विजयलक्ष्मी जी, श्री मनीषजी, श्रीमती कुसुम जी एवम् सभी पदाधिकारी एवम् सदस्यों की मदत से कार्यरत हैं। भाषा संरक्षण और लिपि भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जन-समूह सहज में समझ ले ग्रुप के माध्यम से जगा रहे हिंदी की अलख हिंदी को बढ़ावा देने के लिए डेढ़ साल पहले हरियाणा के शिक्षकों का संगठन बनाया गया था अंबाला कैंट : व्हाट्सएप ग्रुप का इस्तेमाल आज के समय केवल मनोरंजन व एक दूसरे तक संदेशों का आदान-प्रदान के लिए किया जाता है लेकिन व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी को बचाने को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं, ऐसा ही एक व्हाट्सएप ग्रुप बाकायदा अंबाला कैंट निवासी व राजकीय सीनीयर सेकेंडरी स्कूल की मुख्य शाखा में मौजूदा हिंदी शिक्षक डा. सोनिका द्वारा तैयार किया गया है, जिसका मकसद केवल बच्चों में हिंदी के प्रति रूझान बढ़ाने और उन तक हिंदी को सरल अंदाज में पहुंचाने को लेकर किया गया है, इस ग्रुप के जरिए ‘हिंदी’ द्वारा बाकायदा पूरे हरियाणा के सरकारी स्कूलों में मौजूदा सैकड़ों शिक्षकों की टीम तैयार की गई है जो केवल ग्रुप में अंग्रेजी भाषा के इस दौर में भी ‘हिंदी’ को जीवित रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं।हिंदी शिक्षण विधियां बना शिक्षकों का जरिया: मोबाइल पर व्हाट्सएप ग्रुप ‘हिंदी शिक्षण विधियां’ नामक संगठन जो कि डेढ़ साल से हिंदी भाषा को लेकर काम कर रहा है। ग्रुप में शिक्षक प्रतियोगिताओं के माध्यम से छात्रों के अंदर ‘हिंदी’ की अलख जगाने का प्रयास कर रहे हैं, सभी शिक्षक हिंदी को लेकर अलग-अलग सुझाव साझा करते हैं और ज्यादातर सुझावों को प्रतियोगिताओं के माध्यम से स्कूलों में किया जा रहा है। ‘हिंदी’ शिक्षक डा. सोनिका का कहना है कि ‘हिंदी’ हमारी मातृभाषा है और हमें उसका सम्मान करना चाहिये, लेकिन आज आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ-साथ ‘हिंदी’ भाषा अपने महत्व को खोती चली जा रही है।देखने में आता है कि स्कूली शिक्षा से ही छात्रों में अंग्रेजी सीखने की ललक रहती है, हर कोई सफलता पाने के लिये अंग्रेजी भाषा को सीखना और बोलना चाहता है, इसलिए हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सभी शिक्षक एकजुट होकर काम कर रहे हैं। संगठन के अंदर सुरेश राणा, अशोक वशिष्ट व अन्य का सहयोग रहता है। समर वेकेशन व कवि सम्मेलन का भी ले रहे सहाराडा. सोनिका का कहना है कि ‘हिंदी’ को बढ़ावा देने के लिए वह बाकायदा गर्मी की छुट्टियों के अंदर भी हिंदी की कक्षाएं आयोजित करती हैं, जिसका मकसद केवल छात्रों का मनोरंजन करवाना है और विभिन्न प्रतियोगिता के जरिए उन्हें ‘हिंदी’ भाषा का महत्व समझाना है जबकि डेढ़ साल के बच्चे भी कहीं बाहर घूमने की बजाय स्कूल में आकर रूझान दिखाते हैं, इसके अलावा पहली बार स्कूल में ‘हिंदी’ के कवि सम्मेलन के जरिए भी हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है, पहले भी कवि सम्मेलन करवा चुके है और भविष्य में करवा रहे है, जबकि हरियाणा में पहली बार डा. सोनिका को मोबाइल प्रोजेक्ट से हिंदी को पढ़ाने का भी खिताब मिल चुका है।काउंसिलिंग के जरिए बच्चों को करती हैं जागरूक:सेवा समिति स्कूल में हिंदी की शिक्षक कुसुम बंसल भी हमेशा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत रहती हैं स्कूल के अंदर छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ काउंसिलिंग के जरिए भी हिंदी के प्रति जागरूक करती हैं, उनका कहना है कि ‘हिंदी’ को बढ़ावा देने का मुख्य उद्देश्य है दूसरे देशों में भी ‘हिंदी’ भाषा बोलते समय हमें शर्मिंदगी महसूस नहीं होनी चाहिए बल्कि ‘हिंदी’ बोलते समय हमें गर्व होना चाहिये।

राष्ट्रीय एकता के लिए नागरी लिपि की भूमिका

– डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष (तमिलनाडु) मैं महात्मा गांधी जी के इस वाक्य से ही यह आलेख प्रारंभ कर रही हूँ कि ‘‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है और नागरी लिपि के बिना राष्ट्रीय एकता अधूरी है।’’गांधीजी बहुत बड़े विचारक थे, वे हमेशा राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि के बारे में ही बातें करते रहे, उन्होंने बार-बार राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में लिपि के प्रश्न को उठाया और कहा- ‘‘मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सभी भारतीय भाषाओं की लिपि एक ही होनी चाहिए और ऐसी लिपि केवल देवनागरी लिपि ही हो सकती है।’’ आचार्य विनोबा भावे ने भी भारतीय भाषाओं के लिए जोड़लिपि के रूप में नागरी लिपि को अपनाने की वकालत की, वे चाहते थे कि सभी भारतीय भाषाएँ अपनी-अपनी लिपियों के साथ-साथ एक अतिरिक्त लिपि के रूप में नागरी लिपि का भी प्रयोग करें, इससे भारत की सभी भाषाएँ एक-दूसरे के निकट आएँगी और इससे राष्ट्रीय एकता और अधिक मजबूत बन जाएगी।हम सभी जानते हैं कि बोली एवं भाषा समाज की रीढ़ होती है और ये हमारी धरोहर है, इस संबंध में स्वर्गीय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था- ‘‘बोली या भाषा मात्र शब्द नहीं है, यह संस्कृति का पर्याय है।’’ बोली केवल बोली जाती है और भाषा लिखी जाती है, अत: बोली को भाषा के रूप में विकसित करने का श्रेय केवल सक्षम लिपि को ही है, इसके लिए हमारे विद्वानों ने हिंदी के लिए देवनागरी लिपि को ही स्वीकार किया है, आज हम सभी यह जानते हैं कि संपूर्ण विश्व में हिंदी की पढ़ाई देवनागरी लिपि के माध्यम से ही हो रही है। ‘हिंदी’ के अतिरिक्त भारत में संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी, बोडो, संथाली, सिंधी और उत्तर भारत की ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियाँ भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, आज भारत की प्रमुख लिपि देवनागरी लिपि ही है। भारतीय एकता के लिए हिंदी भाषा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, उसी प्रकार संपर्क लिपि के रूप में देवनागरी लिपि की उपयोगिता भी महत्त्वपूर्ण है, एक व्यक्ति को कई भाषाएँ सीखने में लिपियों की कठिनाई एक बहुत बड़ी समस्या है, अगर देवनागरी के माध्यम से तमिल, मलयालम, तेलगु या कन्नड़ भाषा को सीखने की सुविधा, हिंदी भाषा को दी जाए, तो व्यक्ति आसानी से उन भाषाओं को सीख सकता है, यदि कोई उत्तर भारत का व्यक्ति दक्षिण भारत की भाषा सीखना चाहता है तो पहले उसे उस भाषा की लिपि सीखनी पड़ती है, जिसमें उसका बहुत समय लग जाता है और बहुत कठिनाइयाँ भी होती है, परंतु यदि वही सामग्री उसे देवनागरी लिपि में मिल जाए तो उसे भाषा सीखने में उतनी कठिनाई नहीं होगी, सामान्य लिपि के होने पर एक व्यक्ति शीघ्र ही अनेक भाषाएँ सीख सकता है, यह कार्य अवश्य ही नागरी लिपि द्वारा ही संभव है, ऐसा मेरा विचार है। नागरी लिपि को अपनाने में कुछ भाषा क्षेत्रों में यह गलतफहमी है कि नागरी लिपि हिंदी की लिपि है और नागरी के माध्यम से उन पर हिंदी भाषा लादी जा रही है, परंतु यह गलत है।नागरी केवल हिंदी की ही नहीं, अपितु अनेक भाषाओं की लिपि है। भारत की अनेक भाषाओं के बीच में देवनागरी लिपि एक अंतिम जोड़लिपि के रूप में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में केवल देवनागरी लिपि ही महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है, इसके लिए मेरे विचार में ‘नागरी लिपि परिषद्’ विशेष कार्य कर रही है और विविध भाषा-क्षेत्रों में नागरी की उपयोगिता को प्रकाश में लाकर उसके विस्तृत प्रयोग के लिए उचित वातावरण पैदा करने का प्रयत्न कर रही है।कम्प्यूटर और मोबाइल पर अब और अधिक सुगमता से सोशल मीडिया के रूप में नागरी लिपि का प्रचलन दिनों-दिन बढ़ रहा है, अब नागरी लिपि संपर्क लिपि के रूप में पूरे देश में लोकप्रिय होती जा रही है।नागरी लिपि सरल है और वैज्ञानिक भी, इसलिए आसानी से वह सारे देश के लोगों को जोड़ सकती है, देवनागरी में सरलता का गुण है, अत: मेरे विचार से यदि दक्षिण भारत की भाषाएँ भी इसे अपना लें, तो शीघ्र ही राष्ट्र में एकता स्थापित कर सकते हैं। नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए विनोबा जी ने अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया, अब इस लक्ष्य को पूरा करने का कार्य ‘नागरी संगम’ पत्रिका और इससे जुड़े हुए अनेक कार्यकर्ता प्रधान संपादक डॉ. हरिसिंह पाल, बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ आदि अनेक विद्वतजन जुड़े हुए हैं, जिनका कार्य प्रशंसनीय है। आशा करती हूँ कि शीघ्र ही राष्ट्रीय एकता के लिए जोड़लिपि के रूप में नागरी लिपि की भूमिका सार्थक सिद्ध होगी।‘जय भारती, जय नागरी! हिंदी बाल एवं किशोर साहित्य: सम्भावनाएँ एवं चुनौतियाँ बाल-मन जिज्ञासाओं का समुद्र होता है। बच्चों में कल्पनाशीलता एवं अनुकरणशीलता बहुत अधिक होती है, ये गुण ही उनके चारित्रिक विकास एवं ज्ञान-वृद्धि का आधार है, अत: यह आवश्यक हो जाता है कि उनको शांत करने, नवीन जिज्ञासाएँ जगाने एवं कल्पनाशीलता को तीव्र करने के साधन उपलब्ध कराए जाएँ, यह दायित्व जागरूक अभिभावकों पर तो है ही, साथ ही एक साहित्यकार का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह इस कार्य में अभिभावकों की मदद करे, इस कार्य में प्रकाशक का भी अहम् रोल हो जाता है, क्योंकि बाल-साहित्य की सफलता अंत में उसकी प्रस्तुति पर ही निर्भर करती है, अत: इस उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक निभाने में इन तीनों का सामंजस्य आवश्यक है, यह विदित है कि बालक ही हमारे भावी समाज का आधार हैं, भावी समाज, देश व दुनिया का दायित्व उन्हीं के कंधों पर है, वे योग्य नागरिक बनकर इस दायित्व का निर्वहन कर सकेंगे, योग्य नागरिक वे तब ही बन सकते हैं जब उनके सामने पर्याप्त साधन होंगे, उनकी जिज्ञासाओं को शांत करने, कल्पना को तीव्र करने, उनके उत्साह को सही दिशा दिखाने के माध्यम! अपने भविष्य के आदर्श उनके सामने होंगे। बाल-साहित्य इय उद्देश्य की पूर्ति का एक अहम् एवं सशक्त माध्यम है। बाल-मन को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य बाल एवं किशोर साहित्य की संज्ञा में आता है, ऐसा साहित्य बालकों की जिज्ञासाओं को शांत करने तथा कल्पनाशीलता को तीव्र करने का माध्यम होता है, यह मनोरंजन के साथ-ही-साथ बालकों को शिक्षा भी प्रदान करता है। बाल-साहित्य लिखने के लिए लेखक को बाल-मन में डुबकी लगानी होती है। बाल साहित्यकार सुरेन्द्र विक्रम के अनुसार ‘जो साहित्य बच्चों के मन और मनोभावों को परखकर उनकी भाषा में लिखा गया हो, उसे बाल-साहित्य की संज्ञा दी जा सकती है।बाल-साहित्य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। दादा-दादी तथा नाना-नानी की कहानियों के रूप में इसकी मौखिक परंपरा रही है, जिसे आगे चलकर कुछ सुधी लेखकों ने संकलित करना आरंभ किया। भारत में लिखित बाल- साहित्य की परम्परा का आरंभ संस्कृत-काल से ही हो गया था। संस्कृत में ‘पंचतंत्र’ जैसा प्रसिद्ध बाल-कहानी-संग्रह इसका प्रमाण है। हिंदी में बाल-साहित्य का प्रारंभ अनुदित कहानियों से हुआ। राजा भोज का सपना, बच्चों का इनाम, लड़कों की कहानी, जैसी रचनाएं हिंद गद्य के आरंभिग युग में प्राप्त होती हैं। भारतेन्दु युग में ही मौलिक कहानियां भी लिखी जाने लगीं, आगे चलकर प्रेमचंद ने बाल-मन को आधार बनाकर कुछ कहानियां लिखीं, इन कहानियों में पशु-पक्षियों अथवा परियों के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का प्रयास रहा है, जिनसे बच्चों में साहस, बलिदान, त्याग, सहयोग और परिश्रम जैसे गुणों का विकास हो सके, परंतु बाल-साहित्य का उद्देश्य सिर्फ बालकों का मनोरंजन ही नहीं, अपितु वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराना भी है। बाल-साहित्य के माध्यम से ही हम उनको समाज एवं देश का भावी नागरिक बनने का सपना दिखा सकते हैं। बाल-साहित्यकार की भूमिका उस कुम्हार के समान है, जो कच्ची मिट्टी को चॉक के माध्यम से कोई भी आकार दे सकता है, वैसे ही यह बाल-साहित्यकार पर निर्भर करता है कि वह बालकों का भविष्य किस रूप में तय करता है, वह उसके माध्यम से संस्कार, समर्पण, सद्भावना और भारतीय संस्कृति के तत्व बिठा सकता है। बाल-साहित्य के इतिहास में ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ का उल्लेखनीय योगदान है, इसकी स्थापना १९५७ ई. में श्री शंकर पिल्लाई ने की, जिसका उद्देश्य बच्चों को उचित सामग्री, उचित डिजाइनिंग में उपलब्ध करना है। बाल-साहित्य में डिजाईनिंग का विशेष महत्व है, यही वह तत्व है, जो सामग्री को ग्राह्य बनाता है, इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर सन् १९९१ में ‘शंकर आर्ट अकादमी’ की स्थापना की गई, बाल-साहित्य का सचित्र होना अनिवार्य है, इसलिए बाल-साहित्य में चित्रकारों की भूमिका बढ़ जाती है।आधुनिक युग नव संचार का युग है। नव संचार के माध्यमों ने जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया, बाल-साहित्य भी उससे अछूता नहीं है। बच्चे दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रति आकृष्ट हुए, इसलिए बाल-कहानियों, नाटकों, कविताओं इत्यादि के प्रसारण की आवश्यकता बढ़ जाती है, इस पर आधारित फिल्में बनाई जाए तथा उनमें बालकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान में नित-नए अनुसंधानों एवं अविष्कारों, आरों से नये-नये शब्द हमारे समक्ष आते रहते हैं। विज्ञान और तकनीकी विषयों में प्रयुक्त होनेवाले शब्द अपने आशय में अभिधार्थ होते हैं, ऐसे शब्दों के पीछे कोई विचार या संकल्पना निहित होती है, जिससे इन शब्दों की परिभाषाएँ निश्चित कर दी जाती हैं, इनके अर्थ को एक क्षेत्र विशेष तक सीमित कर दिया जाता है तथा इनके अन्य अर्थ नहीं होते, उदाहरण के लिए ‘आयकर’ शब्द का अर्थ आमदनी पर सरकार द्वारा लिया जानेवाला कर, सरकार की अतिरिक्त आमदनी पर वसूला गया कर नहीं है, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के पीछे कोई-न-कोई संकल्पना जुड़ी रहती है, इसी संकल्पना के आधार पर इनकी परिभाषा की जाती है, इन शब्दों की परिभाषा इस रूप में की जा सकती है- ‘ऐसे शब्द जो ज्ञान-विज्ञान या विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में विशिष्ट अर्थों में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें तकनीकी शब्द कहते हैं।पारिभाषिक शब्दावली का संबंध किसी भाषा-भाषी समाज के सांस्कृतिक और वैचारिक विकास से होता है। सामाजिक विकास के साथ ही भाषा में नयी संकल्पनाएँ विकसित होने लगती हैं, परिणामत: इन संकल्पनाओं से संबंधित पारिभाषिक शब्दावली विकसित होने लगती है। हिंदी भाषा ने ज्यादातर पारिभाषिक, शब्दों को संस्कृत भाषा से ग्रहण किया है, किंतु आधुनिक विज्ञान-शब्दावलियाँ अंग्रेजी भाषा से ग्रहण की गई हैं।आज विज्ञान में नये-नये अनुसंधानों से नयी शब्दावलियों के निर्माण की चुनौतियाँ हिंदी भाषा के समक्ष हैं। इन चुनौतियाँ हिंदी भाषा के चिन्तकों, विचारकों, विद्वानों आदि ने हिंदी भाषा में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के निर्माण में सफल प्रयास किया है।किसी भी भाषा की व्यापकता और सम्प्रेषणीयता उसकी शब्द-सम्पदा की समृद्धि से आंकी जाती है, आज के वैज्ञानिक युग में नित गए वैज्ञानिक अनुसंधानों से नये शब्दों के निर्माण की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावलियों को किसी भाषा में व्यवहृत करने, अनुदित करने और उस भाषा की प्रकृति के अनुसार समायोजित करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हिंदी भाषा के समक्ष आज यही चुनौतियाँ है, इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए हिंदी हृदय की अभिव्यक्ति के साथ मस्तिष्क की जटिलताओं तथा उन जटिलताओं से उद्भूत विज्ञान और तकनीकी सेवा है, इस समय विज्ञान और तकनीकी शब्दों के निर्माण को लेकर जो चुनौतियाँ हैं, जो संभावनाएँ हैं, उन्हीं की चर्चा सर्वप्रथम की जाएगी।प्रथमत: वैज्ञानिक विषयों के शोध पत्रों का हिंदी अनुवाद सर्वाधिक कठिन कार्य है, इसमें से अनेक शब्द शब्दकोश में भी नहीं मिलते और वे नए होते हैं, उन्हें हिंदी में ही लिखकर संतोष करना पड़ता है, दूसरा, आज विज्ञान के ज्ञान में ज्यों-ज्यों वृद्धि होती जा रही है, नई-नई चुनौतियाँ हमारे सामने आती जा रही हैं, आज नई खोजों के कारण कुछ नए विज्ञान का भी लगातार सृजन हो रहा है, उदाहरण के लिए पर्यावरण विज्ञान से संबंधित एक शब्द होलिस्टिक का इन दिनों धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। होटस्पॉट शब्द भी आज पर्यावरण का जाना-पहचाना शब्द बन चुका है, इसी प्रकार स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विज्ञान से संबंधित अंग्रेजी के अनेक नए तकनीकी शब्दों को प्रयोग में लाया जा रहा है। रोबोट विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, नैनोटेक्नोलॉजी, जीनोगिक्स आदि नए-नए शब्द सामने आते जा रहे हैं, जिनके हिंदी पर्यायवाची शब्दों के निर्माण की नितांत आवश्यकता है।तीसरा, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के प्रयोग में उचित शब्दों के चुनाव के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, तकनीकी शब्द जो गणित अथवा रसायन विज्ञान या जीव विज्ञान के लिए प्रयोग किए जाते हैं, भिन्न होती हैं, एक ही शब्द सभी वैज्ञानिक विषयों के लिए उपयुक्त नहीं होता, चौथा, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के लिप्यंतरण अनुवाद और समायोजन की चुनौती भी हिंदी भाषा के समक्ष है।उपर्युक्त वर्णित चुनौतियों के समाधान के संबंध में समय-समय पर चिन्तकों, वैज्ञानिकों और विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किए हैं। गाँधी जी के विचार हिंदी राष्ट्रभाषा बनें किसी अंग्रेज़ ने किसी हिंदुस्तानी से कहा था कि जानते हो हमारा सूरज क्यों नही डूबता? हम जिस देश में भी क़दम रखते हैं, सबसे पहिले हम उसकी जीभ नोंच लेते हैं, उस देश की लोक-जिव्हा यानी भाषा को ज़ंजीरों में जकड़ लेते हैं।उस अंग्रेज़ मित्र का यह कथन हिंदुस्तान पर सौ-फ़ीसदी घटित हुआ। भाषा के विष- दंश से हम आज भी पीड़ित हैं, बापू ने लोक-मानस की इस गुत्थी को बड़ी गहराई से समझा-सुलझाया था।पं. गिरिधर शर्मा का सन् १९१५ का प्रस्ताव कि ‘हिंदी को हिंदुस्तान के कोने-कोने में पहुँचा दो तो देश आजाद हो जायेगा’ उनके मन: प्राण पर छा गया। देश की अंतरात्मा को अंग्रेज़ी में पुकारा या जगाया जाए,यह तो गांधी जी के लिए कल्पनातीत था, वे भली-भाँति जानते थे कि देश की महत्ता और गौरव, देश के हिमगिरि और गंगा को लोक-भाषाओं में ही जगाया जा सकता है अन्यथा नहीं, अत: उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार को अपने जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बना लिया। ठीक सौ साल बाद: गांधी जी का संदेश(महात्मा गांधी का कथन-१९१७ गुजरात-शिक्षा-परिषद्) राष्ट्रभाषा की चार शर्तें:अंग्रेज़ी भाषा राष्ट्र-भाषा नहीं हो सकती ;क्योंकि राष्ट्र-भाषा होने के लिए चार बातों की आवश्यकता है जो अंग्रेज़ी में नहीं है :१. अफ़सरों के लिए उसका सीखना सहज हो,२. लोगों के धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक व्यवहार की वह भाषा हो,३. उसे बहुत लोग बोलते हों,४. वह कुछ दिनों के लिए राष्ट्र-भाषा न बनाई जाए,ऐसी भाषा केवल हिंदी ही है। प्रस्तुति : निर्मलकुमार पाटोदी, इंदौर

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