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शिवाजी महाराज का इतिहास

भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक अभ्यासों में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वे बड़े ध्यान से करते थे।पूरा नाम – शिवाजी शहाजी भोसलेजन्म – १९ फरवरी, १६३०/अप्रिल १६२७जन्मस्थान – शिवनेरी दुर्ग (पुणे)पिता – शहाजी भोसलेमाता – जिजाबाई शहाजी भोसलेविवाह – सइबाई के साथशिवाजी का प्रारभिक जीवन – शिवाजी का जन्म १६२७ में पुणे जिले के जुन्नर शहर में शिवनेरी दुर्ग में हुआ, इनके जन्मदिवस पर विवाद है लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने १९ फरवरी १६३० को उनका जन्म दिवस स्वीकार किया है, उनकी माता ने उनका नाम भगवान शिवाय के नाम पर शिवाजी रखा जो उनसे स्वस्थ सन्तान के लिए प्रार्थना करती रहती थी, शिवाजी के पिताजी शाहजी भोसले एक मराठा सेनापति थे जो डेक्कन सल्तनत के लिए काम करते थे। माँ जीजाबाई सिंधखेड़ व लाखूजीराव जाधव की पुत्री थी। शिवाजी के जन्म के समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शाहजी अक्सर अपनी निष्ठा निजामशाही, आदिलशाह और मुगलों के बीच बदलते रहते थे लेकिन अपनी जागीर हमेशा पुणे ही रखी और उनके साथ उनकी छोटी सेना भी रहती थी। सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शाहजी अक्सर अपनी निष्ठा निजामशाही, आदिलशाह और मुगलों के बीच बदलते रहते थे लेकिन अपनी जागीर हमेशा पुणे ही रखी और उनके साथ उनकी छोटी सेना भी रहती थी।शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई से बेहद समर्पित थे जो बहुत ही धार्मिक थी। धार्मिक वातावरण ने शिवाजी पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था जिसकी वजह से शिवसाजी महाराज ने महान हिन्दू ग्रंथों रामायण और महाभारत की कहानियां भी अपनी माता से सुनी, इन दो ग्रंथों की वजह से वो जीवनपर्यन्त हिन्दू महत्वों का बचाव करते रहे, इसी दौरान शाहजी ने दूसरा विवाह किया और उनकी दुसरी पत्नी तुकाबाई के साथ शाहजी कर्नाटक में आदिलशाह की तरफ से सैन्य अभियानों के लिए चले गये, उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को छोड़ कर उनका संरक्षक दादोजी कोंणदेव को बना दिया। दादोजी ने शिवाजी को बुनियादी लड़ाई, तकनीकें जैसे घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी सिखाई।शिवाजी बचपन से ही उत्साही योद्धा थे, हालांकि इस वजह से उन्हें केवल औपचारिक शिक्षा दी गयी जिसमें वो लिख-पढ़ नहीं सकते थे लेकिन फिर भी उनको सुनाई गई बातों को उन्हें अच्छी तरह याद रहता था। शिवाजी ने मावल क्षेत्र से अपने विश्वस्त साथियों और सेना को इकट्टा किया, मावल साथियों के साथ शिवाजी खुद को मजबूत करने और अपनी मातृभूमि के ज्ञान के लिए सहयाद्रि रेंज की पहाड़ियों और जंगलों में घूमते रहते थे, ताकि वो सैन्य प्रयासों के लिए तैयार हो सके। १२ वर्ष की उम्र में शिवाजी को बंगलौर ले जाया गया, जहां उनका ज्येष्ठ भाई साम्भाजी और उनका सौतेला भाई एकोजी पहले ही औपचारिक रूप से प्रशिक्षित थे। शिवाजी का १६४० में निम्बालकर परिवार की सइबाई से विवाह कर दिया गया। १६४५ में किशोर शिवाजी ने प्रथम बार हिंदवी स्वराज्य की अवधारणा दादाजी नरस प्रभु के समक्ष प्रकट की। शिवाजी का आदिलशाही सल्तनत के साथ संघर्ष –१६४५ में १५ वर्ष की आयु में शिवाजी ने आदिलशाह सेना को आक्रमण की सुचना दिए बिना हमला कर तोरणा किला विजयी कर लिया। फिरंगोजी नरसला ने शिवाजी की स्वामी भक्ति स्वीकार कर ली और शिवाजी ने कोंडाना का किले पर कब्जा कर लिया, कुछ तथ्य बताते हैं कि शाहजी को १६४९ में इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि शिवाजी और संभाजी कोड़ना का किला छोड़ देवे लेकिन कुछ तथ्य शाहजी को १६५३ से १६५५ तक कारावास में बताते हैं। शाहजी की रिहाई के बाद वो सार्वजनिक जीवन से सेवामुक्त हो गये और शिकार के दौरान १६४५ के आस पास उनकी मृत्यु हो गयी। पिता की मौत के बाद शिवाजी ने आक्रमण करते हुए फिर से १६५६ में पड़ोसी मराठा मुखिया से जावली का साम्राज्य हथिया लिया।१६५९ में आदिलशाह ने एक अनुभवी और दिग्गज सेनापति अफज़ल खान को शिवाजी को तबाह करने के लिए भेजा गया, ताकि वो क्षेत्रीय विद्रोह को कम कर देवे। १० नवम्बर १६५९ को वे दोनों प्रतापगढ़ किले की तलहटी पर एक झोपड़ी में मिले, इस तरह का हुक्मनामा तैयार किया गया था कि दोनों केवल एक तलवार के साथ आयेगें, शिवाजी को संदेह हुआ कि अफज़ल खान उन पर हमला करने की रणनीति बनाकर आएगा इसलिए शिवाजी ने अपने कपड़ों के नीचे कवच, दायी भुजा पर छुपा हुआ और बाए हाथ में एक कटार साथ लेकर आये। तथ्यों के अनुसार दोनों में से किसी एक ने पहले वार किया, मराठा इतिहास में अफज़ल खान को विश्वासघाती बताया है जबकि पारसी इतिहास में शिवाजी को विश्वासघाती बताया गया है। इस लडाई में अफज़ल खान की कटार को शिवाजी के कवच ने रोक दिया और शिवाजी के हथियार ने अफज़ल खान पर इतने घातक घाव कर दिए जिससे उसकी मौत हो गयी, इसके बाद शिवाजी ने अपने छिपे हुए सैनिकों को बीजापुर पर हमला करने के संकेत दिए। १० नवम्बर १६५९ को प्रतापगढ़ का युद्ध हुआ, जिसमें शिवाजी की सेना ने बीजापुर के सल्तनत की सेना को हरा दिया। चुस्त मराठा पैदल सेना और घुड़सवार बीजापुर पर लगातार हमला करने लगे, मराठा सेना ने बीजापुर सेना को पीछे धकेल दिया। बीजापुर सेना के ३००० सैनिक मारे गये और अफज़ल खान के दो पुत्रों को बंदी बना लिया गया, इस बहादुरी से शिवाजी मराठा लोकगीतों में एक वीर और महान नायक बन गये। बड़ी संख्या में जब्त किये गये हथियारों, घोड़ों और दुसरे सैन्य सामानों से मराठा सेना और ज्यादा मजबूत हो गयी, मुगल बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी को मुगल साम्राज्य के लिए बड़ा खतरा बताया। प्रतापगढ़ में हुए नुकसान की भरपाई करने और नवोदय मराठा शक्ति को हराने के लिए इस बार बीजापुर के नये सेनापति रुस्तमजमन के नेतृत्व में शिवाजी के विरुद्ध १०००० सैनिकों को भेजा गया। मराठा सेना के ५००० घुड़सवारों की मदद से शिवाजी ने कोल्हापुर के निकट २८ दिसम्बर १६५९ को धावा बोल दिया। आक्रमण को तेज करते हुए शिवाजी ने दुश्मन की सेना को मध्य से प्रहार किया और दो घुड़सवार सेना ने दोनों तरफ से हमला कर दिया। कई घंटो तक ये युद्ध चला और अंत में बीजापुर की सेना बिना किसी नुकसान के पराजित हो गयी और सेनापति रुस्तमजमन रणभूमि छोड़ कर भाग गया। आदिलशाही सेना ने इस बार २००० घोड़े और १२ हाथी खो दिए। १६६० में आदिलशाह ने अपने नये सेनापति सिद्दी जौहर ने मुगलों के साथ गठबंधन कर हमले की तैयारी की, उस समय शिवाजी की सेना ने पन्हाला वर्तमान कोल्हापुर में डेरा डाला हुआ था। सिद्दी जौहर की सेना किले से आपूर्ति मार्गाें को बंद करते हुए शिवाजी की सेना को घेर लिया, पन्हाला में बमबारी के दौरान सिद्दी जौहर ने अपनी युद्ध क्षमता बढ़ाने के लिए अंग्रेजों से हथगोले खरीद लिए थे और साथ ही कुछ बमबारी करने के लिए कुछ अंग्रेज तोपची भी नियुक्त किये थे, इस कथित विश्वासघात से शिवाजी नाराज हो गये क्योंकि उन्होंने राजापुर के एक अंगरेजी कारखाने से हथगोले लुटे थे।घेराबंदी के बाद अलग-अलग लेखों में अलग-अलग बात बताई गयी है जिसमें से एक लेख में शिवाजी बचकर भाग जाते हैं और इसके बाद आदिल शाह खुद किले में हमला करने आता है और चार महीनों तक घेराबंदी के बाद किले पर कब्जा कर लेता है। दुसरे लेखों में घेराबंदी के बाद शिवाजी सिद्दी जौहर से बातचीत कर विशालगढ़ का किला उसको सौंप देते हैं। शिवाजी के समर्पण या बच निकलने पर भी विवादित लेखों के अनुसार शिवाजी रात के अँधेरे में पन्हला से निकल जाते हैं और दुश्मन सेना उनका पीछा करती है। मराठा सरदार बंदल देशमुख के बाजी प्रभु देशपांडे अपने ३०० सैनिकों के साथ स्वेच्छा से दुश्मन सेना को रोकने के लिए लड़ते है और कुछ सेना शिवाजी को सुरक्षित विशालगढ़ के किले तक पहुंचा देती है। पवन खिंड के युद्ध में छोटी मराठा सेना विशाल दुश्मन सेना को रोककर शिवाजी को बच निकलने का समय देती है। बाजी प्रभु देशपांडे इस युद्ध में घायल होने के बावजूद लड़ते रहे जब तक कि विशालगढ़ से उनको तोप की आवाज नहीं आ गयी, तोप की आवाज इस बात का संकेत था कि शिवाजी सुरक्षित किले तक पहुंच गये हैं। शिवाजी का मुगलों के साथ संघर्ष और शाइस्ता खाँ पर हमला, १६५७ तक शिवाजी ने मुगल साम्राज्य के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाये रखे। शिवाजी ने बीजापुर पर कब्ज़ा करने में औरंगजेब को सहायता देने का प्रस्ताव दिया और बदले में उसने बीजापुरी किले और गाँवों को उसके अधिकार में देने की बात कही। शिवाजी का मुगलों से टकराव १६५७ में शुरू हुआ जब शिवाजी के दो अधिकारियों ने अहमदनगर के करीब मुगल क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया, इसके बाद शिवाजी ने जुनार पर आक्रमण कर दिया और ३ लाख सिक्के और २०० घोड़े लेकर चले गये। औरंगजेब ने जवाबी हमले के लिए नसीरी खान को आक्रमण के लिए भेजा, जिसने अहमदनगर में शिवाजी की सेना को हराया था, लेकिन औरंगजेब का शिवाजी के खिलाफ ये युद्ध बारिश के मौसम और शाहजहां की तबियत खराब होने की वजह से बाधित हो गया।बीजापुर की बड़ी बेगम के आग्रह पर औरंगजेब ने उसके मामा शाइस्ता खाँ को १५०,००० सैनिकों के साथ भेजा, इस सेना ने पुणे और चाकन के किले पर कब्ज़ा कर आक्रमण कर दिया और एक महीने तक घेराबंदी की। शाइस्ता खाँ ने अपनी विशाल सेना का उपयोग करते हुए मराठा प्रदेशों और शिवाजी के निवास स्थान लाल महल पर आक्रमण कर दिया। शिवाजी ने शाइस्ता खाँ पर अप्रत्याशित आक्रमण कर दिया, जिसमें शिवाजी और उनके २०० साथियों ने एक विवाह की आड़ में पुणे में घुसपैठ कर दी। महल के पहरेदारों को हराकर, दीवार पर चढ़कर शहिस्ता खान के निवास स्थान तक पहुंच गये और वहां जो भी मिला उसको मार दिया। शाइस्ता खाँ की शिवाजी से हाथापाई में उसने अपना अंगूठा गवां दिया और बच कर भाग गया, इस घुसपैठ में उसका एक पुत्र और परिवार के दुसरे सदस्य मारे गये, शाइस्ता खाँ ने पुणे से बाहर मुगल सेना के यहां शरण ली और औरंगजेब ने शर्मिंदगी के मारे सजा के रूप में उसको बंगाल भेज दिया। शाइस्ता खाँ ने एक उज़बेक सेनापति करतलब खान को आक्रमण के लिए भेजा। ३०००० मुगल सैनिकों के साथ वो पुणे के लिए रवाना हुए और प्रदेश के पीछे से मराठों पर अप्रत्याशित हमला करने की योजना बनाई । उम्भेरखिंड के युद्ध में शिवाजी की सेना ने पैदल सेना और घुड़सवार सेना के साथ उम्भेरखिंड के घने जंगलों में घात लगाकर हमला किया, शाइस्ता खाँ के आक्रमणों का प्रतिशोध लेने और समाप्त राजकोष को भरने के लिए १६६४ में शिवाजी ने मुगलों के व्यापार केंद्र सुरत को लुट लिया। औरंगजेब ने गुस्से में आकर मिर्जा राजा जय सिंह को १५०,००० सैनिकों के साथ भेजा। जय सिंह की सेना ने कई मराठा किलों पर कब्जा कर लिया, शिवाजी ने ओर अधिक किलो को खोने के बजाय औरंगजेब से शर्तों के लिए बाध्य किया। जय सिंह और शिवाजी के बीच पुरन्दर की संधि हुयी जिसमें शीवाजी ने अपने २३ किले सौंप दिए और जुर्माने के रूप में मुगलों को ४ लाख रूपये देने पड़े, उन्होंने अपने पुत्र साम्भाजी को भी मुगल सरदार बनकर औरंगजेब के दरबार में सेवा की बात पर राजी हो गये। शिवाजी के एक सेनापति नेताजी पलकर धर्म परिवर्तन कर मुगलों में शामिल हो गये और उनकी बहादुरी पर पुरस्कार भी दिया गया।मुगलों की सेवा करने के दस वर्ष बाद वो फिर शिवाजी के पास लौटे और शिवाजी के कहने पर फिर से हिन्दू धर्म स्वीकार किया।१६६६ में औरंगजेब ने शिवाजी को अपने नौ साल के पुत्र संभाजी के साथ आगरा बुलाया, औरंगजेब की शिवाजी को कांधार भेजने की योजना थी ताकि वो मुगल साम्राज्य को पश्चिमोत्तर सीमांत संघटित कर सके। १२ मई १६६६ को औरंगजेब ने शिवाजी को दरबार में अपने सबदारो के पीछे खड़ा रहने को कहा। शिवाजी ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध में दरबार पर धावा बोल दिया। शिवाजी को तुरंत आगरा के कोतवाल ने गिरफ्तार कर लिया।शिवाजी को आगरा में बंदी बनाना और बच कर निकल जानाशिवाजी ने कई बार बीमारी का बहाना बनाकर औरंगजेब को धोखा देकर डेक्कन जाने की प्रार्थना की, हालांकि उनके आग्रह करने पर उनकी स्वास्थ्य की दुवा करने वाले आगरा के संत, फकीरों और मन्दिरों में प्रतिदिन मिठाइयाँ और उपहार भेजने की अनुमति दी गई थी। कुछ दिनों तक ये सिलसिला चलने के बाद शिवाजी ने संभाजी को मिठाइयों की टोकरी में बिठाकर और खुद मिठाई की टोकरियां उठाने वाले मजदूर बनकर वहां से भाग गये, इसके बाद शिवाजी और उनका पुत्र साधू के वेश में निकलकर भागे, भाग निकलने के बाद शिवाजी ने खुद को और संभाजी को मुगलों से बचाने के लिए संभाजी की मौत की अफवाह फैला दी। इसके बाद संभाजी को विश्वनीय लोगों द्वारा आगरा से मथुरा ले जाया गया।शिवाजी के बच निकलने के बाद शत्रुता कमजोर हो गयी और संधि की शर्ते १६७० के अंत तक खत्म हो गयी, इसके बाद शिवाजी ने एक मुगलों के खिलाफ एक बड़ा आक्रमण किया और चार महीनों में उन्होंने मुगलों द्वारा छीने गये प्रदेशों पर फिर कब्जा कर लिया, इस दौरान तानाजी मालुसरे ने सिंघाड़ का किला जीत लिया था। शिवाजी दुसरी बार जब सुरत को लुट कर आ रहे थे तो दौड़ खान के नेतृत्व में मुगलों ने उनको रोकने की कोशिश की गई, लेकिन उनको शिवाजी ने युद्ध में परास्त कर दिया। अक्टूबर १६७० में शिवाजी ने अंग्रेजों को परेशान करने के लिए अपनी सेना बॉम्बे भेजी, अंग्रेजों ने युद्ध सामग्री बेचने से मना कर दिया तो उनकी सेना से बॉम्बे के कड़हारों के दल को अवरुद्ध कर दिया। नेसारी की जंग और शिवाजी का राज्याभिषेक– १६७४ में मराठा सेना के सेनापति प्रतापराव गुर्जर को आदिलशाही सेनापति बहलोल खान की सेना पर आक्रमण के लिए बोला। प्रतापराव की सेना पराजित हो गयी और उसे बंदी बना लिया गया, इसके बावजूद शिवाजी ने बहलोल खान को प्रतापराव के रिहा करने की धमकी दी वरना वो हमला बोल देंगे। शिवाजी ने प्रतापराव को पत्र लिखकर बहलोल खान की बात मानने से इंकार कर दिया, अगले कुछ दिनों में शिवाजी को पता चला कि बहलोल खान की १५००० लोगों की सेना कोल्हापुर के निकट नेसरी में रुकी है। प्रतापराव और उसके छ: सरदारों ने आत्मघाती हमला कर दिया ताकि शिवाजी की सेना को समय मिल सके। मराठों ने प्रतापराव की मौत का बदला लेते हुए बहलोल खान को हरा दिया और उनसे अपनी जागीर छीन ली। शिवाजी प्रतापराव की मौत से काफी दुखी हुए और उन्होंने अपने दुसरे पुत्र की शादी प्रतापराव की बेटी से कर दी।शिवाजी ने अब अपने सैन्य अभियानों से काफी जमीन और धन अर्जित कर लिया था लेकिन उन्हें अभी तक कोई औपचारिक ख़िताब नहीं मिला था। एक राजा का ख़िताब ही उनको आगे आने वाली चुनौती से रोक सकता था। शिवाजी को रायगढ़ में मराठों के राजा का ख़िताब दिया गया। पंडितों ने सात नदियों के पवित्र पानी से उनका राज्याभिषेक किया। अभिषेक के बाद शिवाजी ने जीजाबाई से आशीर्वाद लिया, एक समारोह में लगभग रायगढ़ के ५००० लोग इक्ठटा हुए थे। शिवाजी को छत्रपति का खिताब भी यहीं दिया गया। राज्याभिषेक के कुछ दिनों बाद जीजाबाई की मौत हो गयी, इसे अपशकुन मानते हुए दुसरी बार राज्याभिषेक किया गया।दक्षिणी भारत में विजय और शिवाजी के अंतिम दिन– १६७४ की शुरुवात में मराठों ने एक आक्रामक अभियान चलाकर खानदेश पर आक्रमण कर बीजापुरी पोंडा, कारवार और कोल्हापुर पर कब्जा कर लिया, इसके बाद शिवाजी ने दक्षिण भारत में विशाल सेना भेजकर आदिलशाही किलों को जीता। शिवाजी ने अपने सौतेले भाई वेंकोजी से सामंजस्य करना चाहा लेकिन असफल रहे, इसलिए रायगढ़ से लौटते वक्त उसको हरा दिया और मैसूर के अधिकतर हिस्सों पर कब्जा कर लिया।१६८० में शिवाजी बीमार पड़ गये और ५२ वर्ष की उम्र में इस दुनिया से चले गये। शिवाजी के मौत के बाद उनकी पत्नी सोयराबाई ने उसके पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बिठाने की योजना बनाई। संभाजी महाराज की बजाय १० साल के राजाराम को सिंहासन पर बिठाया गया, हालांकि संभाजी ने इसके बाद सेनापति को मारकर रायगढ़ किले पर अधिकार कर लिया और खुद सिंहासन पर बैठ गया। संभाजी महाराज ने राजाराम, उसकी पत्नी जानकी बाई को कारावास भेज दिया और माँ सोयराबाई को साजिश के आरोप में फांसी पर लटका दिया। संभाजी महाराज इसके बाद वीर योद्धा की तरह कई वर्षों तक मराठों के लिए लड़े। शिवाजी के मौत के बाद २७ वर्ष तक मराठों का मुगलों से युद्ध चला और अंत में मुगलों को हरा दिया, इसके बाद अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को समाप्त किया। शिवाजी महाराज मराठी लोगों के लिए देवता समान हैं और हिन्दुओं में उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है होना चाहिये अब भी है…….? भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता वर्तमान उत्तर आधुनिक दौर में जब वैश्वीकरण की आँधी चल रही है और सम्पूर्ण विश्व को एक रीति-नीति के अंतर्गत लाने का प्रयास हो रहा है तब यह जरूरी है जाता है कि हम अपनी हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता पर नए सिरे से विचार करें। भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीनता और कालजयता के कारण विश्व प्रसिद्ध है, यह आरंभ से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के महती आदर्श को लेकर चली है, आज वैश्वीकरण अर्थशास्त्र और प्रौद्योगिकी के सानुपातिक समायोजन द्वारा एक ऐसी विश्व-व्यवस्था कायम करने का हिमायती है कि जहाँ किस्म-किस्म की अर्थव्यवस्थाओं में स्वाभाविक संश्लेषण होगा, यह अंग्रेजी के ‘ग्लोबलाइजेशन’ शब्द का हिंदी रूपांतर है जो एक ही विश्व-व्यवस्था को कायम करने के लक्ष्य को लेकर संकल्पित है। वैश्वीकरण विश्व बाजारवाद के रथ पर आरूढ़ होकर शिक्षण प्रौद्योगिकी के सहारे वैश्विक अर्थ तंत्र को प्रतिष्ठित एवं विकसित करने के लिए हरेक देश की व्यवस्था से अनिवार्य रूप से जुड़ने के लिए कृत संकल्प है, इसे साकार करने के लिए पहले ‘गेट’ के द्वारा तथा बाद में विश्व व्यापार संगठन के सटीक माध्यम द्वारा सक्रिय अभियान चलाया गया, इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण विश्व के अर्थ तंत्र को एक खुली व्यवस्था के तहत लाकर निश्चित विधान का दायरा प्रदान किया गया, आज वैश्वीकरण एक विराट वर्चस्वी संरचना के रूप में हमारे सामने है तथा विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, कारपोरेट जगत, बहुराष्ट्रीय निगम तथा तकनीकी आविष्कृतियाँ उसके आधार-स्तंभ के रूप में कार्यरत हैं।ऐसे तीव्र बदलाव वाले समय में भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता पर खुला विमर्श होना चाहिए जिससे उसके सर्वोत्तम पक्षों को विश्व मनुष्यता के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।आज जब समूचा विश्व मूल्यहीनता और भयावह अनास्था का शिकार हो रहा है तब भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, वस्तुतः भारतीय संस्कृति एक विशेष भौगोलिक और ऐतिहासिक परंपरा के भीतर मनुष्य के सर्वोत्तम अंश को प्रकाशित करने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, उसकी प्रमुख विशेषता, चिंतन की स्वतंत्रता, बाहरी ग्रहण करने योग्य तत्वों को पचा कर हजम कर जाने की क्षमता और समय के अनुवूâल इसी में परिवर्तन कर देने की योग्यता है, अनेक धर्मों, विचारधाराओं, जीवन प्रणालियों और भौगोलिक विविधता के रहते हुए उसमें विद्यमान एकता असंदिग्ध और रमणीय है।भारतीय संस्कृति चराचर जगत के प्रति अभेदता एवं एकता का भाव लेकर चली है। सर्वप्रथम वेदों और उपनिषदों में यह विचार आया कि एक ही प्राणवान सत्ता सभी स्थानों पर व्याप्त है, वह ऊर्जा के विभिन्न रूपों में सारे संसार में महसूस की जा सकती है-ईशावास्यम इदम् सर्वम यात्किंच जगत्यम जगत। धूल के इस कण को जिसे हम पृथ्वी कहते हैं, उसी में नहीं बल्कि उस जैसी अरबों पृथ्वियों, आकाश गंगाओं तथा समूचे ब्रह्माण्ड में ईश्वरीय शक्ति के संधान की दृष्टि ही भारतीय संस्कृति की मूल चेतना है, हमारे ऋषियों द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त, एक ही उâर्जा और एक ही शक्ति समूची सृष्टि में हजारों साल पुराना है जबकि पश्चिम में आइन्स्टीन जैसे वैज्ञानिक की समझ में यह बात एक शताब्दी पूर्व आई है।इस सूत्र को व्यावहारिक अर्थ देने वाली एक संकल्पना और है जो भारतीय संसद के मुख्य द्वार पर भी अंकित है- ‘‘अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसां। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकं।।’’अर्थात् यह मेरा है, और वह तेरा, संकुचित ह्रदय वाले ही सोच सकते हैं जिसका चित विशाल है, उसके लिए तो सारा विश्व एक परिवार के समान है, यही बात गोस्वामी तुलसीदास ‘रामचरितमानस’ में दूसरे ढंग से कहते हैं-‘मैं अरु मोर तोर यह माया, जिहि बस कीन्हें जीव निकाया।’इससे बचने का वे मार्ग भी सुझाते हैं- ‘सीय-राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि जुग पाणी।’ प्रसाद जी ने कामायनी में दिखलाया है कि जब मनु श्रद्धा की सहायता से आनंद की प्राप्ति करते हैं तब तब वे विराट विश्वचेतना से पुलकित होकर कह उठते हैं-‘‘हम अन्य न और कुटुम्बी, हम न केवल एक हमी हैं।तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ कमी नहीं है।’’कहना न होगा कि इस विराट दृष्टिकोण ने भारतीय संस्कृति को अविरोधी रूप में विकसित किया। हमारे ऋषियों ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा अविरोधी धर्म एवं संस्कृति की जो संकल्पना विकसित की, वह सम्पूर्ण विश्व में अपना दृष्टान्त आप ही है। गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकले दो सूत्र भारतीय संस्कृति को उस ऊंचाई पर ले जाते हैं जिसके आगे राह नहीं, कहा जा सकता है, सारे जगत में भारतीय संस्कृति ही यह प्रतिपादित कराती है कि किसी भी धर्म के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति संभव है। ऋग्वेद में एक मन्त्र है कि ‘एकम सत विप्र: बहुधा वदन्ति ‘अर्थात् सत्य एक है, विद्वान उसे भिन्न नामों से पुकराते हैं। हिंदी के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने भी लिखा हैविधना के मारण हैं तेते। सरग नखत तन रोवां तेते।’भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोने तथा संगठित रखने में इस चिंतानात्मकता का विशेष योगदान रहा है। महाभारतकार वेदव्यास ने भारतीय संस्कृति की एक सूत्रता प्रमाणित करते हुए बहुलात्मक समाज वाले सामासिक संश्लिष्टता से युक्त भारत का सपना देखा, उन्होंने समग्र भारतीय समाज को कुल का स्वरूप दिया, जिसके अंतर्गत सात-सात कुल नदियों का समावेश किया गया, इसमें अनंत की एकता प्रमाणित करने के लिए अनजान क्षितिज को सहारा देने वाले बन्धुसागर को विशेष स्थान दिया गया। देशव्यापी सात पुरियों की अवधारणा से यह कुल परिपुष्ट हुआ, इस कुल का जो स्वभावसिद्ध आचार नियत हुआ वह देश भक्ति और लोकशक्ति के अंतरालंबन पर आधारित था, फलत: इस कुल के लिए कोई भी पराया नहीं था, सब अपने थे, समूचा विश्व एक अद्वितीय नीड़ के रूप में देखा गया। समूची पृथ्वी सबकी माता मानी गयी, केवल मनुष्य की ही नहीं, चर और अचर की भी, इस संकल्पना ने समूचे देश को पुष्पहार की भाँति एक सूत्र में पिरो दिया। भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में पिरोने में शिव का सबसे बड़ा योगदान रहा है। शिव ने सती के शव को लेकर जो तांडव किया उसी के फलस्वरूप इस देश का चप्पा-चप्पा एक सूत्र में ग्रंथित हो गया, वह शव खंड-खंड होकर सारे देश में गिरा और चौरासी शक्तिपीठों की स्थापना का कारण बना, ये पीठ अथवा साधना केंद्र अरुणाचल से लेकर सिंध तक तथा कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हुए हैं। भारत वर्ष की आध्यात्मिक एवं धार्मिक एकता बनाए रखने में इनका विशेष योगदान रहा है। विश्व के किसी भी साहित्य अथवा संस्कृति में अपनी पत्नी को प्यार करने वाला ऐसा नायक अत्यंत दुर्लभ है, जो कि शिव के चरित्र का प्रकर्ष है।संस्कृति जीवनचर्या के मूल्यों और मानों का नाम है, इस देश में देवालय, तीर्थस्थान, आध्यात्मिक मान्यताएँ, कलात्मक स्थल एवं दर्शनीय वस्तुएँ सर्वत्र मिल जाती हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा देश के चार बड़े तीर्थस्थानों की उसके चारों कोनों में स्थापना होने से भी भारतीय संस्कृति की मूलभूत एकता को बल मिला, यहाँ कथित कुल लोगों की जीवनचर्या के भीतर सात ऐसी पुरियों के नाम मुक्तिदायनी के रूप में आते हैं जो देश के बहुत बड़े भूभाग में छिटकी हुई हैं- ‘‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्ष दायिका।।’’इसी तरह एकता मंत्र की चर्चा भी लोगों की दिनचर्या के भीतर हुई है जिसमें व्यक्ति अपने कल्याण के लिए देश की समस्त प्रसिद्ध नदियों और समुद्र का स्मरण करता है-‘‘गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना गोदावरी नर्मदाकावेरी सरयू महेंद्रतनया चर्मणवती वेदिकाक्षिप्रा वेत्रवती महासुर नदी ख्याता जाया गण्डकीपूर्णा: पूर्णजलै: समुद्रसहिता: कुर्वन्तु में मंगलम।।’’इसी तरह देश भर के पर्वतों का भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया गया है जो देशवासियों के पारस्परिक रागात्मक बोध का परिचायक है-‘‘महेन्द्रो मलय: सह्यो देवतात्मा हिमालय:ध्येयो रैवतको विंध्यो गिरीश्वारावालिस्तथा।।’’ हमारे यहाँ धार्मिक और साहित्यिक ग्रन्थ भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हैं, उनका प्रतिपाद्य भी एकता, समरसता और सामंजस्य है, उनका प्राचुर्य और वैविध्य तो अपूर्व है ही, उनकी मौलिक एकता और भी रमणीय है। भारतीय साहित्य का विकासक्रम लगभग एक सा ही है। संस्कृत भाषा के साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों का प्रभाव देशव्यापी रहा है और भारतीय संस्कृति को सबसे ज्यादा खुराक वहीं से प्राप्त हुई है, इस देश में राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना में सांस्कृतिक परिस्थितियों एवं अंतर्वृत्तियों में अपेक्षाकृत ज्यादा समानता पाई जाती है, यदि हम पिछली अनेकानेक शताब्दियों पर दृष्टिपात करें तो पाते हैं कि इस देश में अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक आन्दोलन ऐसे हुए हैं जिनका प्रभाव भारतव्यापी था। बौद्ध धर्म के युग में उसकी कई शाखाओं और शैव शाक्त धर्मों के संयोग से नाथ संप्रदाय उठ खड़ा हुआ, जो ईसा के द्वितीय सहदाााब्दी के आरम्भ में उत्तर तिब्बत, दक्षिण में पूर्व घाट के प्रदेशों, पश्चिम में महाराष्ट्र और पूर्व में प्राय: सर्वत्र फैला हुआ था, इनमें नाथ, सिद्ध और शैव सभी थे जो योगी होते हुए भी जीवन के विचार और भावपक्ष की उपेक्षा नहीं करते थे, इनके उतराधिकारी संत सम्प्रदायों और सूफियों के मत का प्रसार भी देश के भिन्न-भिन्न लोगों में हुआ। संत सम्प्रदाय पर वेदांत दर्शन का प्रभाव था और वे निर्गुण भक्ति की साधना तथा प्रचार पर बल देते थे। भक्ति के आविर्भाव के सम्बन्ध में यह दोहा प्रसिद्ध है-‘‘भगति द्राविड उळपजी लाए रामानंद।परगट किया कबीर ने सप्त द्वीप नवखंड।।’’यहाँ सप्त द्वीप नवखंड शब्द भक्ति के भारतव्यापी प्रभाव का ही द्योतक है।भक्तिकाल के प्रायः सभी कवियों ने भारतीय समाज को एकजुट रखने के लिए सामान्य भक्ति मार्ग का सिंह द्वार सबके लिए खोल दिया, इन कवियों में विशेषकर तुलसीदास ने रामकथा का लोकभाषा में प्रणयन करके व्यक्ति, समाज, संस्कृति, राजनीति, धर्म-दर्शन और साहित्य के परस्पर विपरीत धु्रवों के बीच अंतरावलंबन, सह अस्तित्व, सहयोग और सौमनस्य का भाव भर कर बिखर रहे भारतीय समाज को भावनात्मक धरातल पर समन्वित कर दिया। वर्तमान सन्दर्भ में जिसे हम तनाव और संघर्ष का निराकरण कहते हैं तुलसी का समन्वयवाद उसका साकार विग्रह है, इसके द्वारा वे भारतीय संस्कृति तथा सामाजिक व्यवस्था में हिंसा, आतंक और संघर्ष के बजाय अनुकूलन, लचीलापन और एकीकरण बनाये रखने में कामयाब होते हैं, उनकी समन्वय भावना भारतीय संस्कृति का तत्त्व बन जाती हैं गोस्वामी तुलसीदास ने रामलीला मंडलियों का बाकायदा गठन एवं मंचन करवाकर भारतीय सांस्कृतिक एकता के लिए मंच उपलब्ध करवाया। भारतीय संस्कृति में भावात्मक एकता का गुण पैदा करने में मुल्ला दाउद, जायसी, रहीम, रसखान जैसे मुस्लिम कवियों की विशेष भूमिका रही, जिसके चलते भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे जन-कवि को लिखना पड़ा कि-‘इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिक हिन्दू वारिये।’ भक्त कवियों द्वारा जब राम कृष्ण की लीलाओं का गान समूचे देश में बड़े वेग से व्याप्त हो गया तब राम और कृष्ण की अनेक मधुर पद्धतियों का देश भर में प्रसार हुआ और समस्त भारतवर्ष सगुण ईश्वर के लीलागान से गुंजरित हो उठा, इसके बाद ईरानी संस्कृति के प्रभाव के कारण सांस्कृतिक शिथिलता का दौर चला, आगे चलकर पाश्चात्य संस्कृति एवं भारतीय संस्कृति के बीच के द्वन्द्व ने देशव्यापी सांस्कृतिक नवजागरण को उपस्थित किया, नतीजतन भारतीय संस्कृति अपनी एकरूपता और समन्वय में पुन: उठ खड़ी हुई। सन् १८५७ की क्रांति के उपरांत भारतीय समाज में जो पुनर्जागरण उपस्थित हुआ उसके कारण भारतीय समाज में असाधारण बौद्धिक क्षमता से सम्पन्न अनेक समाज-सुधारक आते हैं जो भारतीय संस्कृति का परिष्कार करते हैं। साथ ही भारतीय समाज-व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने के बजाय उसमें रासायनिक परिवर्तन उपस्थित करते हुए उसे स्वस्थ एवं संगठित बनाने का उपक्रम करते हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद तथा महर्षि अरविन्द भारतीय संस्कृति का नया पाठ तैयार करते हुए उसे विश्वव्यापी प्रतिष्ठा और वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं। महर्षि अरविन्द ‘भारतीय संस्कृति के आधार’ जैसा ग्रन्थ लिखकर उसकी सैद्धांतिकी निर्मित करते हैं।लोकमान्य तिलक सार्वजनिक गणेशोत्सव की प्रतिष्ठा द्वारा भारतीय संस्कृति में निहित सांगठनिक क्षमता को उजागर करते हैं, इससे स्वाधीनता संग्राम के कठिन संघर्ष के दिनों में भारतीयों के समक्ष ‘संघे शक्ति: कलियुगे’ को चरितार्थ करने का सुअवसर उपलब्ध हुआ, इसी क्रम में गाँधी जी और डॉ. अम्बेडकर भारतीय संस्कृति एवं समाज में व्याप्त जड़ता दूर करते हुए नूतन लक्ष्य के प्रति सन्नद्ध करते हैं। हिंदी के विश्वस्तरीय आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल यदि कर्म सौन्दर्य की प्रतिष्ठा करते हुए उसे भारतीय संस्कृति के केन्द्र में लाते हैं तो महाकवि जयशंकर प्रसाद ‘कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन आनंद’ कहकर कर्म-फल का पुनर्विश्लेषण करते हैं।भारतीय संस्कृति नाना जातियों, नाना धर्मों, नाना विश्वासों तथा अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियों का संश्लेषण है, यह जिन अभिलक्षणों के आधार पर वैविध्य में एकत्व बनाए हुए है उसमें मानवजाति की एकता में विश्वास सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति मानवजाति की एकता को लेकर संकल्पित है जो किसी अन्य संस्कृति में शायद ही मिले, हमारी संस्कृति काल, महाकाल तथा इतिहास विधाता की अवधारणा में विश्वास रखती है, साथ ही यह प्रतिपादित करती है कि काल जितना न्यायी है उतना ही क्रुर भी, वह अपने साथ उन्हीं को ले चलना पसंद करता है जिनमें उसके कंधे पर सवार होने की शक्ति होती है। भारतीय संस्कृति ‘चयन’ और ‘वरण’ के प्रति अतिशय सतर्क है, वह हजारों वर्षों की अपनी जय यात्रा में अनेक अनुपयोगी चीजों का त्याग कर चुकी है, उसमें बहुत सारे बाहरी तत्त्वों ने अपना स्थान सुरक्षित भी कर लिया है। भाषा, भवन, भेष और भोजन चारों ही आधारों पर इसकी पड़ताल की जा सकती है।भारतीय संस्कृति ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।’जैसे आदर्श का पुरस्करण करती है। वह ‘नहिं मानुषात् परा धर्म:’ अर्थात् मनुष्यता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है, के उद्घोष द्वारा अपनी व्यापक दृष्टि तथा उच्चतर मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, वह मानवीय धर्म की प्रतिष्ठा करते हुए सर्वधर्म समभाव ओर सर्वजन हिताय की संकल्पना प्रस्तुत करती है, वह मानव के देवत्व और आत्मोन्नयन में विश्वास व्यक्त करती है। मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से जो सवाल ‘राम तुम मानव हो देवता नहीं हो क्या?’ के रूप में करते हैं उसका उत्तर वे स्वयं राम से दिलवाते हैं- ‘‘सन्देश यहाष्ट नहीं मैं स्वर्ग का लाया।इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’’इस देश की संस्कृति आत्मिक उत्कर्ष में विश्वास रखते हुए अतिशय भौतिकवादिता तथा स्वार्थन्धता का निषेध करती है, आज जब विश्व बाजारवाद की आयोजक-नियोजक शक्तियाँ उपभोक्तावाद, स्वार्थपरकता और लाभवृत्ति को विश्व स्तर पर प्रसारित कर रही हैं तब ‘‘कामायनी’’ में अग्रांकित पंक्तियाँ अतिशत प्रसांगिक एवं दिशादर्शक बन पड़ी हैं- ‘‘अपने भर सब कुछ केसे व्यक्ति विकास करेगा, यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।औरों को हंसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।।भारतीय संस्कृति अपनी विराट दृष्टि और सर्वसमावेशकता के साथ-साथ प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के मध्य संतुलन साधती है, वह निर्मल भाव से गृहस्थ जीवन जीने के आदर्श की प्रतिष्ठा करती है, इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास का निम्न दोहा विशेष रूप से चिंतनीय बन पड़ा है- घर राखे घर जात है, घर छोड़े घर जाय। तुलसी घर-वन बीच ही, राम प्रेमपुर छाय।।...

पश्चिम भारत सनाढय गौड़ सभा मुंबई की स्थापना

हमारी संस्था सन् १९७८ में श्रीबंशीधर पंडया, मधुरा प्रसाद, रामेश्वर दयाल, वृजेन्द्र जी, रामप्रसाद, श्री विश्वनाथ (पंचम पुरीवाले) श्री डा वल्लभदास तिवारी, श्री हरीशचंद्र मैन गुरियाजी एवम अन्य बुद्धजीनाओं सदस्यों के अथक प्रयास से शुरू हुई। संस्था ने अपना खुद का भवन सन् १९९५ में श्री झाऊलाल जी, श्री धर्मजी, श्री अनोखे लाल, श्री जगदीश प्रसादजी अध्यक्ष श्री सुरेद्रजी, श्री त्रिलोक चंदजी, श्री रामेश्वर दयालजी एव अन्य पदाधिकारिओं एवं दान दाताओं की मदत से घरटन पाडा, दहिसर (पूर्व) में लिया।हमारी संस्था का मुख्य उद्देश्य सम्पूर्ण भारत में जो भी सनाढय गौड़ ब्राह्मणवर्ग है। उसको जोड़कर एक दूसरे से परिचित कराना है। संस्था गरीब बच्चों, गरीब महिलाओं को अधिक मदत एवम् प्रतिवर्ष युवक-युवतिओं का वर-वधु सम्मेलन का आयोजन करती है, हमारी संस्था मेघावी छात्रों को छात्रवृत्ति एवम् पुरस्कार देकर उन्हें उत्साहित करती है। हमारी संस्था पिछले ८१ वर्षों से निरंतर वार्षिक सम्मेलन, परशुराम जयंति, होली उत्सव एवम् हरियाली तीज का आयोजन करती आ रही है हमारी संस्था मुंबई में पश्चिम भारतीय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी एवम् पुरानी संस्था है।हमारी संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी श्री भवानी शंकर एवम् अन्य ट्रस्टी श्री कपिल जी, श्री त्रिलोक चंदजी, श्री रामेश्वर दयालजी, श्री अशोक रावत, श्रीमती बीना अशोक जी, श्री सत्येन्द्रजी, श्री राजेश, श्री बिजेश, श्री ब्रह्मानंदा, श्री राजेन्द्रप्रसाद जी के मार्गदर्शन में करती है, हमारी संस्था उपरोक्त ट्रस्टीओं एवं कार्यकारिणी सदस्यों, दानदाताओं, नये एवम् पुराने सदस्यों द्वारा की गयी आर्थिक मदत से मुंबई में अपना एक नया भवन बनाने का प्रयास कर रही है।वर्तमान अध्यक्ष श्री प्रकाश, मंत्री श्री महावीरजी एवम् ट्रस्टी श्री रामेश्वर दयाल जी, युवा कार्यकत्र्ता श्री मनीष अशोकजी एवम् सभी कार्यकारिणी पदाधिकारी एवम् सदस्यों के प्रयास से निरंतर नई ऊचाईयों को छुने की कोशिश कर रही है।नेतृत्व में हमारे पदाधिकारी श्रीमती विजयलक्ष्मी जी, श्री मनीषजी, श्रीमती कुसुम जी एवम् सभी पदाधिकारी एवम् सदस्यों की मदत से कार्यरत हैं। भाषा संरक्षण और लिपि भाषा वही श्रेष्ठ है जिसको जन-समूह सहज में समझ ले ग्रुप के माध्यम से जगा रहे हिंदी की अलख हिंदी को बढ़ावा देने के लिए डेढ़ साल पहले हरियाणा के शिक्षकों का संगठन बनाया गया था अंबाला कैंट : व्हाट्सएप ग्रुप का इस्तेमाल आज के समय केवल मनोरंजन व एक दूसरे तक संदेशों का आदान-प्रदान के लिए किया जाता है लेकिन व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी को बचाने को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं, ऐसा ही एक व्हाट्सएप ग्रुप बाकायदा अंबाला कैंट निवासी व राजकीय सीनीयर सेकेंडरी स्कूल की मुख्य शाखा में मौजूदा हिंदी शिक्षक डा. सोनिका द्वारा तैयार किया गया है, जिसका मकसद केवल बच्चों में हिंदी के प्रति रूझान बढ़ाने और उन तक हिंदी को सरल अंदाज में पहुंचाने को लेकर किया गया है, इस ग्रुप के जरिए ‘हिंदी’ द्वारा बाकायदा पूरे हरियाणा के सरकारी स्कूलों में मौजूदा सैकड़ों शिक्षकों की टीम तैयार की गई है जो केवल ग्रुप में अंग्रेजी भाषा के इस दौर में भी ‘हिंदी’ को जीवित रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं।हिंदी शिक्षण विधियां बना शिक्षकों का जरिया: मोबाइल पर व्हाट्सएप ग्रुप ‘हिंदी शिक्षण विधियां’ नामक संगठन जो कि डेढ़ साल से हिंदी भाषा को लेकर काम कर रहा है। ग्रुप में शिक्षक प्रतियोगिताओं के माध्यम से छात्रों के अंदर ‘हिंदी’ की अलख जगाने का प्रयास कर रहे हैं, सभी शिक्षक हिंदी को लेकर अलग-अलग सुझाव साझा करते हैं और ज्यादातर सुझावों को प्रतियोगिताओं के माध्यम से स्कूलों में किया जा रहा है। ‘हिंदी’ शिक्षक डा. सोनिका का कहना है कि ‘हिंदी’ हमारी मातृभाषा है और हमें उसका सम्मान करना चाहिये, लेकिन आज आर्थिक और तकनीकी विकास के साथ-साथ ‘हिंदी’ भाषा अपने महत्व को खोती चली जा रही है।देखने में आता है कि स्कूली शिक्षा से ही छात्रों में अंग्रेजी सीखने की ललक रहती है, हर कोई सफलता पाने के लिये अंग्रेजी भाषा को सीखना और बोलना चाहता है, इसलिए हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सभी शिक्षक एकजुट होकर काम कर रहे हैं। संगठन के अंदर सुरेश राणा, अशोक वशिष्ट व अन्य का सहयोग रहता है। समर वेकेशन व कवि सम्मेलन का भी ले रहे सहाराडा. सोनिका का कहना है कि ‘हिंदी’ को बढ़ावा देने के लिए वह बाकायदा गर्मी की छुट्टियों के अंदर भी हिंदी की कक्षाएं आयोजित करती हैं, जिसका मकसद केवल छात्रों का मनोरंजन करवाना है और विभिन्न प्रतियोगिता के जरिए उन्हें ‘हिंदी’ भाषा का महत्व समझाना है जबकि डेढ़ साल के बच्चे भी कहीं बाहर घूमने की बजाय स्कूल में आकर रूझान दिखाते हैं, इसके अलावा पहली बार स्कूल में ‘हिंदी’ के कवि सम्मेलन के जरिए भी हिंदी को बढ़ावा दिया जा रहा है, पहले भी कवि सम्मेलन करवा चुके है और भविष्य में करवा रहे है, जबकि हरियाणा में पहली बार डा. सोनिका को मोबाइल प्रोजेक्ट से हिंदी को पढ़ाने का भी खिताब मिल चुका है।काउंसिलिंग के जरिए बच्चों को करती हैं जागरूक:सेवा समिति स्कूल में हिंदी की शिक्षक कुसुम बंसल भी हमेशा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत रहती हैं स्कूल के अंदर छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ काउंसिलिंग के जरिए भी हिंदी के प्रति जागरूक करती हैं, उनका कहना है कि ‘हिंदी’ को बढ़ावा देने का मुख्य उद्देश्य है दूसरे देशों में भी ‘हिंदी’ भाषा बोलते समय हमें शर्मिंदगी महसूस नहीं होनी चाहिए बल्कि ‘हिंदी’ बोलते समय हमें गर्व होना चाहिये।

राष्ट्रीय एकता के लिए नागरी लिपि की भूमिका

– डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष (तमिलनाडु) मैं महात्मा गांधी जी के इस वाक्य से ही यह आलेख प्रारंभ कर रही हूँ कि ‘‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है और नागरी लिपि के बिना राष्ट्रीय एकता अधूरी है।’’गांधीजी बहुत बड़े विचारक थे, वे हमेशा राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि के बारे में ही बातें करते रहे, उन्होंने बार-बार राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में लिपि के प्रश्न को उठाया और कहा- ‘‘मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सभी भारतीय भाषाओं की लिपि एक ही होनी चाहिए और ऐसी लिपि केवल देवनागरी लिपि ही हो सकती है।’’ आचार्य विनोबा भावे ने भी भारतीय भाषाओं के लिए जोड़लिपि के रूप में नागरी लिपि को अपनाने की वकालत की, वे चाहते थे कि सभी भारतीय भाषाएँ अपनी-अपनी लिपियों के साथ-साथ एक अतिरिक्त लिपि के रूप में नागरी लिपि का भी प्रयोग करें, इससे भारत की सभी भाषाएँ एक-दूसरे के निकट आएँगी और इससे राष्ट्रीय एकता और अधिक मजबूत बन जाएगी।हम सभी जानते हैं कि बोली एवं भाषा समाज की रीढ़ होती है और ये हमारी धरोहर है, इस संबंध में स्वर्गीय राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था- ‘‘बोली या भाषा मात्र शब्द नहीं है, यह संस्कृति का पर्याय है।’’ बोली केवल बोली जाती है और भाषा लिखी जाती है, अत: बोली को भाषा के रूप में विकसित करने का श्रेय केवल सक्षम लिपि को ही है, इसके लिए हमारे विद्वानों ने हिंदी के लिए देवनागरी लिपि को ही स्वीकार किया है, आज हम सभी यह जानते हैं कि संपूर्ण विश्व में हिंदी की पढ़ाई देवनागरी लिपि के माध्यम से ही हो रही है। ‘हिंदी’ के अतिरिक्त भारत में संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी, बोडो, संथाली, सिंधी और उत्तर भारत की ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियाँ भी देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है, आज भारत की प्रमुख लिपि देवनागरी लिपि ही है। भारतीय एकता के लिए हिंदी भाषा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, उसी प्रकार संपर्क लिपि के रूप में देवनागरी लिपि की उपयोगिता भी महत्त्वपूर्ण है, एक व्यक्ति को कई भाषाएँ सीखने में लिपियों की कठिनाई एक बहुत बड़ी समस्या है, अगर देवनागरी के माध्यम से तमिल, मलयालम, तेलगु या कन्नड़ भाषा को सीखने की सुविधा, हिंदी भाषा को दी जाए, तो व्यक्ति आसानी से उन भाषाओं को सीख सकता है, यदि कोई उत्तर भारत का व्यक्ति दक्षिण भारत की भाषा सीखना चाहता है तो पहले उसे उस भाषा की लिपि सीखनी पड़ती है, जिसमें उसका बहुत समय लग जाता है और बहुत कठिनाइयाँ भी होती है, परंतु यदि वही सामग्री उसे देवनागरी लिपि में मिल जाए तो उसे भाषा सीखने में उतनी कठिनाई नहीं होगी, सामान्य लिपि के होने पर एक व्यक्ति शीघ्र ही अनेक भाषाएँ सीख सकता है, यह कार्य अवश्य ही नागरी लिपि द्वारा ही संभव है, ऐसा मेरा विचार है। नागरी लिपि को अपनाने में कुछ भाषा क्षेत्रों में यह गलतफहमी है कि नागरी लिपि हिंदी की लिपि है और नागरी के माध्यम से उन पर हिंदी भाषा लादी जा रही है, परंतु यह गलत है।नागरी केवल हिंदी की ही नहीं, अपितु अनेक भाषाओं की लिपि है। भारत की अनेक भाषाओं के बीच में देवनागरी लिपि एक अंतिम जोड़लिपि के रूप में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में केवल देवनागरी लिपि ही महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है, इसके लिए मेरे विचार में ‘नागरी लिपि परिषद्’ विशेष कार्य कर रही है और विविध भाषा-क्षेत्रों में नागरी की उपयोगिता को प्रकाश में लाकर उसके विस्तृत प्रयोग के लिए उचित वातावरण पैदा करने का प्रयत्न कर रही है।कम्प्यूटर और मोबाइल पर अब और अधिक सुगमता से सोशल मीडिया के रूप में नागरी लिपि का प्रचलन दिनों-दिन बढ़ रहा है, अब नागरी लिपि संपर्क लिपि के रूप में पूरे देश में लोकप्रिय होती जा रही है।नागरी लिपि सरल है और वैज्ञानिक भी, इसलिए आसानी से वह सारे देश के लोगों को जोड़ सकती है, देवनागरी में सरलता का गुण है, अत: मेरे विचार से यदि दक्षिण भारत की भाषाएँ भी इसे अपना लें, तो शीघ्र ही राष्ट्र में एकता स्थापित कर सकते हैं। नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए विनोबा जी ने अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया, अब इस लक्ष्य को पूरा करने का कार्य ‘नागरी संगम’ पत्रिका और इससे जुड़े हुए अनेक कार्यकर्ता प्रधान संपादक डॉ. हरिसिंह पाल, बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ आदि अनेक विद्वतजन जुड़े हुए हैं, जिनका कार्य प्रशंसनीय है। आशा करती हूँ कि शीघ्र ही राष्ट्रीय एकता के लिए जोड़लिपि के रूप में नागरी लिपि की भूमिका सार्थक सिद्ध होगी।‘जय भारती, जय नागरी! हिंदी बाल एवं किशोर साहित्य: सम्भावनाएँ एवं चुनौतियाँ बाल-मन जिज्ञासाओं का समुद्र होता है। बच्चों में कल्पनाशीलता एवं अनुकरणशीलता बहुत अधिक होती है, ये गुण ही उनके चारित्रिक विकास एवं ज्ञान-वृद्धि का आधार है, अत: यह आवश्यक हो जाता है कि उनको शांत करने, नवीन जिज्ञासाएँ जगाने एवं कल्पनाशीलता को तीव्र करने के साधन उपलब्ध कराए जाएँ, यह दायित्व जागरूक अभिभावकों पर तो है ही, साथ ही एक साहित्यकार का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह इस कार्य में अभिभावकों की मदद करे, इस कार्य में प्रकाशक का भी अहम् रोल हो जाता है, क्योंकि बाल-साहित्य की सफलता अंत में उसकी प्रस्तुति पर ही निर्भर करती है, अत: इस उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक निभाने में इन तीनों का सामंजस्य आवश्यक है, यह विदित है कि बालक ही हमारे भावी समाज का आधार हैं, भावी समाज, देश व दुनिया का दायित्व उन्हीं के कंधों पर है, वे योग्य नागरिक बनकर इस दायित्व का निर्वहन कर सकेंगे, योग्य नागरिक वे तब ही बन सकते हैं जब उनके सामने पर्याप्त साधन होंगे, उनकी जिज्ञासाओं को शांत करने, कल्पना को तीव्र करने, उनके उत्साह को सही दिशा दिखाने के माध्यम! अपने भविष्य के आदर्श उनके सामने होंगे। बाल-साहित्य इय उद्देश्य की पूर्ति का एक अहम् एवं सशक्त माध्यम है। बाल-मन को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य बाल एवं किशोर साहित्य की संज्ञा में आता है, ऐसा साहित्य बालकों की जिज्ञासाओं को शांत करने तथा कल्पनाशीलता को तीव्र करने का माध्यम होता है, यह मनोरंजन के साथ-ही-साथ बालकों को शिक्षा भी प्रदान करता है। बाल-साहित्य लिखने के लिए लेखक को बाल-मन में डुबकी लगानी होती है। बाल साहित्यकार सुरेन्द्र विक्रम के अनुसार ‘जो साहित्य बच्चों के मन और मनोभावों को परखकर उनकी भाषा में लिखा गया हो, उसे बाल-साहित्य की संज्ञा दी जा सकती है।बाल-साहित्य की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। दादा-दादी तथा नाना-नानी की कहानियों के रूप में इसकी मौखिक परंपरा रही है, जिसे आगे चलकर कुछ सुधी लेखकों ने संकलित करना आरंभ किया। भारत में लिखित बाल- साहित्य की परम्परा का आरंभ संस्कृत-काल से ही हो गया था। संस्कृत में ‘पंचतंत्र’ जैसा प्रसिद्ध बाल-कहानी-संग्रह इसका प्रमाण है। हिंदी में बाल-साहित्य का प्रारंभ अनुदित कहानियों से हुआ। राजा भोज का सपना, बच्चों का इनाम, लड़कों की कहानी, जैसी रचनाएं हिंद गद्य के आरंभिग युग में प्राप्त होती हैं। भारतेन्दु युग में ही मौलिक कहानियां भी लिखी जाने लगीं, आगे चलकर प्रेमचंद ने बाल-मन को आधार बनाकर कुछ कहानियां लिखीं, इन कहानियों में पशु-पक्षियों अथवा परियों के माध्यम से बच्चों को शिक्षा प्रदान करने का प्रयास रहा है, जिनसे बच्चों में साहस, बलिदान, त्याग, सहयोग और परिश्रम जैसे गुणों का विकास हो सके, परंतु बाल-साहित्य का उद्देश्य सिर्फ बालकों का मनोरंजन ही नहीं, अपितु वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराना भी है। बाल-साहित्य के माध्यम से ही हम उनको समाज एवं देश का भावी नागरिक बनने का सपना दिखा सकते हैं। बाल-साहित्यकार की भूमिका उस कुम्हार के समान है, जो कच्ची मिट्टी को चॉक के माध्यम से कोई भी आकार दे सकता है, वैसे ही यह बाल-साहित्यकार पर निर्भर करता है कि वह बालकों का भविष्य किस रूप में तय करता है, वह उसके माध्यम से संस्कार, समर्पण, सद्भावना और भारतीय संस्कृति के तत्व बिठा सकता है। बाल-साहित्य के इतिहास में ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ का उल्लेखनीय योगदान है, इसकी स्थापना १९५७ ई. में श्री शंकर पिल्लाई ने की, जिसका उद्देश्य बच्चों को उचित सामग्री, उचित डिजाइनिंग में उपलब्ध करना है। बाल-साहित्य में डिजाईनिंग का विशेष महत्व है, यही वह तत्व है, जो सामग्री को ग्राह्य बनाता है, इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर सन् १९९१ में ‘शंकर आर्ट अकादमी’ की स्थापना की गई, बाल-साहित्य का सचित्र होना अनिवार्य है, इसलिए बाल-साहित्य में चित्रकारों की भूमिका बढ़ जाती है।आधुनिक युग नव संचार का युग है। नव संचार के माध्यमों ने जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया, बाल-साहित्य भी उससे अछूता नहीं है। बच्चे दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रति आकृष्ट हुए, इसलिए बाल-कहानियों, नाटकों, कविताओं इत्यादि के प्रसारण की आवश्यकता बढ़ जाती है, इस पर आधारित फिल्में बनाई जाए तथा उनमें बालकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान में नित-नए अनुसंधानों एवं अविष्कारों, आरों से नये-नये शब्द हमारे समक्ष आते रहते हैं। विज्ञान और तकनीकी विषयों में प्रयुक्त होनेवाले शब्द अपने आशय में अभिधार्थ होते हैं, ऐसे शब्दों के पीछे कोई विचार या संकल्पना निहित होती है, जिससे इन शब्दों की परिभाषाएँ निश्चित कर दी जाती हैं, इनके अर्थ को एक क्षेत्र विशेष तक सीमित कर दिया जाता है तथा इनके अन्य अर्थ नहीं होते, उदाहरण के लिए ‘आयकर’ शब्द का अर्थ आमदनी पर सरकार द्वारा लिया जानेवाला कर, सरकार की अतिरिक्त आमदनी पर वसूला गया कर नहीं है, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के पीछे कोई-न-कोई संकल्पना जुड़ी रहती है, इसी संकल्पना के आधार पर इनकी परिभाषा की जाती है, इन शब्दों की परिभाषा इस रूप में की जा सकती है- ‘ऐसे शब्द जो ज्ञान-विज्ञान या विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में विशिष्ट अर्थों में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें तकनीकी शब्द कहते हैं।पारिभाषिक शब्दावली का संबंध किसी भाषा-भाषी समाज के सांस्कृतिक और वैचारिक विकास से होता है। सामाजिक विकास के साथ ही भाषा में नयी संकल्पनाएँ विकसित होने लगती हैं, परिणामत: इन संकल्पनाओं से संबंधित पारिभाषिक शब्दावली विकसित होने लगती है। हिंदी भाषा ने ज्यादातर पारिभाषिक, शब्दों को संस्कृत भाषा से ग्रहण किया है, किंतु आधुनिक विज्ञान-शब्दावलियाँ अंग्रेजी भाषा से ग्रहण की गई हैं।आज विज्ञान में नये-नये अनुसंधानों से नयी शब्दावलियों के निर्माण की चुनौतियाँ हिंदी भाषा के समक्ष हैं। इन चुनौतियाँ हिंदी भाषा के चिन्तकों, विचारकों, विद्वानों आदि ने हिंदी भाषा में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के निर्माण में सफल प्रयास किया है।किसी भी भाषा की व्यापकता और सम्प्रेषणीयता उसकी शब्द-सम्पदा की समृद्धि से आंकी जाती है, आज के वैज्ञानिक युग में नित गए वैज्ञानिक अनुसंधानों से नये शब्दों के निर्माण की आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावलियों को किसी भाषा में व्यवहृत करने, अनुदित करने और उस भाषा की प्रकृति के अनुसार समायोजित करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हिंदी भाषा के समक्ष आज यही चुनौतियाँ है, इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए हिंदी हृदय की अभिव्यक्ति के साथ मस्तिष्क की जटिलताओं तथा उन जटिलताओं से उद्भूत विज्ञान और तकनीकी सेवा है, इस समय विज्ञान और तकनीकी शब्दों के निर्माण को लेकर जो चुनौतियाँ हैं, जो संभावनाएँ हैं, उन्हीं की चर्चा सर्वप्रथम की जाएगी।प्रथमत: वैज्ञानिक विषयों के शोध पत्रों का हिंदी अनुवाद सर्वाधिक कठिन कार्य है, इसमें से अनेक शब्द शब्दकोश में भी नहीं मिलते और वे नए होते हैं, उन्हें हिंदी में ही लिखकर संतोष करना पड़ता है, दूसरा, आज विज्ञान के ज्ञान में ज्यों-ज्यों वृद्धि होती जा रही है, नई-नई चुनौतियाँ हमारे सामने आती जा रही हैं, आज नई खोजों के कारण कुछ नए विज्ञान का भी लगातार सृजन हो रहा है, उदाहरण के लिए पर्यावरण विज्ञान से संबंधित एक शब्द होलिस्टिक का इन दिनों धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। होटस्पॉट शब्द भी आज पर्यावरण का जाना-पहचाना शब्द बन चुका है, इसी प्रकार स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विज्ञान से संबंधित अंग्रेजी के अनेक नए तकनीकी शब्दों को प्रयोग में लाया जा रहा है। रोबोट विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, नैनोटेक्नोलॉजी, जीनोगिक्स आदि नए-नए शब्द सामने आते जा रहे हैं, जिनके हिंदी पर्यायवाची शब्दों के निर्माण की नितांत आवश्यकता है।तीसरा, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के प्रयोग में उचित शब्दों के चुनाव के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, तकनीकी शब्द जो गणित अथवा रसायन विज्ञान या जीव विज्ञान के लिए प्रयोग किए जाते हैं, भिन्न होती हैं, एक ही शब्द सभी वैज्ञानिक विषयों के लिए उपयुक्त नहीं होता, चौथा, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों के लिप्यंतरण अनुवाद और समायोजन की चुनौती भी हिंदी भाषा के समक्ष है।उपर्युक्त वर्णित चुनौतियों के समाधान के संबंध में समय-समय पर चिन्तकों, वैज्ञानिकों और विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किए हैं। गाँधी जी के विचार हिंदी राष्ट्रभाषा बनें किसी अंग्रेज़ ने किसी हिंदुस्तानी से कहा था कि जानते हो हमारा सूरज क्यों नही डूबता? हम जिस देश में भी क़दम रखते हैं, सबसे पहिले हम उसकी जीभ नोंच लेते हैं, उस देश की लोक-जिव्हा यानी भाषा को ज़ंजीरों में जकड़ लेते हैं।उस अंग्रेज़ मित्र का यह कथन हिंदुस्तान पर सौ-फ़ीसदी घटित हुआ। भाषा के विष- दंश से हम आज भी पीड़ित हैं, बापू ने लोक-मानस की इस गुत्थी को बड़ी गहराई से समझा-सुलझाया था।पं. गिरिधर शर्मा का सन् १९१५ का प्रस्ताव कि ‘हिंदी को हिंदुस्तान के कोने-कोने में पहुँचा दो तो देश आजाद हो जायेगा’ उनके मन: प्राण पर छा गया। देश की अंतरात्मा को अंग्रेज़ी में पुकारा या जगाया जाए,यह तो गांधी जी के लिए कल्पनातीत था, वे भली-भाँति जानते थे कि देश की महत्ता और गौरव, देश के हिमगिरि और गंगा को लोक-भाषाओं में ही जगाया जा सकता है अन्यथा नहीं, अत: उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार को अपने जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बना लिया। ठीक सौ साल बाद: गांधी जी का संदेश(महात्मा गांधी का कथन-१९१७ गुजरात-शिक्षा-परिषद्) राष्ट्रभाषा की चार शर्तें:अंग्रेज़ी भाषा राष्ट्र-भाषा नहीं हो सकती ;क्योंकि राष्ट्र-भाषा होने के लिए चार बातों की आवश्यकता है जो अंग्रेज़ी में नहीं है :१. अफ़सरों के लिए उसका सीखना सहज हो,२. लोगों के धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक व्यवहार की वह भाषा हो,३. उसे बहुत लोग बोलते हों,४. वह कुछ दिनों के लिए राष्ट्र-भाषा न बनाई जाए,ऐसी भाषा केवल हिंदी ही है। प्रस्तुति : निर्मलकुमार पाटोदी, इंदौर

जमदग्नि ऋषि

आश्रम : हरियाणा में कैथल से उत्तरपूर्व की ओर २८ किलोमीटर की दूरी पर जाजनापुर गाँव स्थित है, यहां महर्षि जमदग्नि का आश्रम था, अब यहां एक सरोवर अवशेष रूप में हैं, यहां प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की दसवीं को मेला लगता है। महर्षि जमदग्नि की परम्परा में बाबा साधु राम ने जहां तपस्या की है और अपने शरीर का त्याग किया है, उस स्थान को बाबा साधु राम की समाधि के रूप में पूजा जाता है, इस सरोवर की आज भी विशेष बात यह मानी जाती है कि इसमें पानी भरने के बाद फूंकार-हंकार की आवाज आती है। पूर्ण लबालब भरा सरोवर भी पन्द्रह दिनों में सुख जाता है। सांपों की इस जगह अधिकता माना जाती है, लेकिन आज तक कोई नुकसान नहीं हुआ।जनश्रुति के अनुसार महर्षि जमदग्नि ऋचीक के पुत्र और भगवान परशुराम के पिता थे, इनके आश्रम में इच्छित फलों को प्रदान करनी वाली गाय थी जिसे कार्तवीर्य छीनकर अपनी राजधानी माहिष्मति ले गया, परशुराम को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कार्तवीर्य को मार दिया और कामधेनु को वापिस आश्रम में ले आए और एक दिन अवसर पाकर कार्तवीर्य के पुत्रों को भी मार डाला और समस्त पृथ्वी पर घूम-घूम कर इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया तब उन्होंने अपने पिता के मस्तक को धड़ से जोड़ा और उनका अन्त्येष्टि संस्कार माहूर, जिला- नांदेड महाराष्ट्र में सम्पन्न किया, यहां माता रेणुका का प्राचीन मंदिर स्थापित है और प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। कुरूक्षेत्र भूमि में पांच कुण्ड बनाकर पितरों का तर्पण किया, ये पांचों सरोवर समन्त पंचक-तीर्थ के नाम से विख्यात हुए, जिसे ब्रह्मा जी उत्तर वेदी कहते हैं वह यही समन्त पंचम तीर्थ है। वामन पुराण में लिखा है कि समन्त पंचक नाम धर्मस्थल चारों ओर पांच-पांच योजन तक फैला हुआ है, सम्भवतः परशुराम द्वारा स्थापित पांचकुण्डों में से एक कुण्ड जाजनपुर का यही स्थल है।अरूणाचल प्रदेश में लोहित नदी के तट पर ही परशुराम कुण्ड स्थित है। पौराणिक मान्यता अनुसार परशुराम अपनी माता रेणुका की हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए यहां आए थे, इस कुण्ड में स्नान के बाद वे मां की हत्या के पाप से मुक्त हुए थे, इस संदर्भ में पौराणिक आख्यान है कि किसी कारण वश परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि अपनी धर्मपत्नी रेणुका पर कुपित हो गए, उन्होंने तत्काल अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश दे दिया, लेकिन उनके आदेश का पालन करने के लिए कोई पुत्र तैयार नहीं हुआ। परशुराम पितृभक्त थे, जब पिता ने उनसे कहा तो उन्होंने अपने फरसे से मां का सर धड़ से अलग कर दिया, इस आज्ञाकारिता से प्रसन्न पिता ने जब वर मांगने को कहा तो परशुराम ने माता को जीवित करने का निवेदन किया, इस पर जमदग्नि ऋषि ने अपने तपोबल से रेणुका को पुन: जीवित कर दिया।रेणुका तो जीवित हो गईं लेकिन परशुराम मां की हत्या के प्रयास के कारण आत्मग्लानि से भर उठे, यद्यपि मां जीवित हो उठी थी लेकिन मां पर परशु प्रहार करने के अपराधबोध से वे इतने ग्रस्त हो गए कि उन्होंने पिता से अपने पाप के प्रायश्चित का उपाय भी पूछा। पौराणिक प्रसंगों के अनुसार ऋषि जमदग्नि ने तब अपने पुत्र परशुराम को जिन-जिन स्थानों पर जाकर पापविमोचन तप करने का निर्देश दिया, उन स्थानों में परशुराम कुण्ड सर्वप्रमुख है। भगवान परशुराम ने भारतीय संस्कृति को दिलाई नई पहचान भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम की जयंती अक्षय तृतीया के दिन मनाई जाती है, ये वही परशुराम हैं जिन्होंने क्रोध में आकर भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया था, इसके अलावा भी कई ऐसी घटनाएं हैं जिनमें परशुराम के क्रोध की कहानियां मिलती हैं, कहा जाता है कि इनके क्रोध से सभी देवी-देवता भयभीत रहा करते थे, यहां जानें आखिर विष्णु और शिव के अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम आखिर हैं कौन? मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म ६ उच्च ग्रहों के योग में हुआ, इसलिए वह तेजस्वी, ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने, माता-पिता भक्त परशुराम ने जहां पिता की आज्ञा से माता का गला काट दिया, वहीं पिता से माता को जीवित करने का वरदान भी मांग लिया, इस तरह हठी, क्रोधी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले परशुराम का लक्ष्य मानव मात्र का हित था।परशुराम ही थे, जिनके इशारों पर नदियों की दिशा बदल जाया करती, अपने बल से आर्यों के शत्रुओं का नाश किया, हिमालय के उत्तरी भू-भाग, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, कश्यप भूमि और अरब में जाकर शत्रुओं का संहार किया, उसी फारस जिसे पशिया भी कहा जाता था, का नाम इनके फरसे से किया गया।उन्होंने भारतीय संस्कृति को आर्यन यानी ईरान के कश्यप भूमि क्षेत्र और आर्यक यानी इराक में नई पहचान दिलाई। गौरतलब है कि पशियन भाषी पाशिया परशुराम के अनुयायी और अग्निपूजक कहलाते हैं और परशुराम से इनका संबंध जोड़ा जाता है, अब तक भगवान परशुराम पर जितने भी साहित्य प्रकाशित हुए हैं, उनसे पता चलता है कि मुंबई से कन्याकुमारी तक के क्षेत्रों को ८ कोणों में बांटकर परशुराम ने प्रांत बनाया था और इसकी रक्षा की प्रतिज्ञा भी ली थी इस प्रतिज्ञा को तब की अन्यायी राजतंत्र के विरुद्ध बड़ा जनसंघर्ष कहा गया, उन्होंने राजाओं से त्रस्त ब्राह्मणों, वनवासियों और किसानों अर्थात सभी को मिलाकर एक संगठन खड़ा किया, जिसमें कई राजाओं सहयोग मिला. अयोध्या, मिथिला, काशी, कान्यकुब्ज, कनेर, बिंग के साथ ही पूर्व के प्रांतों में मगध और वैशाली भी महासंघ में शामिल थे जिसका नेतृत्व भगवान परशुराम ने किया।दूसरी ओर हैहयों के साथ आज के सिंध, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, लाहौर, अफगानिस्तान, कंधार, ईरान और ऑक्सियाना के पार तक फैले २१ राज्यों के राजाओं से युद्ध किया, सभी २१ अत्याचारी राजाओं और उनके उत्तराधिकारियों तक का परशुराम ने विनाश कर दिया था, ताकि दोबारा कोई सिर न उठा सके।भगवान परशुराम को लेकर एक आम धारणा है कि वे क्षत्रियों के कुल का नाश करने वाले थे, जो पूरा सत्य नहीं है. पौराणिक कथाओं के अनुसार भी भगवान परशुराम ‘क्षत्रिय’ वर्ण के हंता न होकर मात्र क्षत्रियों के एक कुल हैहय वंश का समूल विनाश करने वाले हैं. दसवीं शताब्दी के बाद लिखे ग्रंथों में हैहय की जगह क्षत्रिय लिखे जाने के प्रमाण भी मिलते हैं। परशुराम ही वह व्यक्तित्व है, जो इतिहास का पहला ऐसा महापुरुष कहलाएगा, जिसने किसी राजा को दंड देने के लिए राजाओं को इकट्ठा करके एक नई राजव्यवस्था बनाई, युद्ध में विजय के बाद राज्य संचालन की सही व्यवस्था न होने से अपराध और हाहाकार की स्थिति भी बनी और घबरा, कर ऋषियों ने तप में लीन दत्तात्रेयजी को उठाकर पूरा वृत्तांत बताया, कपिल ऋषि के साथ जाकर दत्तात्रेय ने परशुराम को समझाया, उनकी बुद्धि जागृत की।ग्रंथ कहते हैं कि कई वर्षों बाद जब परशुराम को समझ आया तो अपने कृत्यों पर पश्चाताप करने लगे, परशुराम को दत्तात्रेय ऋषि, कपिल ऋषि और कश्यप ऋषि तीनों ने बहुत धिक्कारा। ग्लानि में डूबे परशुराम ने संगम तट पर सारे जीते हुए राज्यों को कश्यप ऋषि को दान कर दिया और स्वयं महेंद्र पर्वत चले गए, इस तरह फिर से राजकाज की सुचारु शासन व्यवस्था शुरू की जा सकी।केरल प्रदेश को बसाने वाले भगवान परशुराम ही थे, एक शोध के अनुसार, परशुराम में ब्रह्मा की सृजन शक्ति, विष्णु की पालन शक्ति व शिव की संहार शक्ति विद्यमान थी, इसलिए वह त्रिवंत कहलाए, उनकी तपस्या स्थली आज भी तिरुवनंतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है, जो अब केरल की राजधानी है।केरल, कन्याकुमारी और रामेश्वरम के संस्थापक भगवान परशुराम की केरल में नियमित पूजा होती है, यहां के पंडित संकल्प मंत्र उच्चारण में समूचे क्षेत्र को परशुराम की पावन भूमि कहते हैं।एक शोधार्थी का यह भी दावा है कि ब्रह्मपुत्र, रामगंगा व बाणगंगा नदियों को जन कल्याण के लिए अन्य दिशाओं में प्रवाहित करने का श्रेय भी परशुराम को ही जाता है, शस्त्रशास्त्र का ज्ञान समाज के कल्याणार्थ आदिकाल से ही ऋषियों, मुनियों और ब्राह्मणों द्वारा कराया जाता रहा, लेकिन यह भी सच है, जब भी इसका दुरूपयोग शासक वर्ग द्वारा किया जाता है, तब भगवान परशुराम जैसा ब्राह्मण कुल में जन्मा और अत्याचारियों का विध्वंश कर उन्हें दंडित करने के लिए शस्त्र उठाकर, हिसाब-किताब बराबर करने को तत्पर हुआ।रामायण में जहां भगवान परशुराम को केवल क्रोधी ही नहीं, बल्कि सम्मान भावना से ओतप्रोत कहा गया है, वहीं महाभारत काल में कौरवों की सभा में भगवान कृष्ण का समर्थन करते हुए चित्रित किया गया है। परशुराम के बारे में पुराणों में लिखा है कि महादेव की कृपा व योग के उच्चतम ज्ञान के सहारे वे अजर, अमर हो गए और आज भी महेंद्र पर्वत में किसी गुप्त स्थान पर आश्रम में रहते हैं, कई धर्मग्रंथों में वर्णित नक्षत्रों की गणना से है। हय-परशुराम युद्ध अब से लगभग १६३०० साल के पहले का माना जाता है।वहीं कुछ कथाएं ये भी हैं कि कई हिमालय यात्रियों ने परशुराम से भेंट होने की बात भी कही है। भगवान परशुराम की यही गाथा है, जिसमें अनीति, अत्याचार, छल-प्रपंच का संहार करने की सच्चाई है जो आज भी प्रासंगिक है और युगों-युगों तक रहेगी। महाशिवरात्रि पर्व महाशिवरात्रि हिन्दुओं के सबसे बड़े पर्वों में से एक है, दक्षिण भारतीय पंचांग (अमावस्यान्त पंचांग) के अनुसार माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को यह पर्व मनाया जाता है, वहीं उत्तर भारतीय पंचांग (पूर्णिमान्त पंचांग) के मुताबिक़ फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का आयोजन होता है। पूर्णिमान्त व अमावस्यान्त दोनों ही पंचांगों के अनुसार महाशिवरात्रि एक ही दिन पड़ती है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से पर्व की तारीख़ वही रहती है, इस दिन शिव-भक्त मंदिरों में शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाकर पूजा, व्रत तथा रात्रि-जागरण करते हैं। महाशिवरात्रि व्रत का शास्त्रोक्त नियम : महाशिवरात्रि व्रत कब मनाया जाए, इसके लिए शास्त्रों के अनुसार निम्न नियम तय किए गए हैं –१. चतुर्दशी पहले ही दिन निशीथव्यापिनी हो, तो उसी दिन महाशिवरात्रि मनाते हैं, रात्रि का आठवाँ मुहूर्त निशीथ काल कहलाता है। सरल शब्दों में कहें तो जब चतुर्दशी तिथि शुरू हो और रात का आठवाँ मुहूर्त चतुर्दशी तिथि में ही पड़ रहा हो, तो उसी दिन शिवरात्रि मनानी चाहिए।२. चतुर्दशी दूसरे दिन निशीथकाल के पहले हिस्से को छुए और पहले दिन पूरे निशीथ को व्याप्त करे, तो पहले दिन ही महाशिवरात्रि का आयोजन किया जाता है।३. उपर्युक्त दो स्थितियों को छोड़कर बाक़ी हर स्थिति में व्रत अगले दिन ही किया जाता है। शिवरात्रि व्रत की पूजा-विधि :१. मिट्टी के लोटे में पानी या दूध भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के फूल, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाना चाहिए, अगर आस-पास कोई शिव मंदिर नहीं है, तो घर में ही मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उनका पूजन किया जाना चाहिए।२. शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए, साथ ही महाशिवरात्री के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है।३. शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार शिवरात्रि का पूजन ‘निशीथ काल’ में करना सर्वश्रेष्ठ रहता है, हालाँकि भक्त रात्रि के चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं। ज्योतिष के दृष्टिकोण से शिवरात्रि पर्व : चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ अर्थात स्वयं शिव ही हैं, इसलिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के तौर पर मनाया जाता है, ज्योतिष शास्त्रों में इस तिथि को अत्यंत शुभ बताया गया है, गणित ज्योतिष के आंकलन के हिसाब से महाशिवरात्रि के समय सूर्य उत्तरायण हो चुके होते हैं और ऋतु-परिवर्तन भी चल रहा होता है। ज्योतिष के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी कमज़ोर स्थिति में आ जाते हैं, चन्द्रमा को शिव जी ने मस्तक पर धारण किया हुआ है – अतः शिवजी के पूजन से व्यक्ति का चंद्र सबल होता है, जो मन का कारक है, दूसरे शब्दों में कहें तो शिव की आराधना इच्छा-शक्ति को मज़बूत करती है और अन्तःकरण में अदम्य साहस व दृढ़ता का संचार करती है।महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा : शिवरात्रि को लेकर बहुत सारी कथाएँ प्रचलित हैं, विवरण मिलता है कि भगवती पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए घनघोर तपस्या की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसके फलस्वरूप फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था, यही कारण है कि महाशिवरात्रि को अत्यन्त महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है।वहीं गरुड़ पुराण में इस दिन के महत्व को लेकर एक अन्य कथा कही गई है, जिसके अनुसार इस दिन एक निषादराज अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया किन्तु उसे कोई शिकार नहीं मिला, वह थक कर भूख-प्यास से परेशान हो एक तालाब के किनारे गया, जहाँ बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था, अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने कुछ बिल्व-पत्र तोड़े, जो शिवलिंग पर भी गिर गए। अपने पैरों को साफ़ करने के लिए उसने उन पर तालाब का जल छिड़का, जिसकी कुछ बून्दें शिवलिंग पर भी जा गिरी, ऐसा करते समय उसका एक तीर नीचे गिर गया, जिसे उठाने के लिए वह शिवलिंग के सामने नीचे को झुका, इस तरह शिवरात्रि के दिन शिव-पूजन की पूरी प्रक्रिया उसने अनजाने में ही पूरी कर ली।मृत्यु के बाद जब यमदूत उसे लेने आए, तो शिव के गणों ने उसकी रक्षा की और उन्हें भगा दिया, जब अज्ञानतावश महाशिवरात्रि के दिन भगवान शंकर की पूजा का इतना अद्भुत फल है, तो समझ-बूझ कर देवाधिदेव महादेव का पूजन कितना अधिक फलदायी होगा। ६.५ करोड़ लोगों के पास घर नहीं हमारी झुग्गियों में आबादी इंग्लैंड से भी ज्यादा देश में २०२२ तक सभी को घर देने के महत्वाकांक्षी सपने के बीच आज भी ६.५ करोड़ भारतीय झुग्गियों में रहते हैं, यह संख्या इंग्लैंड (५.८ करोड़) और इटली (६.०६ करोड़) की कुल आबादी से ज्यादा है। महाराष्ट्र में १.१८ करोड़ आबादी झुग्गी-बस्ती में रहती है। दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश है। दोनों राज्यों में भारत के एक तिहाई झुग्गियों में रहने वाले लोग हैं। २०११ की जनगणना के अनुसार, देश में ६.५५ करोड़ लोग झुग्गी-बस्ती में रहने को मजबूर हैं। आवाज और शहरी मामलों के राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गत दिनों राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी।शहरी और आवास मंत्रालय के मुताबिक पिछले चार साल के दौरान मलिन बस्तियों में ७२, ८०,८५१ घर थे।३८,६७,१९१ घरों को बनाने की मंजूरी दी गई। १४, ७५, ८७९ को पुरा तक दिलाया गया, जबकि ३,१४,७६५ घर अनाधिकृत थे।५९ लाख लोग घरों में आबादमहाराष्ट्र में झुग्गियों में रहने वाले १.१८ करोड़ लोग २५ लाख घरों में आबाद हैं, जबकि आंध्र प्रदेश की १.२ करोड़ जनसंख्या २४ लाख घरों में, केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश के सभी १२५ शहरों में से १८९ में झुग्गी-बस्तियां हैं।हालांकि झुग्गी-बस्तियों वाले शहरों की सबसे अधिक संख्या इन राज्यों में नहीं है। तमिलनाडु शीर्ष पर है, वहां ७२१ शहरों में से ५०७ में झुग्गी-बस्तियों की बसाहट है, मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा ३६४ शहरों में ३०३ है।जरूरी सुविधाओं का अभावबुनियादी जरूरतों के लिए तरसने वाले इन झुग्गियों में लोगों के रहनसहन का स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, मृत्यु दर और मानसिक तनाव आदि मानकों पर स्थिति चिंताजनक है। पश्चिम भारत सनाढ्य गौड़ सभा का स्नेह सम्मेलन मुंबई: कांदिवली के ठठाई भाटिया हॉल में पश्चिम भारत सनाढय गौड़ सभा द्वारा संस्था का ४१वां वार्षिक स्नेह सम्मेलन एवं युवक-युवती परिचय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें अनेक स्थानों से आये हुए समाज बंधुओं ने हिस्सा लिया, उपस्थित अतिथियों के हाथों दीप प्रज्वलन के साथ उत्सव की शुरूआत की गई।कार्यक्रम के प्रथम चरण में विवाह योग्य युवक-युवतियों का परिचय सम्मेलन रखा गया और द्वितीय चरण में नृत्य, संगीत का मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम किया गया, जिसमें बच्चों द्वारा फिल्मी गानों पर नृत्य एवं सुमधुर ८० के दशक के गानों के सुंदर नगमें प्रस्तुत किये गए। तृतीय चरण में उपस्थित अतिथियों का सम्मान समारोह सम्पन्न हुआ, जिसमें कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इस्कोन के गौरंगदास प्रभुजी विशेष अतिथि उद्योगपति केशव शर्मा, उद्योगपति प्रशांत शर्मा एवं पत्रकार डॉ उरूक्रम शर्मा का पुष्प गुच्छ एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मान किया गया, इसके साथ ही समाज के वरिष्ठ सदस्यों का और मेधावी छात्रों का भी सम्मान किया गया, इस दौरान उद्योगपति ब्रह्मानंद शर्मा को समाजगौरव सम्मान दिया गया। संस्था से जुड़े जिन दंपत्ति ने दाम्पत्य जीवन के ५० वर्ष पूरे किये, उनका सम्मान इस कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा।संस्था के अध्यक्ष प्रकाश शर्मा ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया, संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी भवानी शंकर शर्मा ने बताया कि वे आगे भी संस्था के सभी सदस्यों के सहयोग से पश्चिम भारत सनाढय गौढ़ सभा को और आगे लेकर जाएंगे, संस्था के मंत्री महावीर शर्मा ने बताया कि आज जिस तरह ४१वां वार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ, ऐसे ही आगे भी संस्था अग्रणी रहेगी, इसके बाद संस्था के ट्रस्टी अशोक रावत के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में पूर्व अध्यक्ष राकेश शर्मा, मनीष शर्मा, अशोक शर्मा, कुसुम शर्मा, सुरेखा शर्मा, राजकुमार शर्मा, कल्पना मनीष शर्मा, ममता महावीर शर्मा, रामेश्वर दयाल शर्मा, दुर्गेश कुमार शर्मा आदि का विशेष योगदान रहा। आदिवासी क्षेत्र उधना में स्कूल के लिए नयी बिल्डिंग का उद्घाटन पालघर-महाराष्ट्र: महादेवी परमेश्वरीदास जिंदल चेरिटेबल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी श्रीकिशन जिंदल एवं अन्य ट्रस्टियों के सहयोग एवं वॉक टुगेदर फाउंडेशन के तत्वावधान में आदिवासी बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल हेतु बनायी गई बिल्डिंग का उद्घाटन किशन जिंदल, उनकी पत्नी श्रीमती कृष्णा एवं पुत्र अजय तथा पुत्रवधू ममता जिंदल के कर कमलों से रविवार, ०३ फरवरी २०१९ को जिला पालघर, तालुका तलासरी के अंतर्गत उधवा गांव में सभी आदिवासी परिवारों की उपस्थिति में धूमधाम से किया गया।इस कार्यक्रम में उपस्थित ट्रस्टी कांतीलाल शाह, गौतम गांधी एवं मनीष दोशी ने बताया कि इस स्कूल के निर्माण से आदिवासी बच्चों में खुशी का माहौल व्याप्त है, इस अवसर पर गणमान्य व्यक्तियों में श्री ललित बगड़िया, रामू देवड़ा एवं अमृतलाल शाह भी उपस्थित थे। बता दें कि इस ट्रस्ट के सहयोग से संचालित उधना का स्कूल ११वां स्कूल है, इससे पहले इस ट्रस्ट के द्वारा बनाये गये वॉक टुगेदर प्रायमरी आश्रम स्कूल कोचाई, महादेवी परमेश्वरीदास जिंदल हाई स्कूल न्हाले, श्रीमती कमलाबेन जोगानी हाई स्कूल भोपाली, जय कुमार जैन सेकेंडरी आश्रम स्कूल कोचाई, श्री जय कुमार जैन जूनियर कॉलेज कोचाई, महादेवी परमेश्वरीदास जिंदल हाई स्कूल तलवाड़ा, उमेद दोशी हाई स्कूल धरमपुर, प्रभा हीरा गांधी हाई स्कूल मेधा, जितेंद्र भंसाली जूनियर कॉलेज विक्रमगढ़ और प्रभा हीरा गांधी हाई स्कूल वडोली में अधिकाधिक संख्या में बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। कृते महादेवी परमेशवरीदास जिंदल चैरिटेबल ट्रस्ट ललित बगड़िया भ्रमणध्वनि:९८९२१५४४४६/८७७९९८०४६३ धारा ३७० हटाई जाए ताकि जम्मू कश्मीर मुख्यधारा से जुड़ा रहे मुंबई: महाराष्ट्र में बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा ने जम्मू कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए धारा ३७० हटाने की मांग की है। ताकि कश्मीरी लोग अपने आप को अलग मानकर भारत से कटे कटे ना रहें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र में विधायक लोढा ने इसके साथ यह भी मांग की है किकेंद्र सरकार जम्मू कश्मीर के लिए विशेष पैकेज घोषित कर, ताकि वहां युवाओं को रोजगार के अवसर मिले। विधायक लोढा ने इसे समय की मांग बताया है।पुलवामा में भारतीय सैनिकों पर हमले के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी को लिखे इस पत्र में विधायक लोढा ने कहा है कि आप कड़े फैसले लेने के पक्षधर हैं, आपके पीछे कई निर्णयों से यह साबित हुआ है, इसलिए धारा ३७० हटाने का तत्काल फैसला लेकर वहां के व्यवसायिक एवं औद्योगिक विकास के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की जाए, ताकि कश्मीर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ा रहा सके। प्रधानमंत्री को उन्होंने लिखा है कि संकट की घड़ी में पूरा देश आपके साथ है, यह हमले के बाद के दो दिनों में स्पष्ट भी हो गया है, साथ ही आपके नेतृत्व में साबित हुआ है कि भारत अत्यंत मजबूत राष्ट्र है तथा हर प्रकार की चुनौतियों को झेलने में सक्षम है, एक पत्र द्वारा प्रधानमंत्री से आग्रह किया गया है कि राष्ट्र हित में आपके इस निर्णय से देश एवं विशेष कर जम्मू कश्मीर की जनता को न्याय मिलेगा और यह समय की मांग भी है इससे समस्त भारत की जनता की भावनाओं का सम्मान भी होगा।

सहयोग करें स्व कल्याण के साथ…

-श्री जनकल्याण गौपाल गौशाला, मारोठ मारोठ: श्री जनकल्याण गोपाल गौशाला मारोठ की में सौलह वर्ष पूर्व गौपालन का कार्य प्रारम्भ हुआ जिसमें ग्राम के समस्त वर्ग शामिल हुए, बाद में कार्यकारिणी का गठन किया गया, क्योंकि यह हमारे भारत की संस्कृति ओर भगवान श्री कृष्ण स्वयं गौवंश चराया करते थे, गाय हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक काम में आती है, यहाँ तक मृत्युपरांत तर्पण भी गाय की पूँछ से ही होता है, जब भारत देश आजाद हुआ था तब साठ करोड़ की आबादी में इठानवें करोड़ गौवंश था और आज एक अरब पच्चीस करोड़ की आबादी और उन्नीस १९ करोड़ गौवंश है इससे कलयुग का प्रभाव व हमारे संस्कार अपवित्र हो रहे हैं। गौरक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले इस देश में राजा महाराज तक हुए हैं और कामधेनु जैसी गौमाता ने पुरी फौज को इच्छानुसार भोजन कराकर तृप्त कर दिया था, इच्छित आकांक्षाओं की जानकारी होने पर सन्त महात्माओं एवं भामाशाहों व सरकारों ने सदैव ही इसकी हिफाजत व पालन-पोषण के लिए भूमीदान, अर्थदान एवं श्रमदान से गौपालन को प्रगति प्रदान की है, इसमें सरकार का असहयोग और कल्ल खानों की स्वीकृति जैसा दौष भी मौजूद है, आज तीन करोड़ के आस-पास गौवंश का पालन गौशालाओं के माध्यम से हो रहा है जिसमें राजस्थान अव्वल श्रेणी में आता है यह सब सरकारी रिकार्ड के अनुसार प्राप्त है।श्री जन कल्याण गौपाल गौशाला मारोठ में गौवंश उपचार केन्द्र पक्षी व जंगली जानवर कीड़-मकौड़े तक का उपचार केन्द्र व प्रतिरोज कबूतर एवं पक्षीदाना व कीड़ी नाल व्यवस्था यथावत निरन्तर चालू रहती है, राजस्थान में प्राय: कम वर्षा से अकाल आदि से ग्रस्त काश्तकार व्यवस्था को बोझ उठाने में असमर्थता महसूस करता है तथा अधिकांश भामाशाह व व्यवसायी प्रवासी हो गए हैं तथा गौशाला में आय के साधन बहुत ही सीमित हैं लेकिन कार्यकारिणी व संरक्षक कर्ज लेकर भी निरन्तर गौशाला का निर्माण व पालन पोषण करते आ रहे हैं, यह सब आप लोगों व भगवान की कृपा से ही संभव है, आज गौशाला के संरक्षक एवं अध्यक्ष भंवरलाल बाबेल नागौर जिला गौ कल्याण संघ के अध्यक्ष होने के कारण नावां तहसील में दो के स्थान पर ६६ व नागौर जिले में १३० के स्थान पर छह सौ पचास गौशालाएं भगवान एवं भामाशाहों के सहयोग से संचालित कराने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं साथ गौवंश की समस्याओं के निराकरण हेतु केन्द्र-राज्य सरकार एवं सुप्रिम कोर्ट तक की कार्यवाहियों में सदैव संलिप्त रहते हैं, तथा कत्लखाने बंद करवाने व अन्य आंदोलनों में सदैव भागीरदारी निभाते रहते हैं, जब तक गौमाता का अनाचार से एक बूंद भी रक्त गिरेगा पृथ्वी पर भीषण वातावरण बना रहेगा व कलयुग के दोषों से मानव मुक्त नहीं होगा, गाय बचेगी तब ही देश बचेगा, जैसे वेद के बिना मति नहीं गाय के बिना गति नहीं होगी, गौमाता के समान देश में प्रेम करने वाला कोई नहीं है, इसका दूध पीने वाला कोई भी अपने से बड़ों का अपमान नहीं कर सकता, गाय केवल चारा गुजारा नहीं चाहती, अपना कोई प्यारा पुजारा चाहती है, लक्ष्मीजी की जड़ के मूल का नाम गौमाता है दान बंद हो जायेगा तो धरती का कल्याण रूक जायेगा, धन की तीन गति होती है दान, भोग और नाश अत: मुक्त हस्त से दान की प्रार्थना की जाती रही है।मारोठ गौशाला में गौवंश की संख्या छ सौ दस है, भविष्य में बढ़ने की संभावना है। कार्यशैली का निरीक्षण कराने हेतु अनुरोध है संपर्क करें: -भंवरलाल बाबेल, ०१५८६-२७७०३४-३५, ९६१०४३५५९८ गरीबों की सरकार है कांग्रेस नगरपालिका द्वारा आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मंत्री आंजना बड़ीसादड़ी: लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में ग्राम सेवा सहकारी समिति का पुनर्गठन किया जाएगा और हर वर्ष में चुनाव भी करवाए जाएंगे। ग्राम सेवा सहकारी समितियों का पूर्ण गठन होगा, उक्त उद्वोधन राजस्थान सरकार के इंदिरा गांधी नहर परियोजना व सहकारिता विभाग के मंत्री उदयलाल आंजना ने नगर पालिका द्वारा आयोजित विभिन्न उद्धाटन कार्यक्रमों में कही।नगरपालिका द्वारा आयोजित विभिन्न विकास कार्य के लोकार्पण में सहकारिता मंत्री आंजना ने नगरपालिका के मुख्य द्वार, फायर स्टेशन, सभागार, पालिकाध्यक्ष चेंबर, स्वामी बंशीधराचार्य यात्री प्रतीक्षालय व विभिन्न हुए विकास कार्य के लोकार्पण किया व मोटर गैराज के लिए भूमि पूजन किया गया।रात्रि ८ बजे आए मंत्री आंजना-नगरपालिका द्वारा विभिन्न विकास कार्य व लोकार्पण कार्यक्रम में दोपहर ३ बजे से कांग्रेस कार्यकर्ता मंत्री उदयलाल आंजना का इंतजार कर रहे थे। रात्रि ८ बजे मंत्री आंजना नगर में प्रवेश किए तो कार्यकर्ताओं ने उनका भव्य स्वागत किया। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम में देरी से आने का कारण पूछा तो मंत्री आंजना ने कहा कि वे राजसमंद जिले के प्रभारी मंत्री हैं वहां के जवान की अंतिम यात्रा में जाना जरूरी था, इसलिए उनको आने में देरी हो गई। पालिका अध्यक्ष दिलीप चौधरी, पूर्व विधायक प्रकाश चौधरी, पूर्व ब्लाक कांग्रेस अध्यक्ष अभय मेहता, फल सब्जी मंडी अध्यक्ष नाथूलाल भोई, नगर अध्यक्ष मुस्तफा बोहरा आदि कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित थे। कीर्ति आजाद हुए कांग्रेस में शामील नई दिल्ली: बिहार के दरभंगा के सांसद और भाजपा के निलंबित नेता कीर्ति आजाद कांग्रेस में शामील हो गए हैं।कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मौजूदगी में कीर्ति आजाद ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है।आजाद दरअसल १४ फरवरी को कांग्रेस में शामिल होने वाले थे लेकिन पुलवामा में आतंकी हमले के बाद उन्होंने तारीख आगे बढ़ा दी थी।कीर्ति आजाद ने ट्वीट किया कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी जी ने मुझे कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कराई है, मैंने मिथिला की परंपरा में उनको मखाना की माला, पाग, चादर से सम्मानित किया। वरिष्ठ पत्रकार व सम्पादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ की समाजिक सेवा मरोल सिटिजन वेलफेअर एसोसिएशन का अभियान जारी स्वच्छ अंधेरी की पहल ईस्ट वेस्ट अंधेरी टाइम्स के सम्पादक बिजय कुमार जैनके साथ मारोल वेलफेयर मंत्री सतनाम सिंह दिनांक ३/०२/१९ फरवरी रविवार की सुबह मरोल वेलफेयर के सभी सदस्यों ने मिलकर एक नयी पहल शुरूआत की कि हमारा विजय नगर स्वच्छ हो, इसलिए उन्होंने दीवारों पर चित्रकारी कार्यक्रम का आयोजन करवाया, इसमें दीवारों पर चित्रकारी के माध्यम से स्वच्छता का संदेश पहुँचाना है। कार्यक्रम की संचालक श्रीमती ट्रेजा जो संस्था की चेयरमैन भी हैं, उन्होंने पूरे कार्यक्रम को सरल रूप में आयोजित किया। कार्यक्रम की शुरूआत-बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ ईस्ट वेस्ट अंधेरी टाईम्स के संपादक ने अपने वक्तव्यों से किया। कार्यक्रम का आयोजन पूर्व नगरसेवक प्रमोद सावंत और वर्तमान नगरसेविका प्रियंका सावंत के करकमलों द्वारा संपन्न हुआ तथा प्रमोद सावंत ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए अपने वक्तव्य में स्वच्छता के महत्व को समझाते हुए प्रत्येक व्यक्ति से यह अपिल की, कि स्वच्छता अभियान में प्रत्येक व्यक्ति अपना योगदान दे तथा प्रियंका सावंत जी ने भी अभियान को आगे बढाने और स्वच्छ भारत की इच्छा व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति यदि जुड़े तो हमारा मरोल स्वच्छ अवश्य होगा। संस्था के सदस्य सुरेश नायर ने भी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए इस अभियान की पृष्टि की, सभी सदस्यों को एक साथ मिलकर कार्य करने की विशेषता बतलाई, इस प्रकार कार्यक्रम में मंत्री सतनाम सिंह को भी पूर्ण रूप से कार्यक्रम की सफलता के लिए अपना योगदान दिया। ईवेटा सर्वकामना सिद्धि हेतु जपें भगवान परशुराम के विशेष मंत्र भगवान विष्णु के दशावतार में छठे अवतार भगवान परशुराम क्रोध और दानशीलता में उनका कोई सानी नहीं है। शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता सिर्फ और सिर्फ भगवान परशुराम ही माने जाते हैं। भगवान शिव ने उन्हें मृत्युलोक के कल्याणार्थ परशु अस्त्र प्रदा न किया जिससे वे परशुराम कहलाए, वे परम शिवभक्त थे।उन्होंने सहदााार्जुन की इहलीला समाप्त कर दी। प्रायश्चित के लिए सभी तीर्थों में तपस्या की। गणेशजी को एकदंत करने वाले भी परशुराम थे। पृथ्वी को १७ बार क्षत्रियों से विहीन करने वाले भगवान परशुराम ही थे, उनकी दानशीलता ऐसी थी कि समस्त पृथ्वी ही ऋषि कश्यप को दान कर दी, उनके शिष्यत्व का लाभ दानवीर कर्ण ही ले पाए जिसे उन्होंने ब्रह्मास्त्र की दीक्षा दी।भगवान परशुराम की सेवा-साधना करने वाले भक्त भूमि, धन, ज्ञान, अभीष्ट सिद्धि, दारिद्रय से मुक्ति, शत्रु नाश, संतान प्राप्ति, विवाह, वर्षा, वाक् सिद्धि इत्यादि पाते हैं, महामारी से रक्षा कर सकते हैं।अक्षय तृतीया के दिन सर्वकामना की सिद्धि हेतु भगवान परशुराम के गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।मंत्र इस प्रकार हैं : –१. ‘ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात्।।’२. ‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात्।।’३. ‘ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम:।।’जप-ध्यान कर दशांस हवन करें तथा हर प्रकार की समस्याएं दूर करें। परशुराम के वंशज हैं हम ब्राह्मण गुमला: ब्राह्मण परशुराम के वंशज हैं, ब्राह्मणों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को बचाए रखने के लिए आगे आना होगा, जय ब्राह्मण समाज द्वारा एसएस उच्च विद्यालय में आयोजित परशुराम जयंती समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रांची से आए उदय शंकर ओझा ने उक्त बातें कही, कहा कि ईश्वर ने ब्राह्मणों को मां के गर्भ से ही श्रेष्ठ बनाकर भेजा है।उन्होंने कहा कि भगवान परशुराम में जो विद्वता एवं वीरता थी उसे ब्राह्मणों को अपने में आत्मसात करना होगा। समाज में फैली दहेज प्रथा पर रोक लगानी होगी, साथ ही मेधावी गरीब बच्चे-बच्चियों का भविष्य संवारने के लिए आगे हाथ बढ़ाना होगा तभी समाज आगे बढ़ सकता है। कार्यक्रम में आचार्य यमुना पाठक, अजय नाथ पांडेय, भाजपा जिलाध्यक्ष विजय मिश्रा ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में नगर पंचायत के चुनाव में ब्राह्मण समाज की निर्वाचित वार्ड पार्षद शैल मिश्रा, सोमनाथ बनर्जी एवं श्रीमती मधु प्रिया को शॉल ओढ़ाकर परिषद की ओर से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में रमाकांत त्रिपाठी, मदन मोहन पांडेय, सत्यजीत देवघरिया, कमला पांडेय, गोविंद राम दीवान, अंशु चौबे, सुभाषचंद्र राय, नित्यानंद पाठक, नारायण तिवारी, विनोद पांडेय, बलीनाथ पाठक, द्वारिका नाथ मिश्रा, नीरज मिश्र, राजेन्द्र मिश्र, प्रभाष दुबे, रमेश तिवारी, अनिरूद्ध पाठक सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे। उदयशंकर भगवान परशुराम  परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) के एक ब्राह्मण हैं, उन्हें विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है, पौराणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था, वे भगवान विष्णु के छठे अवतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ, तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया, शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए, चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे, उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी, उन्होंने एकादश छन्दयुक्त ‘शिव पंचतत्वारिंशनाम स्तोत्र’ भी लिखा, इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-‘ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।’ वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे, उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था, अवशेष कार्यों में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।पौराणिक परिचय : परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है, वे अहंकारी और धृष्ट हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं, वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे, कहा जाता है कि भारत के अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये, जिसमें कोंकण, गोवा एवं केरल का समावेश है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरल तक समुद्र को पिछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरल में भगवान परशुराम वंदनीय है और तीर के तेज से उत्पन्न ब्राह्मण को ब्रह्मर्षि ब्राह्मण भी कहते हैं जिसमें बिहार के योद्धा भूमिहार ब्राह्मण, महाराष्ट्र के चित्तपावन, पंजाब के मोहयाल अपनी उत्तपत्ति भगवान परशुराम से मानते हैं, वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते थे, वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे, उनका भाव इस जीव सृष्टि को इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था, वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि पशु पक्षियों, वृक्षों, फल-फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे, उनका कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है ना कि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना, वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे, उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है, यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थी (वह शिक्षा जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालकों को दी जाती है) वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे, यहाँ तक कि कई खूँखार वनैले पशु भी उनके स्पर्श मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे, उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी, लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण। उनके जाने-माने शिष्य थे – भीष्म द्रोण, कौरव-पाण्डवों के गुरु व अश्वत्थामा के पिता एवं कर्ण। कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म से क्षत्रिय है, लेकिन उसका सामथ्र्य छुपा न रह सका, उन्होंने परशुराम को यह बात नहीं बताई की वह सूत है और भगवान परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली, यदि कर्ण उन्हें अपने शुद्र होने की बात बता भी देते तो भी भगवान परशुराम कर्ण के तेज और सामथ्र्य को देख उन्हें सहर्ष शिक्षा देने को तैयार हो जाते, किन्तु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया कि उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा, जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी, इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने-सामने होते हैं तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।जन्म : प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे, उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा, इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की, सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुए कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो, तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना, फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग-अलग सेवन कर लेना, इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया, इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया, योगशक्ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है, इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी, इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की, कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली, समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ, जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे, बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ, रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे – रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस और परशुराम।माता पिता भक्त परशुराम : श्रीमद्भागवत में दृष्टान्त है कि गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा तट पर जल लेने गई रेणुका आसक्त हो गयी और कुछ देर तक वहीं रुक गयी। हवन काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचार करने के दण्ड स्वरूप सभी पुत्रों को माता रेणुका का वध करने की आज्ञा दी।अन्य भाइयों द्वारा ऐसा दुस्साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेद एवं उन्हें बचाने हेतु आगे आये अपने समस्त भाइयों का वध कर डाला, उनके इस कार्य से प्रसन्न जमदग्नि ने जब उनसे वर माँगने का आग्रह किया तो परशुराम ने सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने सम्बन्धी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर माँगा। पिता जमदग्नि की हत्या और परशुराम का प्रतिशोध : कथानक है कि हैहय वंशाधिपति कात्र्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्नि मुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया, तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं, इस काण्ड से कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना अधिकार कर लिया, इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया, यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया, अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोका, इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी, केवल इतना ही नहीं, उन्होंने देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे। हैहयवंशी क्षत्रियों का विनाश : माना जाता है कि परशुराम ने २१ बार हैहयवंशी क्षत्रियों को समूल नष्ट किया था। क्षत्रियों का एक वर्ग है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है यह समाज आज भी है, इसी समाज में एक राजा हुए थे सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इसी राजा और इनके पुत्र और पौत्रों का वध किया था और उन्हें इसके लिए २१ बार युद्ध करना पड़ा था। कौन था सहस्त्रार्जुन: सहस्त्रार्जुन एक चन्द्रवंशी राजा था, जिसके पूर्वज थे महिष्मन्त जिन्होंने नर्मदा के किनारे महिष्मती नामक नगर बसाया था, इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरान्त कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को सम्हाला। भार्गव वंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे। भार्गव प्रमुख जमदग्नि ऋषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर सम्बन्ध थे, कृतवीर्य के पुत्र का नाम भी अर्जुन था। कृतवीर्य का पुत्र होने के कारण ही उन्हें कात्र्तवीर्यार्जुन भी कहा जाता है। कात्र्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था। भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कात्र्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन या सहदााबाहु कहा जाने लगा, सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था। युद्ध का कारण: ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी, सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया, जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया। युद्ध में सहस्त्रार्जुन की सभी भुजाएँ कट गईं और वह मारा गया, तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि को मार डाला। परशुराम की माँ रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयी, इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया-मैं हैहय वंश के सभी क्षत्रियों का नाश करके ही दम लूँगा’ उसके बाद उन्होंने अहंकारी और दुष्ट प्रकृति के हैहयवंशी क्षत्रियों से २१ बार युद्ध किया। क्रोधाग्नि में जलते हुए परशुराम ने सर्वप्रथम हैहयवंशियों की महिष्मती नगरी पर अधिकार किया, तदुपरान्त कात्र्तवीर्यार्जुन का वध।कात्र्तवीर्यार्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पाँच पुत्र जयध्वज, शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे।दन्तकथाएँ : ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुरामजी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे वे एकदन्त कहलाये।रामायण काल : उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो स्वयं को विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही’ बताते हुए ‘बहुत भाँति तिन्ह आँख दिखाये’ और क्रोधान्ध हो ‘सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ तक कह डाला, तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए ‘अनुचित बहुत कहेउ अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता’ तपस्या के निमित्त वन को लौट गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- ‘कह जय जय जय रघुकुलकेतू, भृगुपति गये वनहिं तप हेतू’ वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।जाते-जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की थी।महाभारत काल : भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी, तब सहायता का आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा, उन दोनों के बीच २३ दिनों तक घमासान युद्ध चला, किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप परशुराम उन्हें हरा न सके।परशुराम अपने जीवन भर की कमाई ब्राह्मणों को दान कर रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे, किन्तु दुर्भाग्यवश वे तब तक सब कुछ दान कर चुके थे, तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणाचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये कहा, तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र-शस्त्र उनके मन्त्रों सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा सके।  परशुरामजी ने कहा-‘एवमस्तु!’ अर्थात् ऐसा ही हो, इससे द्रोणाचार्य शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।परशुराम कर्ण के भी गुरु थे, उन्होंने कर्ण को भी विभिन्न प्रकार की अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी सिखाया था, लेकिन कर्ण एक सूत का पुत्र था, फिर भी यह जानते हुए कि परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही अपनी विधा दान करते हैं, कर्ण ने छल करके परशुराम से विधा लेने का प्रयास किया।परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के नीचे कर्ण की गोदी में सर रख के सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर काटने लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये, इसलिये कर्ण भौंरे को सेहता रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौंरे के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा, वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा, इस घटना के कारण कर्ण को अपनी अस्त्र विद्या का लाभ नहीं मिल पाया। एक अन्य कथा के अनुसार एक बार गुरु परशुराम कर्ण की एक जंघा पर सिर रखकर सो रहे थे, तभी एक बिच्छू कहीं से आया और कर्ण की जंघा पर घाव बनाने लगा, किन्तु गुरु का विश्राम भंग ना हो, इसलिये कर्ण बिच्छू के दंश को सहता रहा, अचानक परशुराम की निद्रा टूटी और ये जानकर की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कि वो बिच्छू के दंश को सहन कर ले। कर्ण के मिथ्याभाषण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी। कौन थे परशुराम क्षत्रियों का एक समाज है जिसे हैहयवंशी समाज कहा जाता है वह समाज आज भी कायम है, इस समाज में एक राजा हुए सहस्त्रार्जुन। परशुराम ने इस राजा और इनके पुत्र और पौत्रों का वध किया था, माना जाता है कि उन्होंने इसके लिए २१ बार युद्ध किया था।कौन था सहस्त्रार्जुन: सहस्त्रार्जुन एक चंद्रवंशी राजा था, इन्हीं के पूर्वज थे महिष्मन्त, जिन्होंने नर्मदा के किनारे महिष्मति (आधुनिक महेश्वर) नामक नगर बसाया, इन्हीं के कुल में आगे चलकर दुर्दुम के उपरांत कनक के चार पुत्रों में सबसे बड़े कृतवीर्य ने महिष्मती के सिंहासन को संभाला। भार्गववंशी ब्राह्मण इनके राज पुरोहित थे, भार्गव प्रमुख जमदग्नि ऋषि (परशुराम के पिता) से कृतवीर्य के मधुर संबंध थे, कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन थे, कृतवीर्य के पुत्र होने के कारण उन्हें कात्र्तवीर्यार्जुन भी कहा गया।कात्र्तवीर्यार्जुन ने अपनी अराधना से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया था, भगवान दत्तात्रेय ने युद्ध के समय कात्र्तवीर्याजुन को हजार हाथों का बल प्राप्त करने का वरदान दिया था, जिसके कारण उन्हें सहस्त्रार्जुन कहा जाने लगा। सहस्त्रार्जुन के पराक्रम से रावण भी घबराता था।युद्ध का कारण : ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के कारण सहस्त्रार्जुन की मति मारी गई थी। सहस्त्रार्जुन ने परशुराम के पिता जमदग्नि के आश्रम में एक कपिला कामधेनु गाय को देखा और उसे पाने की लालसा से वह कामधेनु को बलपूर्वक आश्रम से ले गया। जब परशुराम को यह बात पता चली तो उन्होंने पिता के सम्मान के खातिर कामधेनु वापस लाने की सोची और सहस्त्रार्जुन से उन्होंने युद्ध किया, युद्ध में सहस्त्रार्जुन की भुजाएं कट गई और वह मारा गया, तब सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदग्नि का वध कर डाला। परशुराम की मां रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गई, इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया- मैं हैहयवंश के सभी क्षत्रियों का नाश कर दूंगा, तब अहंकारी और दृष्ठ हैहय-क्षत्रियों से उन्होंने २१ बार युद्ध किया था, क्षुब्ध परशुरामजी ने प्रतिशोधवश सर्वप्रथम हैहय की महिष्मती नगरी पर अधिकार कर लिया। कात्र्तवीर्जुन के दिवंगत होने के बाद उनके पांच पुत्र जयध्वज व उसके शूरसेन, शूर, वृष और कृष्ण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे, व उसके सौ पुत्र थे जिन्हें तालजंघ कहा जाता था, क्योंकि ये काफी समय तक ताल ठोंक कर अवंति क्षेत्र में जमे रहे, लेकिन परशुराम के क्रोध के कारण स्थिति अधिक विषम होती देखकर इन तालजंघों ने वितीहोत्र, भोज, अवंति, तुण्डीकेरे तथा शर्यात नामक मूल स्थान को छोड़ना शुरू कर दिया, इनमें से अनेक संघर्ष करते हुए मारे गए तो बहुत से डर के मारे विभिन्न जातियों एवं वर्गों में विभक्त होकर अपने आपको सुरक्षित करते गए, अंत में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर युद्ध करने से रोक दिया।कहा जाता है कि भारत के अधिकांश भाग और ग्राम परशुराम के द्वारा बनाए गए हैं, परशुराम का कहना था कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है, अपनी प्रजा से आज्ञा पालन करवाना नहीं, वे एक ब्राह्मण के रूप में जन्में जरूर थे, लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे और उन्होंने किसी क्षत्रिय को नहीं बल्कि पिता के हत्यारे और एक अहंकारी व लालची राजा तथा उसके पुत्रों का वध किया था।सहस्त्रार्जुन की समाधि : सहस्त्रार्जुन की समाधि एवं मंदिर इंदौर से ९० कि.मी. दूरी पर स्थित नर्मदा नदी के किनारे महेश्वर में है। समाधि पर शिवलिंग स्थापित है, यहां अखण्ड ११ नन्दा द्वीप मंदीर में प्रज्ज्वलित हैं। माना जाता है कि जायसवाल समाज भी स्वयं को हैहय चन्द्रवंशीय क्षत्रिय मानकर सहस्त्रार्जुन को अपना आराध्य मानता है।

स्वभाषा का महत्व

स्वतंत्रता सैनानियों ने अपना बलिदान इसलिए दिया था कि उनका देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बने, उसके लिए उनका मानना था कि भारतीय भाषाएँ हर क्षेत्र में प्रतिष्ठापित हों और ‘हिंदी’ भारत की संपर्क राष्ट्रभाषा बने, क्या उनका सपना पूरा हुआ या आज भी मानसिक गुलामी से पीड़ित हैं जो राजनैतिक गुलामी से कहीं अधिक हानिकारक है, इसका कारण अंगरेजी का बढ़ता वर्चस्व, जिसकी ताकत अंग्रेजों के शासन की ताकत से कहीं अधिक शक्तिशाली है और अंग्रेजी माध्यम के स्कूली शिक्षा से यह ताकत घर-घर में बढ़ती जा रही है। स्वतंत्रता के बाद स्वार्थवश अंग्रेजी के पक्षधरों द्वारा, अंग्रेजी के प्रयोग की दी गयी छूट के कारण आज जो स्थिति पैदा हो गयी है, कथनी और करनी में अंतर के कारण स्थिति दिन प्रतिदिनि बिगड़ती जा रही है, दिखने के लिए भारतीय सत्ताधारी राजनेताओं भारतीय भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दे दिया है, ‘हिंदी दिवस’ पर सत्ताधारी बुद्धिजीवी ‘हिंदी’ गुणगान करते नहीं थकते और उसके प्रचार के लिए करोड़ों रुपये का अनुदान देते हैं पर स्वयं प्रयोग नहीं करते, इसी कारण हिंदी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाएं भी अंगरेजी के आगे बौनी पड़ गयी हैं, परिणाम स्वरूप आज आधी सदी के बाद भी राष्ट्र गूंगा और उसकी पहचान नहीं है, कोई भी भाषा राष्ट्र की संपर्क भाषा घोषित नहीं है, ‘हिंदी’ जब अपने ही प्रदेश में प्रतिष्ठापित नहीं हो पा रही तो उसे राष्ट्र की संपर्क भाषा बनाने का सपना भी पूरा नहीं हो सकता, प्रश्न उठता है की अंग्रेजी के वर्चस्व से कौन पीड़ित है या व्यथित है व्यक्ति या राष्ट्र या कोई नहीं, यदि नहीं तो चिंतन व्यर्थ है, इसलिए अब समय आ गया है की भारतीय भाषाओं के प्रतिष्ठापनार्थ वभिन्न पहलुओं पर विचार करें और यदि भारतीय भाषाओं का प्रतिष्ठापन राष्ट्र हित में है तो उसके लिए दृढ़ता से संगठित होकर प्रयास किया जाये।भावनात्मक:- हमें स्वभाषा के सम्मान के लिए कार्य करना चाहिए, कोई भाषा सम्मानित तब होती है जब वह ज्ञान-विज्ञान की वाहक हो और अपमानित तब होती है जब उसका प्रयोग उस प्रयोजन के लिए नहीं किया जाए, जिसके लिए उसको निर्धारित किया गया है। अंग्रेजों के शासनकाल हमारी भाषाएँ सम्मानित थी और न हीं अपमानित होती थी पर अब अपमानित हो रही हैं, आज हमारी भाषाएँ राजभाषा बनी हुई है पर हकीकत में उनको यह दर्जा भी प्राप्त नहीं है, अत: वे अपमानित हो रही हैं, सबसे अधिक अपमानित ‘हिंदी’ है, इसका कारण स्वभाषा के स्वाभिमान का विलुप्त हो जाना, अत: स्वभाषा को सम्मान दिलाना या उन्हें अपमान से बचाने के लिए स्वभाषा के प्रति खोए स्वाभिमान को जगाना होगा।सांस्कृतिक:- विचारणीय है कि संस्कृति क्या है और स्वभाषा और संस्कृति का क्या सम्बन्ध है, क्या यह अध्यात्मवाद एवं अपनापन है या हमारे ग्रन्थ रामायण, गीता की पूजा पाठ? एक प्रतिष्ठित पत्रकार डॉ झुनझुनवाला का कहना है कि अपने ग्रंथों का अंगरेजीकरण कर दिया जाए तो हमारी संस्कृति बरकरार रहेगी, अंगरेजी के किस स्तर के प्रयोग से संस्कृति नष्ट हो रही है, अंग्रेजों के शासन काल में जब अंग्रेजी भाषा थी तब संस्कृति का कद्र क्यों नहीं था, हमारी भारतीय भाषाओं की मूल प्रति अध्यात्मवाद एवं अपनापन है जब अंगरेजी की मूल भावना भौतिकवाद एवं औपचारिकता है। अंग्रेजों के समय में हमारी स्कूली शिक्षा स्वभाषा के माध्यम से होती थी और निजी व्यवहार जैसे विवाह इत्यादि के लिए निमंत्रण पत्र में स्वभाषा का प्रयोग होता था पर आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की दिनों-दिन बढ़ोत्तरी हो रही है और निजी व्यवहार में भी उसका प्रयोग बढ़ रहा है। निजी व्यवहार को रोकने के लिए अंग्रेजी का का प्रयोग करने वाले के साथ असहयोग करना होगा, जैसे अंगरेजी में आये निमंत्रणों को स्वीकार नहीं करना और स्वभाषा के प्रति स्वाभिमान को जगाना होगा, स्वभाषा के माध्यम से स्वदेश के प्रति चिंतन जागरूक होगा, इस सम्बन्ध में निम्न विचार प्रस्तुत हैंभ्रष्टाचार:- भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है भौतिक सुख के लिए धनोपार्जन।भौतिक सुख का कारण है भौतिकवाद की विचारधारा को अपनाना, जैसा हम ऊपर कह चुके हैं कि अपनी भारतीय भाषाओं की मूल प्रवृतिअध्यात्मवाद एवं अपनापन है जबकी अंगरेजी की मूल भावना भौतिकवाद एवं औपचारकिता है, अतः अंग्रेजी को जीवन के हर छेत्र में माध्यम के रूप में अपनाने से भौतिकवाद और भौतिकवाद से भ्रष्टाचार बढ़ा है, यदि यह कारण नहीं है तो अन्य कारण क्या है इस पर विचार आवश्यक हैं।राष्ट्र एवं जनहित:- किसी भी राष्ट्र एवं उसके जनहित का अर्थ है जनजन की खुशहाली, आर्थिक सम्पन्नता, आत्मर्निभरता एवं स्वाभिमान से जीना। विश्व में विकसित राष्ट्रों में ऐसा पाया जाता है। विचारणीय है कि विकसित राष्ट्र बनने में स्वभाषा /जनभाषा की क्या भूमिका है? यह देखा जाता है कि विश्व में विकसित राष्ट्र वही है जिसकी जनभाषा, शिक्षा का माध्यम व कार्यभाषा एक हो। वैज्ञानिक तर्क पर यह सही प्रतीत होता है। किसी भी देश का विकास, मौलिक शोध एवं उस देश की धरती के संसाधनों से जुड़े प्रोद्योगिकी विकास के लिए अनुप्रयोगिक शोध पर निर्भर करता है।वैज्ञानिक शोध दो प्रकार के होते हैं मौलिक जिसमें प्राकृतिक नियमों की मूलभूत खोज होती है और अनुप्रयोगिक जो देश विशेष के संसाधनों, पर्यावरण, जलवायु इत्यादि पर आधारित होते हैं। अनुप्रयोगिक शोध से ही देश विशेष की आवश्यकताओं के अनुकूल प्रौद्योगिकी का विकास होता है, जहाँ मौलिक शोध से देश की आर्थिक सम्पन्नता व उसकी प्रतिभा बढ़ती है, वहीं अनुप्रयोगिक शोध से आत्मनिर्भरता बढ़ती है। मौलिक शोध का ताजा उदाहरण बिल गेट्स द्वारा व्यक्तिगत कम्प्यूटर सिद्धांत का विकास है, इससे अमरीका की सम्पन्नता बढ़ी, स्वभाषा के कम्प्यूटरों का विकास अनुपयोगिक शोध का उदाहरण है। देश विशेष की आवश्यकताओं के अनुकूल प्रौद्योगिकी के विकास ही जन-जन के लिए उपयोगी व्यवसाय विकसित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए घरेलू उद्योग धंधे यथा कुम्हार का मिट्टी का कुल्लड़, कृषि का विकास। कुल्लड़ का कचरा प्रदूषण पैदा नहीं करता क्योंकि टूटने पर मिट्टी-मिट्टी में मिल जाती है, हमारे देश में किसान गोबर के खाद का प्रयोग करते थे, जो धरती की उर्वरा शक्ति को नष्ट नहीं करता, रासायनिक खाद के प्रयोग से हम अपनी धरती की उर्वरा शक्ति को खो रहे हैं, यदि इस क्षेत्र में शोध किया जाता तो कुम्हार के कुल्लड़ को मजबूत किया जाता। कचरा आदि रसायन रहित खाद का प्रयोग बढ़ाया जाता, तो गाँवगाँव में व्यवसाय विकसित होते और शहर की और दौड़ कम होती, इसी प्रकार परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में धरती से जुड़े शोध का उदाहरण है थोरियम आधारित परमाणु बिजली घर का विकास, क्योंकि हमारे देश में थोरियम का अथाह भंडार है, यूरेनियम का नहीं, अतः थोरियम के परमाणु बिजली घरों के विकास हमें आत्मनिर्भर नहीं बनाएँगे जबकि यूरेनियम के परमाणु बिजली घर हमें पश्चिम के विशेष क्रम अमरीका पर निर्भर रखेंगे। मौलिक और अनुप्रयोगिक दोनों प्रकार के शोध देश की प्रतिभाओं द्वारा होते हैं, दोनों शोध के लिए पहली आवश्यकता है मौलिक/ रचनात्मक चिंतन व् लेखन एवं ज्ञान का आत्मसात करना, दूसरी आवश्यकता है भाषा पर अधिकार व तीसरी है अपने देश की आवश्यकताओं को समझना, प्रश्न उठता है कि क्या अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाली प्रतिभाएँ इस दिशा में कार्य कर सकेंगी?  मौलिक चिंतन एवं लेखन: विचारणीय है कि क्या स्कूली विशेषकर प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या जनभाषा से अलग भाषा होने पर मौलिक चिंतन समाप्त हो जाता है क्योंकि उस भाषा को सीखने के लिए रटना पड़ता है और बौद्धिक विकास के प्रारंभिक वर्ष दूसरी भाषा के सीखने में व्यतीत हो जाते हैं, जबकि स्वभाषा और जनभाषा से सहजता से ज्ञान अर्जित करने के कारण मानसिक विकास होता है, दुसरे विचारों की उड़ान सपनों में होती है और सपने स्वभाषा में ही देखते हैं। मौलिक चिंतन के लिए सपनों की भाषा एवं शिक्षण भाषा का एक होना आवश्यक है।ज्ञान का आत्मसात स्वभाषा /जनभाषा से ही संम्भव है क्योंकि जन्म से ही हमारे रग-रग में बस जाती है।दुसरी भाषा से हम ज्ञान तो प्राप्त कर सकते हैं पर ज्ञान का सृजन नहीं कर सकते।मौलिक लेखन के लिए विचारों को लिपिबद्ध करने के लिए आवश्यक इच्छा तब ही होगी जब मौलिक लेखन स्वभाषा या जन भाषा में हो।भाषा पर अधिकार:- व्यक्ति चाहे जितना भी चिंतन कर ले यदि उसका भाषा पर अधिकार नहीं है तो वह सत्साहित्य को न तो ग्राह्य कर सकता है और न स्वयं को अभिव्यक्त कर सकता है। अपने शोध को समझाने के लिए भाषा पर अधिकार की आवश्यकता होती है। विचारणीय है कि क्या शिक्षा का माध्यम और बोलचाल की भाषा अलग होने से व्यक्ति प्रभावी होगा या हम आधे अधूरे रहेंगे। सत्य तो यह है कि न तो हम उन लोगों में प्रभावी होंगे जिनकी हमारी स्कूली शिक्षा का माध्यम है और ना ही अपने लोगों में।देश की आवश्यकताओं को समझना:- अनुप्रयोगिक शोध के लिए आवश्यक है उस देश की मूलभूत आवश्यकताओं को समझना, उसके संसाधनों, उसकी जलवायु एवं उसके परिवेश से परिचित होना। भारत कापरिवेश गाँवों से है, अतः गाँवों से जुड़ना आवश्यक है। विचारणीय है कि अँग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले लोग हमारे गाँवों की स्थिति दर्शाने वाले समाचार पत्रों एवं स्वभाषा में लिखे साहित्य को न पढ़ने के कारण हमारे गाँवों के परिवेश से न जुड़ कर विदेशी परिवेश से जुड़ रहे हैं। – डॉ. विजय कुमार भार्गव अपनी आंखों को दें पोषण की ताकत कम्पूटर और टीवी के बढ़ते चलन ने ड्राई आई की समस्या बढ़ा दी है, एक अनुमान के अनुसार विश्व की लगभग ३३ प्रतिशत जनसंख्या ड्राई आई से पीड़ित है, आंखों की ऐसी बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि पोषक तत्वों का सेवन किया जाए।अनुसंधानों में यह बात सामने आई है कि पोषण भी हमारी आंखों को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है, ऐसा भोजन, जो विटामिन ए.सी और ई. बीटा कैरोटिन, जिंक और ओमेगा-३ फैटी ऐसिड से भरपूर होता है, आखों को स्वस्थ रखने लिए जरूरी है।गाजर– आंखों की रोशनी बनाए रखने में गाजर बहुत सहायक है।कैसे खाएं– एक नए अध्ययन के अनुसार पकी हुई गाजर में कच्ची गाजर से ज्यादा विटामिन ए. ल्युटिन और विटामिन के होते हैं, गाजर को पकाने से बीटा कैरोटिन और फिनॉलिक एसिड की मात्रा भी बढ़ जाती है, इसे आलू, मटर, गोभी और मशरूम के साथ पकाया जा सकता है, वैसे आप गाजर का जूस पी सकते हैं, सलाद में डाल सकते हैं या कच्चा खा सकते हैं। गाजर का सूप भी बहुत पौष्टिक होता है।लाभ– गाजर में बीटा कैरोटिन होता है, हमारा शरीर बीटा कैरोटिन को इस्तेमाल करके ही विटामिन ए का निर्माण करता है, विटामिन ए की कमी से कॉर्नियां धुंधला पड़ जाता है और यही दृष्टिहीनता का सबसे प्रमुख कारण है, गाजर में ल्युटिन एंटीऑक्सीडेंट भी भरपूर होता है, जो रेटिना की सुरक्षा करता है और एएमडी का खतरा कम करता है। कम्प्यूटर पर काम करते हैं और आपकी नजर कमजोर व धुंधली हो गई है तो छह महीने तक नियमित रूप से पालक खाएं, आपकी दृष्टि में काफी सुधार आ जाएगा।कैसे खाएं– पालक में थोड़ा-सा तेल डालकर धीमी आंच पर पकाएं, तेज आंच पर उसके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। पालक काटने से पहले ही धोएं अलग से पानी में न डालें, २-३ मिनट से ज्यादा न पकाएं।डेयरी प्रोडक्ट्स– जो लोग नियमित रूप से ३०० मिलीलीटर दूध या इतनी ही मात्रा में दही या अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स लेते हैं, उनमें बढ़ती उम्र के साथ आंखों की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है।कैसे खाए– अगर ठंडा दूध पीने से परेशानी होती है तो गर्म दूध पीएं। गर्म दूध को शरीर आसानी से हजम कर सकता है, क्योंकि गर्म करने से उसमें मौजूद लैक्टोज टूट जाता है, जिससे पेट नहीं फूलता, जिन लोगों को दूध पसंद नहीं है या जो लोग लैक्टोज के प्रति इन्टॉलरेंट हैं, वो दही, पनीर या छाछ का सेवन करें।लाभ– डेयरी उत्पादों में विटामिन ए भरपूर मात्रा में होता है जो आंखों की सेहत के लिए बहुत जरूरी है।संतरा– संतरे विटामिन सी से भरपूर होते हैं, जो आंखों को स्वस्थ रखने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। हर कामयाब व्यक्ति के पीछे औरत का हाथ…? एक होटल कंपनी के मालिक ने, अपने ग्राहकों के सामने एक शर्त रखी कि मगरमच्छों से भरे तालाब में जो आदमी मगरमच्छों से बचकर बाहर निकल जाएगा, उसको ५ करोड़ रुपए इनाम के तौर पर दिया जाएगा और अगर उस आदमी को मगरमच्छ ने खा लिया तो उसके परिवार को दो करोड़ रूपया दिया जाएगा ! यह सुनकर सभी लोग भयभीत हो गए ! किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह तालाब में कूद सके !तभी एक जोरदार आवाज आती है………..लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया, यह क्या, किसी आदमी ने तालाब में छलांग लगा दी थी ! लोगों की सांसे थम गई और सभी लोग उस आदमी की तरफ देखने लगे !वह आदमी पूरी तरह से तालाब में जद्दोजहद कर रहा था !बिजली की फुर्ती से, वह पानी को चीर कर आगे बढ़ रहा था !सभी लोग उसको बहुत ध्यान से देख रहे थे !अब यह आदमी मगरमच्छ का निवाला बनेगा !वह देखो मगरमच्छ उस आदमी के पीछे!मगर उस आदमी ने हिम्मत नहीं हारी वह पूरी तरह जद्दोजहद कर रहा था बाहर निकलने की !तभी वह आदमी पानी को चीरता हुआ,दूसरे किनारे से बाहर निकल जाता है !उस आदमी को पूरी तरह सांस भी नहीं आ रही थी !सभी लोग भाग कर उसकी तरफ गए !लोगों ने ताली बजाना शुरू कर दिया !जब उस आदमी को थोड़ा होश आया और उसे पता चल गया कि वह करोड़पति बन गया है, उसके मुंह से पहली आवाज निकली, ‘‘पहले यह बताओ मुझे धक्का किसने दिया था?” तभी तलाब के पास खड़ी भीड़ में, एक औरत ने हाथ खड़ा किया ! वह औरत, उस आदमी की बीवी थी ! उसने कहा, ‘‘तुम काम के तो हो नहीं, अगर बच गए तो ५ करोड़, मर जाते तो दो करोड़ दोनों तरफ, फायदा तो मुझे ही होना था !”तब से यह कहावत बन गई, ”एक कामयाब व्यक्ति के पीछे, एक औरत का हाथ होता है” भ्रष्टाचार मुक्त भारत कैसे बने, बतायें ईमेल करें mailgaylordgroup@gmail.com भ्रष्ट आचरण वाले जनप्रतिनिधियों के बीच भ्रष्टाचार मुक्त भारत कैसे बन सकता है, इस प्रश्न का जवाब क्या वर्तमान भाजपा सरकार के पास है जो कांग्रेस मुक्त भारत का सपना मन में सजोए बैठी है जो विदेशों से कालाधन वापिस लाने की बात कर रही है, इस तरह की जुमलेबाजी से आज जनता परेशान हो चुकी है, देश की आवाम समस्याओं से निदान चाहती है, महंगाई पर नियंत्रण चाहती है, टैक्स के बढ़ते दर से निजात चाहती है।देश के युवा वर्ग को कर्ज नहीं रोजगार के लिए उपयुक्त संसाधन चाहिए, किसानों को कर्ज नहीं, अपनी फसलों का उचित दाम चाहिए। बाजार से बिचौलियों की भूमिका से आम जन निजात पाना चाहता है, इसीलिए देश का आवाम सत्ता बदलता रहता है। बड़ी उम्मीदों के साथ देश के आवाम ने केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारी बहुमत देकर भाजपा की सरकार गठित की पर उसे अंतत: निराशा बढी है आम जन को न तो बाजार की बढ़ती महंगाई से राहत मिली, न देश के युवाओं को रोजगार के लिए नये उद्योग, सरकार की कौशल रोजगार योजना बैंक से कर्ज देने के सिवाय देश में कितना रोजगार सृजित कर पाई? सरकार की जीएसटी से जीवन रक्षक दवाइयों से लेकर आम जनजीवन की उपयोग में आने वाली हर वस्तु महंगी हो गई। नोटबंदी योजना के दौरान कालाधन से होने वाली काली कमाई एवं छोटी-छोटी बचत कर बचाने वाले आम जनजीवन को अपने ही रकम के लिए उभरी परेशानियों के दृश्य अभी तक आंखों से ओझल नहीं हो पाए, फिर भी वर्तमान सरकार अच्छे दिन आने की वकालत कर रही है।देश जब से आजाद हुआ, तब से लोकतंत्र की बागडोर सुविधाभोगी लोगों के हाथ आ गई जहां राष्ट्रहित से स्वहित सर्वोपरि होता गया, दिन-ब-दिन चुनाव महंगे होते गए। सत्ता पाने के लिए हर तरह के अनैतिक हथकंडे प्राय: सभी राजनीतिक दलों द्वारा अपनाए जाने लगे, जिससे लोकतंत्र पर माफियाओं का साम्राज्य धीरे-धीरे स्थापित होने लगा, अर्थबल एवं बाहुबल प्रभावित राजनीतिक प्रक्रिया ने भारतीय लोकतंत्र की दशा एवं दिशा ही बदल दी जहां लूटतंत्र का साम्राज्य स्थापित हो गया। पंचायती राज से लेकर विधायिका एवं कार्यपालिका तक शामिल सभी अपने-अपने तरीके से देश के माफियाओं के संग मिलकर देश को लूटने लगे, जिससे देश में अनेक प्रकार के घोटाले उजागर हुए, इस व्यवस्था का लाभ उठाकर अधिकांश प्राय: सभी के सभी झोपड़ी से उठकर महल तक पहुंच गए और देश की आम जनता टैक्स के भार तले दबती गई। महंगाई दिन-ब-दिन बढ़ती रही और जनता के चुने जनप्रतिनिधि अपना घर भरते रहे। माफियातंत्र प्रभावित लोकतांत्रिक व्यवस्था मेंसर्वाधिक लूट को स्थान मिला जिससे देश भर में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर फैल गया जिसे रोक पाना आज मुश्किल हो रहा है, माफियाओं को अपने साथ रख प्राय: सभी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार मिटाने की बात तो करते हैं पर बिल्ली की रखवाली में चूहे कैसे सुरक्षित रह पाएंगे? कालाधन उगाही करने वाले जब साथ में हो तो देश में ही कालाधन रोक पाना मुश्किल है, फिर विदेशों से कालाधन कैसे वापिस आएगा? बात गले नहीं उतरती, आज जो जनप्रतिनिधि जहां भी हैं, अपने बारे में पहले सोचता है, सभी राजनीतिक दल येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए बेमेल संगम से लेकर बेमेल सौदेबाजी करने को तैयार बैठे हैं, खरीद-फरोख्त इस व्यवस्था का प्रमुख भाग बन चुका है।बहुमत पाने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाने में कोई किसी से पीछे नहीं, इस अनैतिक व्यवस्था को कायम करने में सभी प्रकार की नैतिकता ताक पर रख दी जाती है, राजनीतिक दल को जो सर्वाधिक चंदा दे सके, चुनाव में सर्वाधिक खर्च करने की क्षमता रखने के साथ-साथ चुनाव में जीत किसी भी प्रकार दर्ज करा सके, ऐसे जनप्रतिनिधि की तलाश प्राय: सभी राजनीतिक दलों को रहती है चाहे उसका आचरण कैसा भी हो, फिर व्यवस्था में किस प्रकार से सुधार होगा?सत्ता बदलती रहती है पर जनता के हाथ वही ढाक के तीन पात लगते हैं, सभी जुमलेबाजी करते हैं, एक दूसरे को गलत ठहराते हैं, परिवर्तन लाने की बात करते हैं पर सभी एक जैसे कारनामे करते हैं। सत्ता पाने के लिए एक जैसी हरकते करते हैं। राष्ट्रपति,राज्यपाल से लेकर लोकसभा अध्यक्ष,विधानसभा अध्यक्ष जैसे सर्वोपरि सम्मानित पदों पर अपने चहेतों को बैठाते हैं जिनसे अपने मनमुताबिक कार्य करवा सकें। देश की सरकारें बदलती रही पर यह प्रक्रिया आज तक नहीं बदली?वर्तमान केन्द्र की भाजपा सरकार जोर-शोर से आम जनता से पूछ रही है कि कांग्रेस सरकार ने आज तक क्या किया, भाजपा सरकार खुद ही बताए कि अपने शासन काल में कांग्रेस नीतियों से अलग हटकर क्या किया? राष्ट्रपति, राज्यपाल से लेकर लोकसभा अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, जैसे सर्वोपरि सम्मानित पदों के मामले में कांग्रेस से अलग हटकर क्या किया, चुनाव के दौरान सत्ता पाने के लिए कांग्रेस से अलग हटकर कौन सा नया गुल खिलाया। देश का कोई भी राजनीतिक दल भ्रष्ट आचरण वाले जनप्रतिनिधियों को अपने बीच से अलग नहीं करना चाहता, फिर भ्रष्ट आचरण वाले जनप्रतिनिधियों के बीच भ्रष्टाचार मुक्त भारत कैसे बने, यह विचारणीय पहलू है? -डॉ. भरत मिश्र ‘प्राची’ विश्व हिंदी सम्मेलन की देन है ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय’ वर्धा में साकार होता एक स्वप्न हिंदी भारत में बोली और समझी जाने वाले न केवल एक प्रमुख भाषा है बल्कि यहाँ की संस्कृति, मूल्य और राष्ट्रीय आकांक्षाओं का व्यापक स्तर पर प्रतिनिधित्व भी करती है, इसका अस्तित्व उन सुदूर देशों में भी है जहाँ भारतीय मूल के लोग रहते हैं, संख्या बल की दृष्टि से ‘हिंदी’ का विश्व भाषाओं में ऊँचा स्थान है।महात्मा गांधी हिंदी को ‘प्यार और संस्कार की भाषा’ कहते थे,उनकी मानें तो ‘इसमें सबको समेट लेने की अद्भुत क्षमता है’‘हिंदी’ अपने आप में बहुत मीठी, नम्र और ओजस्वी भाषा हैभारत के स्वतंत्रता संग्राम में ‘हिंदी’ ने पूरे भारत को जोड़ने का काम किया था, यद्यपि इसे जनमानस में राष्ट्रभाषा का गौरव मिला, पर भारत के संविधान में इसे ‘राजभाषा’ के रूप में स्वीकार किया गया, साथ ही यह प्रावधान भी किया गया कि अंग्रेजी का प्रयोग तब तक चलता रहेगा जब तक एक भी राज्य वैसा चाहे, ऐसी स्थिति में उल्लेखनीय साहित्यिक विकास के बावजूद जीवन के व्यापक कार्यक्षेत्र और ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में ‘हिंदी’ को वह स्थान नहीं मिल सका जिसकी वह हकदार है, इस परिप्रेक्ष्य में १९७५में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प लिया गया, बाइस वर्ष बाद १९९७ में भारतीय संसद के विशेष अधिनियम क्रमांक ३ के अंतर्गत वर्धा में ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय’ की स्थापना की गई, इस प्रकार इस संस्था की स्थापना की प्रमुख श्रेय विश्व हिंदी सम्मेलन को जाता है। विश्वविद्यालय ने न्यूयार्क, जोहान्सबर्ग और भोपाल में सम्पन्न विगत तीन विश्व हिंदी सम्मेलनों में प्रमुख दायित्व निभाया और उनके प्रतिवेदन तैयार कर प्रकाशित किए।वर्धा का यह केंद्रीय विश्वविद्यालय हिंदी भाषा और साहित्य के संवर्धन और विकास के लिए एक बहुआयामी उपक्रम के रूप में आरम्भ हुआ, इसके अंतर्गत हिंदी-शिक्षण, अनुसन्धान, अनुवाद, भाषा विज्ञान, तुलनात्मक अध्ययन, प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा अध्ययन के विभिन्न विभागों में शिक्षण और अनुसंधान, विदेशों में हिंदी की अध्ययन और दूर शिक्षा द्वारा हिंदी अध्ययन को प्रोत्साहन, देश और विदेश में सूचना के विकास और प्रसारण की व्यवस्था को शामिल किया गया। ‘हिंदी’ के भूगोल को विस्तृत करने और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की दृष्टि से समृद्ध करने के लिए विश्वविद्यालय कृतसंकल्प है। वर्धा की पंचटीला नामक पहाड़ी पर इस विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए स्थान मिला और वर्ष २००० से शैक्षणिक गतिविधियाँ आरम्भ हुई। उच्च शिक्षा के किसी शैक्षिक केंद्र का निर्माण एक समयसाध्य चुनौती है, अपने बीस वर्ष की जीवन अवधि में यह विश्वविद्यालय अनेक दिशाओं में अग्रसर है, यह मानते हुए कि हिंदी के संवर्धन के लिए बहुमुखी उपाय आवश्यक है, यह विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त अनेक प्रासंगिक कार्यों में भी अनवरत रूप से संलग्न है। ‘हिंदी’ को केंद्र में रख कर ज्ञान के विस्तार के लिए यह विश्वविद्यालय बहुमुखी योजनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है, इसमें प्रमुख हैं: अध्ययन-अध्यापन, कोश-निर्माण, भाषा प्रौद्योगिकी का विकास, भाषाई प्रशिक्षण, अध्ययन सामग्री का निर्माण, शोध कार्य तथा साहित्य का प्रकाशन, शोध पत्रिकाओं का प्रकाशन, अतिथि लेखकों की उपस्थिति, संस्कृति-संवर्धन के प्रयास तथा हिंदी का प्रचार-प्रसार।‘हिंदी’ न केवल भाषा है बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान और लोक-परंपरा को भी धारण करती है, इस पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय की संकल्पना ‘हिंदी’ को ज्ञान की भाषा के रूप में स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘हिंदी’ को माध्यम बनाकर ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एक विश्वस्तरीय ज्ञान-केंद्र के रूप में की गई थी, व्यवहारिक रूप में यह विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन और शिक्षण के अतिरिक्त ‘हिंदी’ को बढ़ावा देने के लिए प्रकाशन, सांस्कृतिक संवाद और साहित्य-संकलन तथा उसके संरक्षण का भी कार्य करता है, इसका जीवंत परिसर अनेक दृष्टियों से सक्रिय है। भाषा की दृष्टि से ‘हिंदी’ को सबल बनाने के लिए और उसमें आ रही दुर्बलताओं को दूर करने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर एक विशेष योजना तैयार की है, ‘हिंदी’ भाषा के उत्थान के लिए अध्यापकों के लिए, छात्रों के लिए आवश्यक अध्ययन सामग्री तैयार की जाए, दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है भिन्न-भिन्न विषयों में ‘हिंदी’ की मानक पुस्तकें तैयार करने का, ताकि हिंदी ज्ञान-विज्ञान और विचार-विमर्श की एक समर्थ भाषा बन सके, इस दृष्टि से कार्य प्रगति पर है। तीसरा क्षेत्र है भाषा-प्रयोग के लिए सॉफ्टवेयर निर्माण का, आज यदि हम कंप्यूटर और इंटरनेट का उपयोग करना चाहते हैं तो डिजिटल फार्म में सारी चीजें मिलनी चाहिए, इसे ध्यान में रख कर प्रयास किया जा रहा है कि हम तकनीकी दृष्टि से भी ‘हिंदी’ को सबल बनाएं। विश्व हिंदी सम्मेलन् के अंतर्गत एक संकल्प लिया गया था कि कानून की शिक्षा हिंदी माध्यम से दी जाए, हमारे विश्वविद्यालय में कानून की शिक्षा का प्रस्ताव भी तैयार हुआ है, इसके लिए आवश्यक कारवाई आरम्भ की गई है, यह विश्वविद्यालय बहुआयामी है और ‘हिंदी’ जगत को इससे बड़ी अपेक्षाएँ हैं। ‘हिंदी’ के प्रचार-प्रसार और उसकी समृद्धि के प्रति विश्वविद्यालय गम्भीर और उसके प्रति समर्पित है, यहाँ के विद्यार्थी और अध्यापक इस कार्य में मनोयोग से लगे हुए हैं यह संतोष की बात है, फिर भी बहुत कुछ करना शेष है, हमारा स्वप्न है कि यह विश्वविद्यालय एक विश्वस्तरीय उच्च संस्थान का रूप धारण करे, यदि सामान्य रूप से हम विचार करें तो हमारी आवश्यकता है कि हम देशी विचारों और समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान दें अपने देश की संस्कृति, परिस्थिति, सामाजिक ताना-बाना इन सबको ध्यान में रखकर अध्ययन होना चाहिए, अभी तक हमारे अध्ययन प्राय: उन्हीं सिद्धांतों और कार्यों को ध्यान में रखकर किये जाते रहे हैं जो कि पश्चिम के अपेक्षाकृत विकसित देशों में किए गए हैं, सामाजिक विज्ञानों में या मानविकी के विषयों में इस प्रकार का दृष्टिकोण बहुत लाभदायक नहीं है क्योंकि इस प्रकार का जो अनुकरण वाला कार्य है वह हमारे अपने समाज की समझ को बहुत अधिक स्पष्ट नहीं करता। गांधी जी की चेतावनी थी कि हमारी अपनी जमीन में हमारे पैर गड़े होने चाहिए, हमारे मकान की खिड़कियां खुली होनी चाहिए, बाहर की हवा आए और हम उसको ग्रहण करें, लेकिन यह नहीं कि हम बिलकुल बदल जाएँ, यह तो शायद आत्मघाती कदम होगा और यह विचार करने का प्रश्न है कि किस प्रकार हम संतुलन स्थापित कर सकते हैं, यह आवश्यक है कि हम अपने स्वभाव, अपने स्वधर्म के विषय में एक समझदारी विकसित करें, हम अपने मूल से जीवन ग्रहण कर सकते हैं, हमें अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए और सांस्कृतिक विवेक की परिपक्वता पाने का प्रयत्न करना चाहिए, ‘मैं भारत हूँ’ परिवार को विश्वास है कि यह संस्था ‘हिंदी बने राष्ट्रभाषा’ अभियान की दिशा में सक्रिय रहेगी। प्राचीन भारत में लेखन-सामग्री -डॉ.शिवनन्दन कपूर ‘मनुस्मृति’ का उल्लेख है, इस देश के नभ में ही भासित ज्ञान के भास्कर की आभा से संसार आभासित हुआ। जन-जन ने जगत में आचरण की दिशा पाई गयी। देश में श्रुत-परम्परा पर्याप्त समय तक रही। कानों से सुन कर, मनन से मन में उतार कर, मनस्वियों ने आचरण की ओर चरण बढ़ाये। लेखन का भी विकास हुआ। अध्ययन-लेखन से ज्ञानार्जन की आभा और आभासित हुई। ‘ॐ नम: सिद्धम्’ से विद्या सिद्ध हुई। भारत ज्ञान-क्षेत्र की गरिमा से प्रसिद्ध हुआ। भारत विविधता में अनेकता का देश है। लेखन-आधार में भी यहाँ अनेकरूपता दृष्टिगत होती है। ‘काव्य-मीमांसा’ में इस प्रकार के उपदानों की चर्चा करते हुए भोज-पत्र, ताल-पत्र, लौह-कण्टक आदि का उल्लेख है।भोज-पत्र : पावन लेखन-आधार के रूप में, भारत में पुरातन काल से ही भोज-पत्र का प्रचलन रहा। पवित्रता की मान्यता और परम्परा-पालन में आज भी इसका प्रयोग हो रहा है। आश्चर्य तो यह है कि भोज-पत्र कहा जाने वाला आधार भूर्ज-वृक्ष का पत्ता न होकर, उसकी छाल है। सिकन्दर के अभियान के समय, इसके चलन का संकेत कर्टिअस ने किया है। अलबरूनी ने भी लिखा था, ‘मध्य और उत्तरी भारत के निवासी भूर्ज तरु की छाल का उपयोग लिखने के लिये करते हैं ‘इसे ‘तूर्ज’ कहा गया है। खोतान के निकट प्राप्त, खरोष्ठी लिपि में लिपिबद्ध ‘धम्मपद’ इसी पर लिपिबद्ध है। अफगानिस्तान और अन्य स्थानों के स्तूपों में भी अनेक ग्रन्थों के पृष्ठ इस पर अंकित सुलभ हुए हैं।चौथी शती का ‘संयुक्तागम सूत्र’ भी भूर्ज-पत्र कश्मीर में भी उपलब्ध हैं। भोज-वृक्ष की छाल उतार कर, उसे वांछित आकार में काट कर, चिकना करने के बाद उपयोग में लाते थे, हो सकता है, पहले पत्ते का प्रयोग हुआ हो, फिर छाल को समुचित पाकर उपयोग करने लगे हों। छाल की अपेक्षा पत्र कहने में गरिमा है। वैसे ‘योगिनी-तन्त्र’ ही नहीं, मदार के पत्ते, वट और अन्यान्य तरुओं के पत्तों का भी लेखन-साधन के रूप में अपनाये जाने का उल्लेख है- अन्यवृक्षत्चचि देवि!तथा केतकिपत्रक।मार्तण्डपत्रे रौप्ये वा वटपत्रे वरानने।अन्यपत्रे वसुदले लिखित्वा य:समप्यसेत्। लेखन-कला के अनेक प्रमाण हैं। ‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार, राम के प्रत्येक पत्र पर उनका नाम अंकित था (६/४४/२३)। युद्ध-काण्ड में लेखन के प्रमाण में कहा गया है, जो मानव रामायण की प्रतिलिपि करेंगे वे वैकुठ के अधिकारी होंगे। (ये लिखन्ती च नरस्तेषाम् वासस्त्रिविष्टप’- वाल्मीकि रामायण, ६/१२८/१२०)। ‘जय काव्य’या ‘महाभारत’ के रचनाकार व्यास जी थे, वे जिस श्लोक का उच्चारण करते थे, आशु लिपिकार गजानन उसका अर्थ ह्य्दयंगम कर, लिखते थे। कभी-कभी गणेश के शीघ्रता कर लेने पर, व्यास कूट श्लोक की रचना कर, उनकी गति पर विराम लगाते थे। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में कमल के कोमल आधार पर प्रणय-पत्र की कोमलता के अंक तो उसके ही अंक पर नि:शंक आँके जा सकते थे।ताल-पत्र : ताल-पत्र या ताड़-पत्र का प्रयोग भी प्रचुरता से हुआ करता था।‘योगिनी तन्त्र’ में इसका संकेत है, ‘भूर्जे वा तेजपत्रे वा ताले वा तालपत्रके।’पर्यटक ह्वेनसांग ने सातवीं सदी में, ताल-पत्र के लेखन-साधन के रूप में प्रयुक्त होने का उल्लेख किया है। तक्षशिला में ताड़-पत्र के ऐसे पृष्ठ प्राप्त भी हुए हैं, दूसरी शताब्दी के, अश्वघोष के दो नाटकों के ताल-पत्र पर लिखित खंण्डित अंश अपलब्ध हुए हैं। गाडफ्रे महोदय को कुछ ताल-पत्र चौथी शती के मिले थे। जापान के हारिमूज विहार में ‘प्रज्ञा पारमिता ह्य्दय सूत्र’ और ‘उष्णीष विजय धारिणी’ के अंश हस्तगत हुए हैं। ये छठी सदी के आस-पास के हैं तथा ताल-पत्र पर ही उरे के हैं। ११वीं सदी के अनेक ग्रन्थ ताड़-पत्र वाले पाये गये हैं। बौद्ध-विहारों में आज भी इस प्रकार के ताड़-पत्र के ग्रन्थ देखने में आते हैं।भोज-पात्रों या ताल-पत्रों के मध्य में छिद्र कर, उन्हें बाँध दिया जाता था। गूँथने की इसी क्रिया के आधार पर उन्हें ‘ग्रन्थ’ कहा जाने लगा, यह छिद्र कभी बायें, कभी दायें भाग में किये जाते थे, इसी क्रिया से निबन्ध तथा प्रबन्ध शब्दों का उद्भव हुआ। छेद कर, गाँठ देने की परम्परा तो नहीं रही है, हाँ ग्रन्थ शब्द पर पड़ी। भूर्ज वृक्ष की छाल जब पत्र कहला सकती है, तो ताल-पत्र भी पत्र कहा जा सकता है।धातु-पत्र : ‘योगिनी-तन्त्र’ में भोज-पत्र तथा अन्य पत्रों के साथ रजत, ताम्र, स्वर्ण पत्र भी राह पर लग गये। वे पत्ते न थे किन्तु पिट कर, ‘पतलेपन पर उतर आने’ से, वे भी पत्र कहलाने लगे, जैसे कोई उच्च व्यक्ति निम्न व्यवसाय अपना ले, तो उसे उसी श्रेणी का नाम दे दिया जाता है, कहा जाता है ‘सम्भवे स्वर्णपत्रे च, ताम्रपत्रे च शंकरि।’ स्तूपों में प्राय: रजत और कनक-पत्र प्राप्त हुए हैं। भूमि तथा अन्य प्रकार के दान प्रकरणों में प्रचलित होने वाले शासनदेश ताम्र-पत्र पर अंकित किये जाते थे, इसके मूल में, उनके स्थायित्व की भावना थी। धातु-पत्र चिरकाल तक बने रह सकते हैं। ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ में इनका उल्लेख है (१/३१९)। ताम्र-पट्टिका पर भूमि अथवा वस्तु के दाता एवं आदाता दोनों का नाम उत्कीर्ण होता था। चौथी सदी में भी इनके प्रचलन के प्रमाण हैं। फाहियान ने बौद्ध काल में इनके अस्तित्व की चर्चा की है। मौर्य युग में विशिष्ट शासनादेश ताम्र-पत्र पर ही उरेके जाते थे, ये ताम्र-पत्र स्थूल, पतले, भारी, हल्के सभी प्रकार के प्राप्त हुए हैं। ताँबे के पत्तरों को पीट-पीट कर, समतल कर, फिर उन पर लोहे की नोकदार लेखनी से अक्षर कुरेदे जाते थे, एक से अधिक पत्तरों की आवश्यकता पड़ने पर, उनमें छिद्र कर, ताँबे के तार से बाँध दिया जाता था।काष्ठ-पट या पाटी : ‘ललित विस्तर’,‘विनय पिटक’ आदि में काष्ठ-पट का वर्णन है। लकड़ी की पाटी पर लिखने की प्रथा देश में बहुत समय तक चलती रही, प्रारम्भ में छात्र काष्ठ-पट लिखते रहे। क्षत्रप नहपान के शिला-लेखों में भी लकड़ी के फलकों का उल्लेख है। ब्रह्म देश या आधुनिक म्यॉमार में रंगीन काष्ठ-फलाकों पर लिपिकृत पुस्तकें प्राप्त हुई हैं। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुस्तकागार में असम...

प्रधानमंत्री द्वारा प्रयागराज में नए हवाई अड्डा का शुभारंभ

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने १६ दिसंबर को प्रयागराज में एक नए हवाई अड्डा परिसर और कुंभ मेले के लिए समेकित कमान एवं नियंत्रण केन्द्र का उद्घाटन किया, प्रधानमंत्री ने गंगा पूजन किया तथा स्वच्छ कुंभ प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया, उन्होंने प्रयागराज में अक्षय वट का दौरा किया। प्रयागराज के अंडावा में भी विभिन्न विकास परियोजनाओं को राष्ट्र के नाम समर्पित किया, उनका उद्घाटन व शिलान्यास भी किया, एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की, कि इस बार अद्र्ध कुंभ के तीर्थयात्री अक्षय वट की यात्रा करने में भी सक्षम हो पाएंगे, उन्होंने कहा कि सरकार प्रयागराज के लिए अच्छा सम्पर्क सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास कर रही है, उन्होंने कहा कि जिन परियोजनाओं को आज समर्पित किया गया वे बुनियादी ढांचे एवं संपर्क दोनों की सहायता करेंगे, उन्होंने कहा कि नये हवाई अड्डा टर्मिनल का निर्माण एक वर्ष के रिकार्ड समय में पूरा कर लिया गया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि अद्र्ध कुंभ आने वाले भक्तों के लिए एक अनूठा अनुभव सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, उन्होंने कहा कि भारत के गौरवशाली अतीत और गतिशील भविष्य को प्रदर्शित करने का प्रयास किया जा रहा है, प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार स्वच्छ गंगा सुनिश्चित करने पर भी कार्य कर रही है,उन्होंने कहा कि इस संबंध में सीवेज उपचार संयंत्र एवं घाटों के सौन्दर्यीकरण की बड़ी भूमिका होगी। प्रधानमंत्री ने कुंभ की भारत एवं भारतीयता के एक प्रतीक के रूप में व्याख्या की, उन्होंने कहा कि यह हमें एकजुट करता है और एक भारत, स्वच्छ भारत की झलक प्रस्तुत करता है, उन्होंने कहा कि कुंभ का आयोजन केवल विश्वास की बात नहीं है, बल्कि यह सम्मान की भी बात है और कुंभ जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का अच्छी तरह ध्यान रखा जाएगा, उन्होंने कहा कि अद्र्ध कुंभ प्रदर्शित करेगा कि किस प्रकार ‘नवीन भारत’ विरासत एवं आधुनिकता दोनों को समावेशित करता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वह देश को सावधान करना चाहते हैं कि कुछ तत्व न्यायपालिका पर अनुचित दबाव बनाने के प्रयास कर रहे हैं, उन्होंने कहा कि ऐसे तत्व अपने को सभी प्रकार के संस्थानों से ऊपर समझते हैं। गडकरी, राणे, गोयल, जावडेकर, सहस्त्रबुद्धे और लोढ़ा को बड़ी जिम्मेदारी मुंबई : बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस ली है। चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई हैं और विभिन्न प्रमुख कार्यों के लिए महत्वपूर्ण लोगों की जिम्मेदारियां भी तय हो गई है, इस जिम्मेदारी में महाराष्ट्र के जिन सिर्फ ६ नेताओं को महत्व मिला है वे हैं – नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर, नारायण राणे, मंगल प्रभात लोढ़ा और विनय सहस्त्रबुद्धे। बीजेपी के केंद्रीय कार्यालय से शुक्रवार की देर शाम लोकसभा चुनाव अभियान की विभिन्न समितियों की यह सूची जारी हुई है। लोकसभा चुनाव में जिम्मेदारी के लिए बीजेपी ने जो समितियां बनाई हैं, उनमें पार्टी की संकल्प पत्र समिति (चुनाव घोषणा पत्र समिति) में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को अहम स्थान मिला है, राणे के अलावा रेल मंत्री पीयूष गोयल को भी संकल्प पत्र समिति में शामिल किया गया है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को सामाजिक व स्वयंसेवी संगठन संपर्क समिति में तथा राज्यसभा सांसद विनय सहदााबुद्धे को साहित्य निर्माण समिति में लिया गया है, इनके अलावा मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को प्रबुद्ध सम्मेलन समिति में लिया गया है। महाराष्ट्र से वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा अकेले नेता हैं, जिन्हें दो समितियों में जिम्मेदारी मिली है। लोढ़ा को लोकसभा चुनाव में यातायात व विमानन समिति तथा लाभार्थी संपर्क समिति में स्थान मिला है, इस सूची में पूर्व मुख्यमंत्री राणे का नाम सबसे अधिक चौंकाने वाला नाम है, वे बीजेपी कोटे से राज्यसभा सदस्य हैं, अपनी चुनाव अभियान टीम में राणे, गडकरी, गोयल, जावड़ेकर, सहदााबुद्धे और लोढ़ा जैसे लोकसभा चुनाव के प्रबंधन, प्रचार और संचालन में माहिर नेताओं को महत्व देकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी की ओर से इस बार का लोकसभा चुनाव किस मजबूती से लड़ा जाएगा। एसप्लेनेड एज्युकेशन सोसायटी का वार्षिक स्नेह सम्मेलन सम्पन्न मुंबई : एसप्लेनेड एज्युकेशन सोसायटी द्वारा १२०वें वार्षिक स्नेह सम्मेलन का आयोजन बोरीवली के प्रबोधनकार ठाकरे नाट्यगृह में ७ जनवरी को किया गया था। बच्चों की बड़ी मात्रा और मान्यवर अतिथियों की उपस्थिति में खूबसूरती के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान अध्यक्ष के रूप में विनोद घोसालकर (म्हाडा अध्यक्ष और शिवसेना के उपनेता) ने कहा कि स्नेह सम्मेलन के माध्यम से बच्चों का शारीरिक, शैक्षणिक, सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक विकास होता है, संस्था के संस्थापक नवीनचंद मजीठिया ने अपने मनोगत में कहा कि विद्यार्थी जीवन में सफलता के लिए मेहनत करना जरूरी है तब हमारा जीवन आनंदमय होगा, हमारे संस्था के व्यवस्थापक संचालक जयेशभाई मजीठिया ने बच्चों को परिश्रम का महत्व समझाते हुए कहा कि सकारात्मक कायों की ओर अग्रसर होकर अपने जीवन को सफल बनाने का कार्य करें और अपना और अपने राष्ट्र की प्रगति में सहयोग दें, उनके प्ररेणादायक वक्तव्य से बच्चे प्रभावित होकर उल्लास से सहमति जतायी, वार्षिक स्नेह सम्मेलन में विजेताओं को प्रमाणपत्र और पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया, स्नेह सम्मेलन में एक रस आने के लिए विशेष रूप से नवरस की संकल्पना की गयी थी, उदाहरण के लिए शांत रस, श्रृंगार रस, रूद्र रस, विमस्य रस, इ. रसों के आधार पर कार्यक्रम रूपरेखा के अनुसार संपन्न हुआ। कार्यक्रम में नवीनचंद्र मजीठिया व व्यवस्थापक संचालक जयेशभाई मजीठिया, विनोद घोसालकर, सभी विभाग के प्राचार्य, मुंबई विद्यापीठ के एनएसएस के प्रमुख बिडवे सर, मुंबई महापालिका की नगरसेविका प्रियंकाताई मोरे और विद्यार्थी, शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी वार्षिक स्नेह सम्मेलन में उपस्थित थे। कांग्रेस घोषणा पत्र २०१९ के सदस्य डॉ. मुणगेकर ने लोगों का सुझाव लिया मुंबई: कांग्रेस अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी की योजना, आगामी लोकसभा चुनाव २०१९ के लिए आम सहमति से कांग्रेस का ऐसा घोषणा पत्र बने जो सबको अपना और अच्छा लगे, इसको मूर्तरूप देने के लिए जन आवाज मेनिफेस्टो २०१९ कार्यक्रम का आयोजन गुजराती क्लब माटुंगा में किया गया, मुंबई कांग्रेस के उपाध्यक्ष व दक्षिण मध्य मुंबई जिला कांग्रेस कमिटी के पूर्व अध्यक्ष विरेंद्र उपाध्याय ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, इस अवसर पर जिले के ६ विधान सभा क्षेत्रों के सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित थे, मुंबई के एकमात्र कांग्रेस मेनिफेस्टो २०१९ के सदस्य व पूर्व राज्यसभा सदस्य भालचंद्र मुणगेकर ने एक-एक कर सभी के सुझाव मांगे, लोगों ने गरीबों को मिल रहे राशन, महिला गृह उद्योग पर जी.एस.टी. का भार महिलाओं की सुरक्षा देश में बढ़ रही बेतहासा महंगाई और बेरोजगारी, मुंबई में शिक्षा और शिक्षकों के मौजूदा हालात को डॉ. मुणगेकर के समक्ष रखा, सभी के विचार सुनने के पश्चात उन्होंने मेनिफेस्टो २०१९ सेमिनार को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज मुझे यहां ४४ सुझाव लोगों के द्वारा मिले हैं, मुझे इस बात की बेहद खुशी हो रही है, कि राहुल जी ने मुझे मुंबई से एक मात्र मेनिफेस्टो का सदस्य बनाया है, इस नाते मैं आप सभी से आपका विचार ले रहा हूं, हमने अब तक ३६ राज्यों के १६० शहरों में इस तरह का कार्यक्रम आयोजित कर हजारों लोगों का सुझाव लिया है, आज जितने भी लोगों ने मुझे सुझाव दिए हैं वह सभी सुझाव लोगों के हित में है, आगामी १ फरवरी को दिल्ली में राहुल जी को रिपोर्ट दी जाएगी। देशभर से आए लोगों के विचार को ध्यान में रखकर आगामी २०१९ चुनाव का घोषणापत्र कांग्रेस तैयार करेगी। डॉ. मुणगेकर ने कहा कि आप सभी लोगों ने मेरे विचार को अत्यंत शांतिपूर्वक सुना और अच्छा सुझाव मुझे दिया इसके लिए मैं आप सभी का आभार व्यक्त करता हूं। कार्यक्रम में राघवन सारथी, उपेन्द्र दोशी, राजन भोसले, किसन मिस्त्री, श्रीमती नैना दोशी, अमित शेट्टी, जीतसिंह रावत, वकील खान, निर्मला सिंह, सैय्यद खालिद नईम, विष्णु गायकवाड, रोशना शाह, एस.के. सिंह, अभिषेक सावंत, राजेंद्र (राजू) नगराले, अकबर हुसैन (राजू भाई), दीपक तलवार, मोहन सिंह, राकेश पाण्डेय, महेश भानुशाली, नगरसेवक सुफियान नियाज वनू, रघुवीर सिंह माटा, मो. रशीद शेख और विजय काम्बले के अलावा कांग्रेस के सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित थे। वीरेन्द्र उपाध्याय ने गुलदस्ता देकर डॉ. भालचंद्र मुणगेकर का स्वागत किया, कार्यक्रम का संचालन जितेंद्र खैरे ने किया। राजीव प्रताप रूडी बने भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने २२ दिसंबर को पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी को पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया।बिहार से लोकसभा सदस्य श्री रूडी पूर्व में भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहे हैं।श्री रूडी ने ट्वीट कर कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को धन्यवाद, मैं प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार की उपलब्धियों के प्रसार के लिए राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर जिम्मेदारी निर्वहन के लिए आशान्वित हूं।’श्री रूडी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा की अगुवाई वाली पहली राजग सरकार में मंत्री रहे हैं और मोदी सरकार में भी मंत्री पद संभाल चुके हैं। भारत की राष्ट्रभाषा घोषित होने से ‘हिंदी’ फिल्म उद्योग का लाभ बढ़ेगा-इमरान हाशमी मुंबई : Cheat India फिल्म के प्रचार -प्रसार हेतु मुंबई से प्रकाशित दैनिक नवभारत टाइम्स द्वारा आयोजित रंगमंच कार्यक्रम में पत्रकार रेखा खान द्वारा पूछे जा रहे प्रश्नोत्तर के बीच जब यह पूछा गया कि भारत की एक राष्ट्रभाषा घोषित होनी चाहिए, जिसके लिए फिल्म उद्योग का भी सहयोग मिलना चाहिए तो अभिनेता इमरान हाशमी ने कहा कि इसके लिए फिल्म उद्योग को एक कमेटी घोषित करनी चाहिए ताकि ‘हिंदी’ राष्ट्रभाषा घोषित हो, हिंदी यदि राष्ट्रभाषा घोषित होती है तो सबसे ज्यादा फायदा फिल्म उद्योग को ही होगा जिस विचारों का स्वागत रंगमंच में उपस्थित युवाओं ने करतल ध्वनि के साथ किया।  मुंबई पुलिस को भारतीयता का सम्मान माटुंगा पुलिस थाने में तैनात पुलिसकर्मी ललिता के घर जमा होकर उन्हें फुलों का गुलदस्ता भेंट करने के बाद केक कटवाते हैं और खुशियां मनाते हैं। ललिता का घर वडाला के चार रास्ता में है, जो जोन-४ पुलिस के तहत आता है, इस मौके पर संबंधित जोन-४ के डीसीपी, माटुंगा डिविजन के एसीपी, माटुंगा के सीनियर पीआई, पीआई, एपीआई समेत दर्जनों सिपाही मौजूद रहते हैं। यह सिलसिला पिछले कई साल से जारी है।ट्वीट कर दी बधाई : मुंबई पुलिस ने अपने ट्विटर हैंडल से ललिता को जन्मदिन की बधाई दी और लोगों से बुजुर्गों का खयाल रखने की अपील की, साथ बुजुर्गों को तकलीफ होने या कोई जानकारी मिलने पर मुंबई पुलिस को ट्वीट, मेसेज या नियंत्रण कक्ष में कॉल कर बताने की अपील की। मुंबई पुलिस में उनका कोई सगा बेटा नहीं है, लेकिन पुलिस के जवान उनके बेटों से कम भी नहीं हैं, पुलिसकर्मी ८४ वर्षीय ललिता सुब्रहमण्यम का जन्मदिन हर साल २ जनवरी को मनाते हैं।पुलिसकर्मी रखते हैं खयाल : हर साल की तरह इस साल भी जोन-४ की डीसीपी एन. अंबिका, एसीपी अस्मिता भोसले और सीनियर पीआई भरत भोईटे, पीआई व्हनमाने समेत दर्जनों की तादात में पुलिसकर्मी व अधिकारी ललिता जी के घर पहुंचे, यहां गाने-बजाने के बीच उनका जन्मदिवस मनाया गया।सीनियर पीआई भोईटे ने बताया, ‘ललिता जी हम पुलिसकर्मियों की मां हैं, उन्हें पुलिसकर्मी स्नेह से मम्मी बुलाते हैं, हर सप्ताह मांटुगा थाने के पुलिसकर्मी उनका हालचाल जानने उनके घर जाते हैं या काम की व्यस्तता होने पर फोन कर उनकी जानकारी लेते रहते हैं, मम्मी भी हर पंद्रह दिन में स्वयं फोन कर पुलिस को अपनी स्थिति बता देती हैं।’ डीसीपी अंबिका ने बताया कि पुलिसकर्मी ‘मम्मी’ के सुख-दुख का खयाल रखते हैं, गौरतलब है कि पढ़े-लिखे, सुखी-संपन्न और गृहस्थ जीवन बसा चुके तीन बेटों की मां हैं ललिता सुब्रहमण्यम। बेंगलुरू में उनका छोटा बेटा, जबकि कनाडा और यूएसए में बड़ा और मंझला बेटा रहता है, वे लोग मुंबई कम ही आते हैं, इसलिए ललिता पिछले २५ साल से वडाला स्थित अपने घर में अकेले ही रहती हैं। -मैंभाहूँ संस्कृत से हिन्दी का ढाई हजार साल का सफर भाषा वैज्ञानिक के अनुसार हिन्दी के अलावा भारत की सभी भाषाएं संस्कृत से निकली हैं, बंगला, उड़िया, असमिया, गुजराती और मराठी भाषाओं की जननी संस्कृत है, हिन्दी भाषा देववाणी संस्कृत की प्रथम उत्तराधिकारिणी है, अत: हिन्दी को संस्कृत की बड़ी बेटी कहा जाता है, हिन्दी-व्याकरण भी संस्कृत के व्याकरण पर ही आधारित है। हजारों संस्कृत के शब्द हिन्दी में ज्यों-के-त्यों प्रयुक्त होते हैं, ऐसे शब्द तत्सम कहलाते हैं। ई.पूर्व १५०० से ई. पूर्व ५०० तक संस्कृत प्रचलित थी, उसके बाद संस्कृत विकृत होने लगी। विकृति से पाली भाषा का उदय हुआ। पाली का काल ई. पूर्व ५०० से ई. पूर्व १०० तक है, इस अवधि में पाली भाषा आम जनता की भाषा थी और संस्कृत पण्डितों की भाषा बन गयी, भगवान बुद्ध पाली में ही उपदेश देते थे। बौद्ध-ग्रंथ-त्रिपिटक पाली में ही है, ईसा की पहली सदी से पाली भी विकृत होने लगी, जिससे प्राकृत भाषा का जन्म हुआ। मोटे तौर पर प्राकृत भाषा का काल पहली शताब्दी से लेकर पांचवीं-छठीं शताब्दी तक है, प्राकृत भाषा में भी अनेक ग्रंथ रचे गये। पांचवीं सदी से प्राकृत में भी परिवर्तन होने लगा। प्राकृत परिवर्तित होकर ३१ अपभ्रंश बन गयी, अपभ्रंश भाषा का समय पांचवीं-छठी से लेकर बारहवीं सदी तक माना जाता है, विद्वान अपभ्रंश का अंतिम समय दसवीं शताब्दी तक ही मानते हैं।भाषा में परिवर्तन धीरे-धीरे होता है, इस प्रक्रिया में सौ-पचास वर्ष या उससे भी अधिक वर्ष का हो सकता है, इसलिए भाषा का आरंभिक और अंतिम तिथि में मतभेद होता है, अपभ्रंश में अनेक काव्य रचे गये, अपभ्रंश के जैन कवि स्व्यंभू का काल ८वीं सदी है, स्वयंभू ने रामकथा पर आधारित ‘पऊमचरिऊ’ की रचना की, स्वयंभू को अपभ्रंश का बाल्मीकि और ‘पऊम-चरिऊ’ को जैन-रामायण कहा जाता है। अपभ्रंश को बाद में अपभ्रष्ट, अवहट्ठ और अवहत्य कहा जाने लगा, मैथिल कोकिल विद्यापति अवहट्ठ भाषा के भी कवि थे, उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति हैदेसिल बचना सब जन मिट्ठा। ते तैसन जपऔ अवहट्ठा।।अपभ्रंश के कई क्षेत्रिय रूप थे, शौर सेनी, पैशाची, मग मागधी, अर्धमागधी, ब्राचड़ और महाराष्ट्री इत्यादि, हिन्दी आरंभ में एक क्षेत्रिय बोली थी ‘जो सौर सेनी अपभ्रंश से निकली है’ आरंभ में यह दिल्ली मेरठ के क्षेत्र में बोली जाती थी, यही बोली विकसित होकर सारे भारत में फैल गयी, ‘हिन्दी’ मुस्लिम शासकों द्वारा दक्षिण भारत में पहुंची।दिल्ली आने वाले व्यापारियों के द्वारा भी ‘हिन्दी’ विस्तृत हुई, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के अथक प्रयास से गद्य और पद्य की भाषा को खड़ी बोली किया गया, उनके द्वारा हिन्दी का मानकीकरण किया गया। खड़ी बोली के विस्तार और परिष्कार में पं-कामता प्रसाद गुरू और किशोरीदास वाजपेयी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और दिनकर जी के साहित्य में हिन्दी का नवीनतम और परिकृत रूप मिलता है। वरिष्ठ पत्रकार व संपादक बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’ का ‘हिंदी बने राष्ट्रभाषा’ भारत की भाषायी संस्कृति संवर्धन क्षेत्र में एक प्रयास कहा जा सकता है। स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के शिल्पकार भारत के कोहिनूर – मुनगंटीवार मुंबई: विश्व में सबसे ऊंची मूर्ति सरदार पटेल की ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ की संकल्पना संजोकर शिल्पकार राम सुतार ने समस्त विश्व में भारत का सम्मान बढ़ाया है, वे हमारे कोहिनूर हैं, महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने यह कहते हुए विख्यात मूर्तिकार सुतार का अभिनंदन किया। मुम्बई की करीब ५० से भी ज्यादा सामाजिक संस्थाओं की ओर से आयोजित इस समारोह में मुनगंटीवार और बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढा ने श्री सुतार को सरस्वती माता की प्रतिमा भेंट कर शॉल व पुष्पगुच्छों से उनका अभिनंदन किया। प्रसिद्ध पुस्तक ‘परमवीर’ की लेखिका श्रीमती मंजू लोढा ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया।मकर संक्रांति की शाम लोढ़ा वल्र्ड टॉवर में आयोजित इस सम्मान समारोह में मुनगंटीवार ने कहा कि विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा का निर्माण करनेवाले सुतार का अभिनंदन विश्व की सबसे ऊँची आवासीय बिल्डिंग वल्र्ड वन में होना भी एक अद्भुत संयोग है, उन्होंने राम सुतार को गर्व और गौरव का प्रतीक बताते हुए उन्हें भारत भूषण की संज्ञा दी। बीजेपी के वरिष्ठ विधायक लोढा ने इस अवसर पर कहा कि स्टेचू ऑफ यूनिटी को बनानेवाले सुतार जैसे सरल, सामान्य एवं महान व्यक्तित्व के धनी का हम सबके हाथों सत्कार होना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।अपने अभिनंदन से अभिभूत पद्मभूषण शिल्पकार सुतार ने अपने भाषण में न केवल विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ बल्कि अपनी अब तक की सभी कलाकृतियों एवं रचनात्मकता का सारा श्रेय भारत की सांस्कृतिक परंपरा को दिया, इस अत्यंत गरिमामयी अभिनंदन समारोह में देश की करीब ५० से भी अधिक प्रतिष्ठित व सक्रिय सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों सहित केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले की धर्मपत्नी श्रीमती सीमाताई अठावले ने भी सुतार का अभिनंदन किया। समारोह में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन केवल हांडा एवं राजेन्द्र जाधव भी मंच पर थे, लोढा फाउंडेशन की अगुवाई में डॉ. द्वारकानाथ कॉटणीस रिसर्च ब्यूरो और लाडले इन्फो द्वारा संयुक्त रूप से यह समारोह आयोजित किया गया, समारोह में कला, संस्कृति, समाजसेवा और विभिन्न क्षेत्रों के कई जाने माने लोग भी विशेष रूप से आमंत्रित थे, लाडलेइन्फो के राजकुमार शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पत्रकार सुरक्षा बिल का समर्थन वयोवृद्ध कांग्रेसी पुरोधा माधवसिंह सोलंकी ने पत्रकारों की सुरक्षा हेतु संसद द्वारा एक राष्ट्रीय कानून का समर्थन किया है, उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि महाराष्ट्र सरकार के पत्रकार एवं मीडिया भवन सुरक्षा विधेयक को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभी तक अधिमान्यता नहीं दी, इस विधेयक को महाराष्ट्र विधान मंडल के दोनों सदनों ने २०१७ में एक स्वर से स्वीकृत किया था, यह राय श्री सोलंकी ने इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के प्रतिनिधि मण्डल के समक्ष व्यक्त की। IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा० के. विक्रम राव की अगुवाई में यह दल गांधीनगर (गुजरात) में उनसे गत सप्ताह मिला था, उसी दिन (८ जनवरी २०१९) IFWJ के सदस्यों ने गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी तथा राज्यपाल ओमप्रकाश कोहली को भी विज्ञप्ति दी थी।श्री सोलंकी स्वयं श्रमजीवी पत्रकार थे। वे चार बार गुजरात के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय (इन्दिरा गांधी तथा पी. वी. नरसिम्हा राव) केबिनेट में मंत्री रहे। श्री सोलंकी ने याद दिलाया कि IFWJ के विशेष अधिवेशन का (२७-२८ दिसम्बर १९८९) अहमदाबाद में उद्घाटन किया था, अध्यक्षता के. विक्रम राव ने की थी, गुजरात विधानसभा में जनता दल विपक्ष के नेता चिमनभाई पटेल मुख्य अतिथि थे, तब ३१ राज्यों से ८५० पत्रकार इसमें उपस्थित हुए थे। विपिन धूलिया सचिव मुख्यालय IFWJ

गणतंत्र दिवस २६ जनवरी

२६ जनवरी २६ जनवरी, १९५० भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दिन के रुप में माना जाता है। इसी दिन भारतीय संविधान जीवंत हुआ। उसके बाद हमारा देश संप्रभु देशों में शामिल हो गया। एक गणतांत्रिक शक्ति के रुप में हमारा भारत दुनिया में रुपायित हुआ।हालांकि भारत ने १५ अगस्त, १९४७ को अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की। भारत का संविधान २६ जनवरी, १९५० को प्रभाव में आया। संक्रमण १९४७ से १९५० तक की अवधि के दौरान किंग जार्ज षष्ठम राज्य के सिर था। सी. राजगोपालाचारी ने इस अवधि के दौरान भारत के गवर्नर जनरल के रुप में सेवा की। २६ जनवरी १९५० के बाद, राजेन्द्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति के रुप में निर्वाचित किये गये थे। आज गणतंत्र दिवस देश भर में और विशेष रुप से राजधानी, नई दिल्ली, जहाँ समारोह राष्ट्रपति द्वारा बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। राजधानी स्थित विभिन्न स्कूलों से बच्चे-बच्चियों का भी मोहक प्रदर्शन नजर आता है। परेड में देश के विभिन्न राज्यों से शानदार प्रदर्शन किये जाते हैं, जिनमें विभिन्न वर्गों द्वारा सांस्कृतिक एकता झलकती है। परेड और जुलूस राष्ट्रीय टेलीविजन द्वारा प्रसारित होते हैं और देश के हर कोने में स्थित यानी करोड़ों भारतीयों को दिखायी पड़ते हैं। इस दिन लोगों की देशभक्ति देश के हर भाग में दिखती है। देश में हर कार्यालय व संस्था में राष्ट्रीय छुट्टी होती है। इस अवसर पर प्रात:काल में भारत के प्रधानमंत्री इंडिया गेट पर ‘अमर जवान ज्योति’ पर पुष्पांजलि देते हैं उन सभी सैनिकों को, जो देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देते हैं। राष्ट्रपति जो सशस्त्र सेनाओं का सुप्रीम कमांडर भी है, उनके काफिले के साथ आता है। उन्हें २१ तोपों की सलामी प्रस्तुत की जाती है। राष्ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और राष्ट्रीय गान गाया जाता है। परेड में भारतीय परेड के दौरान सैन्य दल (वायु, समुद्र और जमीन) सशस्त्र बलों के सभी (तीन) प्रभागों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। वहाँ पुलिस दल का भारी परेड, होम गार्ड, सिविल डिफेंस और राष्ट्रीय कैडेट कोर भी शामिल होता है। सैन्य परेड एक रंगारंग सांस्कृतिक परेड के द्वारा पीछा करते हैं। विभिन्न राज्यों से भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झांकियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। देश भर से आये स्कूली बच्चों का परेड काफी प्रभावपूर्ण होता है। परेड का सबसे आकर्षक भाग विमानों द्वारा कुशल उड़ानबाजी होती है। जो भारतीय वायु सेना द्वारा प्रस्तुत होती है। लड़ाकू विमान अपने बेहतर प्रदर्शन करते हैं। इस तरह कई राष्ट्रोचित तैयारियों व परंपराओं के लिए गणतंत्रता दिवस के मूल्यों और उसकी मर्यादा को रेखांकित और सम्मानित किया जाता है। क्या आप तिरंगे झंडे के बारे में जानते हैं? प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है। यह एक स्वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैकेयानन्द ने की थी और इसका वर्तमान स्वरूप २२ जुलाई १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी, इसे १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘तिरंगे’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफ़ेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ २ और ३ का है। सफ़ेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफ़ेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें २४ तीलियां है। भारत के वर्तमान तिरंगे झंडे का इतिहास: प्रथम राष्ट्रीय ध्वज ७ अगस्त १९०६ को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और १९०७ में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार १९०५ में)। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते हैं, यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। तृतीय ध्वज १९१७ में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ.एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्योस में इस पर बने सात सितारे थे। बायीं और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था, एक कोने में सफ़ेद अर्धचंद्र और सितारा भी था। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो १९२१ में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया। यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग, जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफ़ेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए। वर्ष १९३१ ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष रहा, तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफ़ेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था, तथापि यह स्पष्ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्प्रदायिक महत्व नहीं था और इसकी व्याख्या इस प्रकार की जानी थी। २२ जुलाई १९४७ को संविधान सभा ने इसे मुक्त भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया, इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना। ध्वज के रंग: भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफ़ेद  पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।चक्र : इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गतिशील है और रूकने का अर्थ मृत्यु है।ध्वज संहिता : २६ जनवरी २००२ को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यकालों और फैक्ट्री में न केवल राष्ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रूकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते हैं। बशर्ते कि वे ध्वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्वज संहिता, २००२ को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्ट्रीय ध्वज का सामान्य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्थानों आदि के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्द्रीय और राज्य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।

मराठा राष्ट्र के निर्माता छत्रपति शिवाजी महाराज

शिवाजी शिवाजी का जन्म १९ फरवरी, १६३० को  शिवनेरी दुर्ग में हुआ, उनके पिता का नाम शाहजी तथा माता का नाम जीजाबाई था। शिवाजी के जन्म के समय शाहजी मुगल सेवा में थे, किन्तु शीघ्र ही उन्होंने मुगल सेवा का परित्याग कर दिया तथा एक स्वतंत्र जागीर के अधिपति बन गए|युग प्रवर्तक छत्रपति शिवाजी एक साहसी, चतुर और नीतिवान हिन्दू शासक थे जिनके पास बहुत ही सीमित साधन थे, जिनकी शिक्षा-दीक्षा भी समुचित ढंग से नहीं हो सकी थी, किन्तु उन्होंने अपनी बहादुरी, साहस और चतुराई से औरंगजेब जैसे शक्तिशाली और विशाल सेना के स्वामी से कई बार जोरदार टक्कर ली तथा अपनी शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि करने में सफलता प्राप्त की, उनमें अटूट देशभक्ति की भावना तथा अपने धर्म की रक्षा करने की अलौकिक शक्ति थी, वे एक कुशल प्रशासक और समाज सुधारक थे, कई बार लोगों का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें पुन: हिन्दू धर्म की मुख्य धारा में ले आए, उनका चरित्र उच्चकोटि का था, वे महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे तथा महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार करने वालों और निर्दोष व्यक्तियों की हत्या करने वालों को कठोर दंड देते थे, उन्होंने नारीत्व को मातृत्व की गरिमा प्रदान की। शिवाजी ने पन्द्रह वर्ष की आयु से ही अपनी छोटी सी जागीर की स्वतंत्रता के लिए कार्य करना प्रारम्भ कर दिया और इसे अपनी भावी महन्ता का आधार बनाया, उन्हें केवल अपने ही प्रयासों और उपक्रम पर भरोसा था, उनमें लोगों की सामथ्र्य को परखने की अद्भुत क्षमता थी, लोगों को सामथ्र्य बनाकर अपना सहायक और सेवक बना लेते थे, उन्होंने जनता के बिखरे हुए तत्वों को एकत्र कर एक संगठित दल का निर्माण किया और उसकी सहायता से वे अपने मुख्य उद्देश्य को सिद्ध करने में सफल हुए। शिवाजी की जागीर तीन शक्तिशाली राज्यों-आदिलशाही, कुतुबशाही और निजामशाही से घिरी हुई थी, इसके अतिरिक्त मुगल-साम्राज्य के भी सूबे थे जिनमें से प्रत्येक के पास लगभग एक लाख सैनिक थे, इसके अतिरिक्त सिद्दी, फ़्रान्सीस , अंग्रेज तथा उच लोग भी थे, जिनके अधीन रामनगर, सोंधा, मैसूर, त्रिचनापल्ली जैसे छोटे-छोटे राज्य थे। शिवाजी ने अपने चातुर्य से इन सबको घेर लिया तथा अपने प्रत्येक शत्रु को पराजित किया, उन्होंने कुछ पर खुला आक्रमण किया, कुछ को लड़ने पर विवश कर दिया, कुछ को अपने कुशल प्रबन्ध से चकित कर दिया, कुछ को पारस्परिक कलह में फँसाकर निर्बल कर दिया और कभी उनमें चुपचाप झुगड़े खड़े कर दिये। शिविरों और निवास स्थानों पर आकस्मित धावे मारकर कुछ को हतबुद्ध कर दिया, कुछ का उन्होंने खुले युद्ध में सामना किया, कुछ को उन्होंने मोहक प्रस्तावों द्वारा अपने साथ मिला लिया, कुछ को युक्तिपूर्वक छलबल से तितर-बितर कर दिया। शत्रु द्वारा अधिकृत प्रदेशों में उन्होंने निर्भयतापूर्वक अपने लिए गढ़ों और सुरक्षा-स्थलों का निर्माण किया, विभिन्न विरोधियों से भिन्नभिन्न प्रकार से व्यवहार कर उन्होंने अपने लिए स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।शिवाजी के शासन में डकैती और अन्याय का लोप हो गया, उनकी आज्ञाओं का सर्वत्र अक्षरश: पालन होता था। शक्तिशाली मुगल सम्राट औरंगजेब के लिए वे सदैव एक पहली बने रहे, उनकी चतुराई और युद्ध नीति के कारण औरंगजेब उन्हें ‘पहाड़ी चूहा’कहा था, जिसके नेतृत्व में मराठा सैनिक बिजलीके समान कौंधते तब मुगलों की विशाल सेना रण छोड़ भागने के लिए बाध्य हो जाती, शिवाजी के कारण औरंगजेब दु:ख के सागर में डूबा रहता था। शिवाजी ने मराठा लोगों की स्वाभाविक अराजकता को अपने अनुपम नेतृत्व से राष्ट्रीय सुदृढ़ता में परिणित कर दिया और उन्हें इस योग्य बना दिया कि वे भारत की विभिन्न जातियों में स्थान प्राप्त कर सके। शिवाजी ने कलहपूर्ण, उपद्रवी और उच्छृंखल मराठा जाति को आज्ञापालन का महत्व सिखाया और अपना नेतृत्व प्रदान कर देश की स्वाधीनता की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्रीय प्रयास प्रारम्भ कर दिया, उन्हीं के प्रयासों से मराठे राष्ट्र के रूप में परिणत हुए और भारतीय राजनीति में प्रथम श्रेणी की शक्ति बन गए, उन्होंने देशवासियों के सम्मुख स्वराज्य की स्थापना का उच्च आदर्श प्रस्तुत किया तथा शताब्दियों से दासता की बेड़ियों में जकड़े हुए राष्ट्र के राजनीतिक उद्धार के लिए कार्य किया। शिवाजी एक कुशल सेनापति, जन्मजात नेता, महान संगठनकर्ता, निश्चयी और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे, किसी भी विपत्ती का सामना करने के लिए वे सदैव तैयार रहते थे, उन्हें मानव चरित्र की बहुत बड़ी परख थी। छापामार युद्ध-प्रणाली, रैयतवाड़ी भूमि व्यवस्था, उत्तम अनुशासन की स्थापना उनकी मौलिक प्रतिभा को सिद्ध करती है। शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिया कि इतनी लम्बी दासता के बाद भी हिन्दू जाति और संस्कृति मरी नहीं है अपितु वह एक महान नेता, साम्राज्य निर्माता और हिन्दूत्व का पोषक उत्पन्न कर सकती है, यह उनकी महान् योग्यता थी कि उन्होंने विशाल मुगल साम्राज्य के मुँह से इतना बड़ा राज्य छीन लिया, बिखरी हुई मराठा जाति की एकता के सूत्र में आबद्ध किया और उसमें एक आत्मा और एक भावना की सृष्टि की। तत्कालीन इतिहासकार खफीखाँ ने लिखा है- ‘शिवाजी ने सदैव अपने प्रदेश की जनता के सम्मान को सुरक्षित रखने का प्रयास किया, हाथ में आ जाने पर भी मुसलमान शास्त्रों के सतीत्व की रक्षा और बच्चों की सुरक्षित रखने के प्रति वह सदैव सजग रहा।’ शिवाजी के घोर शत्रु औरंगजेब ने कहा था- ‘शिवाजी एक महान् सेनानायकथा  और वही एक ऐसा था जिसने नवीन राज्य निर्माण की महन्ता प्रदर्शित की, निरन्तर उन्नीस वर्षों तक उसके विरुद्ध सैनिक अभियानों के बावजूद भी उसका राज्य बढ़ता ही रहा।’ सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है- ‘ शिवाजी हिन्दू जाति में उत्पन्न अन्तिम महान् निर्माणकारी, विलक्षण बुद्धिवाले राष्ट्रनिर्माता थे, उन्होंने मराठा जाति में नवीन जीवन फूँक दिया, उन्होंने मराठों को स्वतंत्र आत्मविश्वासी बना दिया, उन्होंने सिद्ध कर दिया कि हिन्दू जाति राष्ट्र का निर्माण कर सकती है, वह अपने लिए राज्य की स्थापना कर सकती है। शिवाजी ने स्पष्ट का दिया कि हिन्दुत्व का वृक्ष सूख नहीं सकता, उसमें नई शाखाएँ फुट सकती हैं और यह पुन: अपना सिर आकाश तक ऊँचा कर सकता है।’ संत रामदास ने उचित ही कहा है- ‘राज्यों का पतन हो जाता है, साम्राज्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं, राजवंश लुप्त हो जाते हैं, परन्तु शिवाजी महान राजा के रूप में इस वीर नायक की स्मृति मनुष्य मात्र के लिए अमर ऐतिहासिक विरासत के रूप में, जो जनता की आशा का स्तम्भ और संसार की कामना का केन्द्र है, ह्य्दय को गति देने के लिए, कल्पना को जाग्रत करने के लिए और उच्चतम प्रयासों के निमित्त उत्तर-कालों के मस्तिष्क को प्रेरणा देने के लिए शेष रहेगी। – प्रो. मिश्रीलाल मांडोत रास बिहारी बोस (निधन -२१ जनवरी) महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों की ईंट सें ईंट बजा देनेवाली आजाद हिन्द फौज (आईएनए) के संस्थापक थे, जिसे सुभाष चंद्र बोस ने पुनर्गठित कर एक वास्तविक सेना का रूप प्रदान किया था। बंगाल के वर्धमान में २५ मई १८८६ को जन्मे रास बिहारी बोस ने भारत में बहुत सी क्रांतिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था और बाद में जापान जाकर देश की आजादी के लिए एक सशस्त्र सेना का गठन किया, इतिहासकार पी. हरीश के अनुसार अलीपुर बमकांड (१९०८) में जब पुलिस उनके पीछे लगी तो वह देहरादून आकर वन विभाग में हेड क्लर्क के रूप में काम करने लगे, तत्कालीन संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश और पंजाब) में भी अपनी गतिविधियों के चलते एक मशहूर क्रांतिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गए।अंग्रेजों ने १९१२ में कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की राजधानी बना दिया, इस उपलक्ष्य में जब गवर्नर जनरल लॉर्ड हॉर्डिंग चांदनी चौक पर बैठकर एक विशाल जुलूस निकाल रहे थे तो रास बिहारी बोस ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर उस पर बम फेंक दिया, लेकिन इस हमले में हार्डिंग बाल-बाल बच गए। रास बिहारी ने इस घटना को मास्टर अमीर चंद्र, भाई बाल मुकुंद, बसंत कुमार विश्वास, गणेशीलाल और अन्य कई साथियों के साथ मिलकर अंजाम दिया, अंग्रेजों ने इनमें से कई को फांसी पर चढ़ा दिया, पर रास  बिहारी उनके हाथ नहीं आए और उनकी पहुंच से दूर जापान चले गए।ब्रितानिया हुकूमत उनके प्रत्यर्पण के लिए जापान पर दबाव बनाती रही लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पाई। रास बिहारी जब जापान पहुंचे तो उनके इष्ट मित्रों ने उनके स्वागत में रात्रि भोज दिया, वहां भी वह चैन से नहीं बैठे और भारत की आजादी के लिए प्रयास करते रहे, उन्हें वहां रहनेवाले एशियाई लोगों और जापानी नेताओं का खूब समर्थन मिला, उन्होंने १९२३ में जापान की नागरिकता भी हासिल कर ली। रास बिहारी ने १९४२ में २८ से ३० मार्च तक तोक्यो में एक सम्मेलन कर इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना का फैसला किया, सम्मेलन में इस महान क्रांतिकारी ने भारत की आजादी के लिए शसस्त्रसेना के गठन का प्रस्ताव रखा। लीग की दूसरी बैठक २२ जून १९४२ को बैंकाक में हुई और इसमें फैसला हुआ कि सुभाष चंद्र बोस को बुलाकर लीग की कमान उन्हें सौंप दी जाए, उन्होंने जनरल मोहन सिंह के साथ मिलकर एक सितंबर १९४२ को लीग की सशस्त्र इकाई इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) की स्थापना की जिसे आजाद हिन्द फौज भी कहा जाता है। आजाद हिन्द फौज में उन भारतीय युद्धबंदियों ने शामिल होने में सबसे अधिक रूचि दिखाई जो मलाया और बर्मा (वर्तमान म्यामां) के मोर्चों पर अंग्रेजों की तरफ से लड़ रहे थे लेकिन जापानी फौज द्वारा पकड़ लिए गए थे। आईएनए के लिए चुने गए झंडे को आजाद नाम दिया गया। रास बिहारी के सामने उस समय दुविधा की घड़ी आ पड़ी जब जापानी सेना ने उनके तथा जनरल मोहन सिंह के हाथों से आजाद हिन्द फौज की कमान छीन ली और उन्हें इस संगठन से अलग कर दिया, इस तरह भारत की मुक्ति के लिए बनी सेना कुछ करने से पहले ही बिखर गई, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने वहां पहुंचकर आजाद हिन्द फौज को पुनर्गठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ी, रास बिहारी बोस २१ जनवरी १९४५ को दुनिया को अलविदा कह गए। रास बिहारी बोस प्रख्यात वकील और शिक्षाविद के साथ प्रख्यात क्रांतिकारी व आजाद हिन्द फौज के निर्माता भी थे। देश के जिन क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता-प्राप्ति तथा स्वतंत्र सरकार का संघटन करने के लिए प्रयत्न किया, उनमें श्री रासबिहारी बोस का नाम प्रमुख है। रास बिहारी बोस कांग्रेस के उदारवादी दल से भी सम्बद्ध थे, १९३७ में उन्होंने भारतीय स्वातंत्र्य संघ की स्थापना की और सभी भारतीयों को आह्वान किया तथा भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया।आजादी की जंग के महानायक रास बिहारी आजाद हिन्द फौज का आधार स्तम्भ थे, जिन्होंने अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए जापान में रहकर लड़ाई लड़ी। इतिहासवेत्ता एमके कपूर के अनुसार रास बिहारी एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने आजादी हासिल करने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बड़े युद्ध के रूप में एक व्यापक योजना तैयार की, उन्होंने कहा कि उनकी यही योजना आगे चलकर ‘आजाद हिन्द फौज’ के रूप में फलीभूत हुई, जिसने सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में एक बड़ी लड़ाई लड़ी। वर्ष १९०८ में अलीपुर बम कांड के बाद रास बिहारी बोस देहरादून आ गए और वन अनुसंधान संस्थान में हैड क्लर्वâ के रूप में काम करने लगे, गोरी हुवूâमत ने आजादी के दीवानों के खिलाफ अपने दमन चक्र को तेज कर दिया और चांदनी चौक की घटना में शामिल क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान छेड़ा, इस बम कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गए, लेकिन रास बिहारी बोस हाथ नहीं आए और वह भेष बदलकर जापान जा पहुंचे। मास्टर अमीर चंद्र, भाई बाल मुकुंद और अवध बिहारी को आठ मई १९१५ को फांसी पर लटका दिया गया। वसंत कुमार विश्वास को अगले दिन नौ मई को फांसी दी गई, उधर जापान पहुंचे रास बिहारी ने दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में रह रहे भारतीयों को एकजुट करने का काम किया और उनके सहयोग से इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की। सैन्य अधिकारी मोहन सिंह के सहयोग से उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के भारतीय युद्धबंदियों को लेकर इंडियन नेशनल आर्मी (आजाद हिन्द फौज) की स्थापना की, बाद में इसकी कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी गई। कपूर के अनुसार आजाद हिन्द फौज द्वारा छेड़ी गई जंग हालांकि पूरी तरह सफल नहीं हो पाई, लेकिन इसने अंग्रेजों के लिए काम करनेवाले भारतीय सैनिकों में विप्लवी प्रवृत्ति भर दी। १९४६ के नौसैनिक विद्रोह को भी इसी विप्लवी कड़ी के रूप में देखा जाता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस

‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ सुभाष चन्द्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ और ‘जय हिन्द’ जैसे प्रसिद्द नारे दिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की, १९३८ और १९३९ में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, १९३९ में फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया|अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ की स्थापना की सुभाष चंद्र बोस को ‘नेताजी’ भी बुलाया जाता है, वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता थे हालाँकि देश की आज़ादी में योगदान का ज्यादा श्रेय महात्मा गाँधी और नेहरु को दिया जाता है मगर सुभाष चन्द्र बोस का योगदान भी किसी से कम नहीं था।प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म जनवरी २३ सन १८९७ में उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था, उनके पिता जानकी नाथ बोस प्रख्यात वकील थे, उनकी माता प्रभावती देवी सती और धार्मिक महिला थीं, प्रभावती और जानकी नाथ की १४ संतानें थीं जिसमें छह बेटियां और आठ बेटे थे। सुभाष उनमें से नवें स्थान पर थे। सुभाष बचपन से ही पढ़ने में होनहार थे। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था और स्नातक में भी वो प्रथम आए थे। कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्तानक की डिग्री हासिल की थी, उसी दौरान सेना में भर्ती हो रही थी, उन्होंने भी सेना में भर्ती होने का प्रयास किया परंतु आंखें खराब होने के कारण उनको अयोग्य घोषित कर दिया गया। वे स्वामी विवेकानंद के अनुनायक थे। अपने परिवार की इच्छा के अनुसार वर्ष १९१९ में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इंगलैण्ड पढ़ने गये। कैरियर: भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने १९२० में आवेदन किया और इस परीक्षा में उनको न संपर्क सफलता मिली बल्कि उन्होंने चौथा स्थान भी हासिल किया। वे जालियानवाला बाग के नरसंहार के बहुत व्याकुल हुए और १९२१ में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया। भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधीजी के संपर्क में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। गांधीजी के निर्देशानुसार उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करना शुरू किया, उन्होंने बाद में चितरंजन दास को अपना राजनैतिक गुरु बताया था, अपनी सूझबूझ और मेहनत से सुभाष बहुत जल्द ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं में शामिल हो गए, १९२८ में जब साइमन कमीशन आया तब सुभाष चन्द्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ और ‘जय हिन्द’ जैसे प्रसिद्द नारे दिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की, १९३८ और १९३९ में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, १९३९ में फॉरवर्ड ब्लाक का गठन किया, अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ की स्थापना की सुभाष चंद्र बोस को ‘नेताजी’ भी बुलाया जाता है, वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रख्यात नेता थे हालाँकि देश की आज़ादी में योगदान का ज्यादा श्रेय महात्मा गाँधी और नेहरु को दिया जाता है मगर सुभाष चन्द्र बोस का योगदान भी किसी से कम नहीं था। प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म जनवरी २३ सन १८९७ में उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था, उनके पिता जानकी नाथ बोस प्रख्यात वकील थे, उनकी माता प्रभावती देवी सती और धार्मिक महिला थीं, प्रभावती और जानकी नाथ की १४ संतानें थीं जिसमें छह बेटियां और आठ बेटे थे। सुभाष उनमें से नवें स्थान पर थे। सुभाष बचपन से ही पढ़ने में होनहार थे। उन्होंने दसवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था और स्नातक में भी वो प्रथम आए थे। कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉ लेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्तानक की डिग्री हासिल की थी, उसी दौरान सेना में भर्ती हो रही थी, उन्होंने भी सेना में भर्ती होने का प्रयास किया परंतु आंखें खराब होने के कारण उनको अयोग्य घोषित कर दिया गया। वे स्वामी विवेकानंद के अनुनायक थे। अपने परिवार की इच्छा के अनुसार वर्ष १९१९ में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए इंगलैण्ड पढ़ने गये।जीवनी: भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उन्होंने १९२० में आवेदन किया और इस परीक्षा में उनको न संपर्क सफलता मिली बल्कि उन्होंने चौथा स्थान भी हासिल किया। वे जलियावाला बाग के नरसंहार के बहुत व्याकुल हुए और १९२१ में प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया। भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधीजी के संपर्क में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। गांधीजी के निर्देशानुसार उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करना शुरू किया, उन्होंने बाद में चितरंजन दास को अपना राजनैतिक गुरु बताया था, अपनी सूझ-बूझ और मेहनत से सुभाष बहुत जल्द ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं में शामिल हो गए, १९२८ में जब साइमन कमीशन आया तब कांग्रेस ने इसका विरोध किया और काले झंडे दिखाए।१९२८ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ, इस अधिवेशन में अंग्रेज सरकार को ‘डोमिनियन स्टेटस’ देने के लिए एक साल का वक्त दिया गया, उस दौरान गांधी जी पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे, वहीं सुभाष को और जवाहर लाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। १९३० में उन्होंने ‘इंडीपेंडेंस लीग’ का गठन किया। सन १९३० के ‘सिविल डिसओबिडेंस’ आन्दोलन के दौरान सुभाष को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। गांधीजी- इरविन पैक्ट के बाद १९३१ में उनकी रिहाई हुई, सुभाष ने गाँधी-इरविन पैक्ट का विरोध किया और ‘सिविल डिसओबिडेंस’ आन्दोलन को रोकने के फैसले से भी वह खुश नहीं थे। सुभाष को जल्द ही ‘बंगाल अधिनियम’ के अंतर्गत दोबारा जेल में डाल दिया गया, इस दौरान उनको करीब एक साल तक जेल में रहना पड़ा और बाद में बीमारी की वजह से उनको जेल से रिहाई मिली, उनको भारत से यूरोप भेज दिया गया, वहां उन्होंने, भारत और यूरोप के मध्य राजनैतिक और सांकृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए कई शहरों में केंद्र स्थापित किये, उनके भारत आने पर पाबंदी होने के बावजूद वो भारत आए औरपरिणामतः उन्हें १ साल के लिए जेल जाना पड़ा। १९३७ के चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी ७ राज्यों में सत्ता में आई और इसके बाद सुभाष को रिहा किया गया, इसके कुछ समय बाद सुभाष कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (१९३८) में अध्यक्ष चुने गए अपने कार्यकाल के दौरान सुभाष ने ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ का गठन किया। १९३९ के त्रिपुरी अधिवेशन में सुभाष को दोबारा अध्यक्ष चुन लिया गया इस बार सुभाष का मुकाबला पट्टाभि सीतारमैया से था। सीतारमैया को गांधीजी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था फिर भी २०३ मतों से सुभाष चुनाव जीत गए, इस दौरान द्वितीय विश्वयुध्द के बादल भी मडराने लगे थे और सुभाष ने अंग्रेजों को ६ महीने में देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे दिया गया सुभाष के इस रवैय्ये का विरोध गांधीजी समेत कांग्रेस के अन्य लोगों ने भी किया जिसके कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और ‘फॉरवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की। सुभाष ने अंग्रजों द्वारा भारत के संसाधनों का द्वितीय विश्व युद्ध में उपयोग करने का घोर विरोध किया और इसके खिलाफ जन आन्दोलन शुरू किया उनके इस आंदोलन को जनता का जबरदस्त समर्थन मिल रहा था। इसलिए उन्हें कोलकाता में कैद कर नजरबन्द रखा गया जनवरी १९४१ में सुभाष अपने घर से भागने में सफल हो गए और अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहुँच गए। ‘दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है’ वाली धारणा के मद्देनजर उन्होंने ब्रिटिश राज को भारत से निकालने के लिए जर्मनी और जापान से मदद की गुहार लगायी। जनवरी १९४२ में उन्होंने रेडियो बर्लिन से प्रसारण करना शुरू किया जिससे भारत के लोगों में उत्साह बढ़, वर्ष १९४३ में वो जर्मनी से सिंगापुर आए। पूर्वी एशिया पहुंचकर उन्होंने रास बिहारी बोस से ‘स्वतंत्रता आन्दोलन’ का कमान लिया और आजाद हिंद फौज का गठन करके युद्ध की तैय्यारी शुरू कर दी। आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना मुख्यतः जापानी सेना द्वारा अंग्रेजी फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को लेकर किया गया था, इसके बाद सुभाष को ‘नेताजी’ कहा जाने लगा अब आजाद हिन्द फ़ौज भारत की ओर बढ़ने लगी और सबसे पहले अंदमान और निकोबार को आजाद किया, आ़जाद हिंद फौज बर्मा की सीमा पार करके १८ मार्च १९४४ को भारतीय भूमि पर आ धमकी। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी के हार के साथ, आजाद हिन्द फ़ौज का सपना पूरा नहीं हो सका।मृत्यु : ऐसा माना जाता है कि १८ अगस्त १९४५ में एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु ताईवान में हो गयी परंतु उसका दुर्घटना का कोई साक्ष्य नहीं मिल सका, सुभाष चंद्र की मृत्यु आज भी विवाद का विषय है जो कि भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा संशय है 

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