दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

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दीपावली

दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं, जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं। इस पर्व का अपना ऐतिहासिक महत्व भी है जिस कारण यह त्यौहार किसी खास समूह का न होकर सम्पूर्ण विश्व का हो गया है।
त्रेता युग में भगवान राम, जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे तब श्री राम के आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियाँ मनाई गई, यह भी कथा प्रचलित है कि जब श्रीकृष्ण ने आतताई नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।

राक्षसों का वध करने के लिए माँ देवी ने महाकाली का रुप धारण किया, राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव, स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर के स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया, इसी की याद में उनके शांत रुप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई, इसी रात इनके रौद्ररुप काली की पूजा का भी विधान है। महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली तब बलि से भयभीत देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान विष्णु ने वामन रुप धारण कर, प्रतापी राजा बलि से तीन पग पृथ्वी दान के रुप में मांगी। महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी को समझते हुए भी याचक को निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर, भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू-लोकवासी प्रत्येक वर्ष ‘दीपावली’ मनाएगें।

कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्द सिंहजी बादशाह जहाँगीर की कैद से मुक्त होकर, अमृतसर वापस लौटे थे। कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया, इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाई थी।
५०० ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो में सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार, उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी, उस मूर्ति में मातृ देवी के दोनों और दीप जलते दिखाई देते हैं।
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवम् अनुयायियों ने २५०० वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था, इसलिए दीप जलाकर खुशियाँ मनाई गई। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मन्दिरों और घाटों (नदी किनारे) पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते हैं।

अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरु हुआ था। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के ही दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया, महावीर निर्वाण संवत् इसके दूसरे दिन से शुरु होता है इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरम्भ की शुरुआत मानते हैं। दीपोत्सव का वर्णन प्राचीन जैैन ग्रंथों में मिलता है। कल्पसूत्र में कहा गया है कि महावीर निर्वाण के साथ जो अन्र्तज्योति सदा के लिए बुझ गई है, आओ हम उसकी क्षतिपूर्ति के लिए वही ज्योति के प्रतीक ‘दीप’ जलाएँ, पंजाब में जन्में स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ, जिन्होंने दीपावली के दिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली।
महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर, दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया, उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। दीन-ए-इलाही के प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासन में दौलतखाने के सामने ४० गज ऊँचे बाँस पर, एक बड़ा आकाशदीप ‘दीपावली’ के दिन ही लटकाया जाता था, बादशाह जहाँगीर भी ‘दीपावली’ धूमधाम से मनाते थे। मुगलवंश के अंतिम सम्राट बहादुर शाह ़जफर ‘दीपावली’ को त्यौहार के रुप में मनाते थे और इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे। शाह आलम द्वितीय के समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवम् लाल किले में आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

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हमारे धर्मशास्त्रों में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को तीसरे प्रहर में राजा बलि की पूजा करने का उल्लेख किया गया है।
विधि-विधान : ऋषि बालखिल्य ने ऋषियों को बलिपूजन का विधि-विधान इस प्रकार बतलाया है, सर्वप्रथम पाँच रंगों से विन्ध्यावली सहित राजा बलि की मूर्ति बनाएँ, उसे घर की मध्यशाला में बनाकर उसकी जीभ, आंखें, करतल, चरणतल, लाल काले रंग से रंगें, उसका सारा शरीर पीले रंग से, शास्त्रअस्त्र, नीले रंग से और वस्त्र सफेद रंग से सजावें, उसकी दो भुजाएँ राज्यचिन्हों से सुशोभित करें और फिर उसकी पूजा करें, पूजा करते समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें :
बलिराज! नमस्तुभ्यं, दैत्यदानवपूजित:
इन्द्रप्रभो, अमरारते, विष्णुसान्निध्यदो भाव
हिन्दी अनुवाद- हे दैत्यों औैर दानवों से पूूजित बलिराजा, हे इन्द्रप्रभु, हे देव शत्रु, हे विष्णु भगवान का सानिध्य प्रदान करने वाले स्वामी आपको मेरा नमस्कार है।
अर्थात् ‘हे बलिराज! तुम्हें नमस्कार है तुम्हें देव-दानव दोनों ही पूजते हैं, तुम देवरूपि हो, मुझ पर तुम ऐसी कृपा करो जिससे मैं विष्णु की शरण प्राप्त कर सकूँ फिर ‘‘बलिराजाय नम:’’ मंत्र से उन्हें आसन दें और उसी मंत्र से पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, चन्दन, अक्षत, पुष्प, अबीर, गुलाल, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा आदि चढ़ावें, तत्पश्चात् अनेक प्रकार के दान इत्यादि भी प्रदान करें।

भगवान् श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘हे राजन्, इन दिनों राजा बलि का नाम लेकर जो कुछ किया जाता है, वह अक्षय फल देता है। हे युधिष्ठिर! पृथ्वी पर यह महोत्सव बड़ा आनन्दायक है, इसलिए इसे ‘कौमुदी महोत्सव’ भी कहते हैं जो मनुष्य इस दिन जिस भाव से अर्थात् खुशी या उदासी में रहता है, साल भर उसका मन वैसा ही रहता है, इस पूजा के बाद ‘गौक्रीड़ा’ उत्सव मनावें, चन्द्रमा पशुओं के लिए घातक है, इसलिए चन्द्रोदय यदि हो तो उससे पहले ही यह व्रत करें। इस व्रत में निम्नलिखित अनुष्ठान किये जाते हैं- गायों की पूजा करें और उन्हें तिलक लगावें, बालतृण के ग्रास बनाकर उन्हें खिलाएँ, उनके सींग और खुर रंगें और फिर मालाएँ पहनाकर गाजे-बाजे के साथ उन्हें ले जावें और घूमा-फिरा कर वापिस घर लावें, स्त्रियों द्वारा उनकी आरती करावें तथा सायंकाल में भी उनकी मंगलमालिका करें, ‘वष्टिका’ अर्थात् घास से बनाया हुआ नया मोटा रस्सा अथवा गजदौर तैयार करावें फिर उस पर वष्टिका का पूजन करें फिर दोनों दल, जिसमें युवा और बलवान युवक होने चाहिए, उस रस्सी की छोरों को पकड़ें और उन्हें दल-बल सहित खींचे, अगर नीची जाति के लोग जीतते हैंं तो राजा की जीत मानी जाती है, दोनों दलों के बीच ३० गज की दूरी रखें। १५ गज पर रेखा खींच दें, फिर जो इसे लांघें, उसी के अनुसार हार-जीत का निर्णय करें।

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