श्री जंगलीनाथ गौशाला

श्री जंगलीनाथ गौशाला

श्री जंगलीनाथ गौशाला का निर्माण आज से लगभग ६० साल पहले हमारे पूर्वजों के द्वारा गौसेवा को ध्यान में रखकर किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य गौरक्षा और गौसेवा सेवा है। गौशाला का क्षेत्रफल २ एकड़ से अधिक है जिसमें लगभग १०५ गाय अभी जीवन यापन कर रही है, गौशाला के क्षेत्रफल के अनुसार गौशाला में लगभग ४०० गाय आराम से अपना जीवन यापन कर सकती है।समिति और समाज के द्वारा दान के पैसे से १०५ गायों के भोजन के लिए ५००० किलो सूखे घास की व्यवस्था हर साल कर ली जाती है जो एक साल के लिए पर्याप्त होता है। गौशाला ६० साल पुरानी होने की वजह से पुराने सभी छोटे-छोटे शेड खराब हो गए हैं और उनके टूटने की संभावना हमेशा बनी रहती है जिसकी वजह से उनमें अब गाय को नहीं रखा जा सकता है कुछ शेड अभी ठीक है जिनमें अधिक से अधिक ४० गाय रहती है। पैसे के आभाव और शेड के खराब होने की वजह से लगभग ६५ गाय को पॉलीथिन वाले शेड में रखा जाता है और गायों का भोजन (सूखा घास) खराब हो जाता है, गौशाला में यह एक दयनीय स्थिति है। १०५ गायों की देखभाल के लिए लगभग ४ कर्मचारियों की जरूरत होती है लेकिन पैसे के आभाव में गौशाला में सिर्फ दो कर्मचारियों को ही रख सकते हैं क्योंकि उनकी व्यवस्था ही मुश्किल से हो पाती है। पहले नानपारा गांव में मंडी थी, जिसमें आसपास के किसान और व्यापारी अनाज के लेनदेन के लिए आते थे तो उनके द्वारा दिये गए दान राशि और अनाज से गायों के लिए पोष्टिक आहार की व्यवस्था आसानी से हो जाती थी लेकिन कुछ सालों से मंडी बंद हो गयी और अब दान राशि और अनाज मिलना बंद हो गया, जिससे गायों के लिए पोष्टिक आहार की व्यवस्था नहीं हो पा रही है।इस तरह गौशाला में रहने वाली गायों के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। श्री जंगलीनाथ गौशाला समिति के द्वारा गौशाला को बेहतर बनाने के लिए निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। मैं भारत हूँ के गौ सेवी पाठकों से निवेदन है कि यदि संभव हो तो श्री जंगलीनाथ गौशाला में जाकर उत्साहवर्धन करें और यदि जाना संभव नहीं है तो श्री जंगलीनाथ गौशाला के सहयोग के लिए दान करें।

उद्देश्य

सभी गाय अपनी स्वस्थ अवस्था में हमें अमृत समान दूध देती है, खेती के लिए बैल देती है, ईंधन के लिए गोबर देती है और मूत्र औषधियों को बनाने में काम आता है, उसी गाय को लोग वृद्ध हो जाने पर जंगल में छोड़ देते हैं, जहां से उन्हें कुछ लोग पकड़कर बूचड़खानों में कत्ल होने के लिए बेच देते हैं, कई बार ऐसी गायों को सीधे ही बूचड़खानों में भेजे जाने के लिए बेच दिया जाता है। मानवीय आधार पर ऐसी गायों की देखभाल के लिए और उनका शेष जीवन भी शांतिपूर्वक गुजरे, इस भावना के साथ हमारे पूर्वजों के द्वारा गौशालाओं का संचालन किया गया है। इन गौशालाओं में उन गायों को रखा जाता है जो दूध नहीं देती और जिन्हें उनके मालिकों द्वारा छोड़ दिया जाता है या जिन्हें बूचड़खाने ले जाए जाने से बचाया जाता है। गौशाला का प्रमुख उद्देश्य गायों को बचाना और उनको बेहतर देखभाल देना है। इन गायों के प्रतिदिन भोजन, देखभाल, रहने की उत्तम व्यवस्था, बीमारियों के उपचार आदि की व्यवस्था लोगों के द्वारा किये गए दान से की जाती है, आप भी ऐसी गायों का जीवन बचाने में अपना सहयोग दे सकते हैं।

गौवंश रक्षा/ आर्थिक समृद्धि

भारतवर्ष में आदि सृष्टि से ही गाय को माता की तरह पूज्य माना गया है, यदि यह कहा जाये कि गाय भारत की कामधेनू है तो अतिशयोक्ति नहीं है, उसका हमारे लिए केवल धार्मिक महत्व ही नहीं, प्रत्युत आर्थिक महत्व सर्वाधिक है। यथार्थ में गाय की आर्थिक उपयोगिता के कारण ही गाय को ‘कामधेनु’ कहा गया है, हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है, यहॉं ८० प्रतिशत जनता ग्रामीण अंचल में रहकर कृषि पर आश्रित है और कृषि का कार्य गाय के बछड़ों, गोबर आदि के बिना कदापि सम्भव नहीं है। महर्षि दयानन्द जो इस युग के महान सुधारक थे,उन्होंने लिखा है- ‘‘गौ आदि पशुओं के नाश से राजा प्रजा दोनो का नाश होता है।’महर्षि दयानन्द ने गाय आदि पशुओं का महत्व बहुत ही दूरदर्शिता से समझाया, उनके जीवन की अन्तिम इच्छा यही थी कि भारत में गोवंश का रक्षण होना चाहिए, उसके लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए- जैसे गोरक्षा के महत्व समझाने के लिए ‘गोकरुणानिधि’ पुस्तक लिखी, तत्कालीन प्रशासक लार्ड ब्रुक आदि को गोरक्षा का महत्व समझाया तथा भारत की इस हार्दिक भावना को महारानी विक्टोरिया को पहुँचाने के लिए लाखों हस्ताक्षर कराने का अभियान चलाया और भारतीय राजाओं को इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए प्रेरित किया।

परन्तु विधि की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि उनकी जीवन-लीला के शीघ्र समाप्त हो जाने के कारण से यह कार्य पूर्ण न हो सका। गोवंश के आर्थिक महत्व को समझाते हुए महर्षि लिखते हैं ‘‘जो एक गाय न्यून से न्यून दो सेर दूध देती हो और दूसरी बीस सेर तो प्रत्येक गाय के ग्यारह सेर दूध होने में कुछ भी शंका नहीं है, इस हिसाब से एक मास में सवा आठ मन दूध होता है। एक गाय कम से कम ६ महीने और दूसरी अधिक से अधिक १८ महीने तक दूध देती है तो दोनों का मध्यभाग प्रत्येक गाय के दूध देने में बारह महीने होते हैं, इस हिसाब से बारह महीनों का दूध निन्नानवे मन होता है, इतने दूध को औटाकर प्रति सेर में छटांक चावल और डेढ़ छटांक चीनी डालकर खीर बनाकर खावें तो प्रत्येक पुरुष के लिए दो सेर दूध की खीर पुष्कल (पर्याप्त) होती है, क्योंकि यह भी एक मध्य भाग की गिनती है अर्थात कोई दो सेर दूध की खीर से अधिक खा गया और कोई न्यून, इस हिसाब से एक प्रसूता गाय के दूध से १९८० (एक हजार नौ सौ अस्सी) मनुष्य एक बार तृप्त होते हैं। गाय न्यून से न्यून ८ और अधिक से अधिक १८ बार बच्चे जनती है, इसका मध्यभाग तेरह बार आया तो २५७४० (पच्चीस हजार सात सौ चालीस) मनुष्य एक गाय के जन्मभर के दूधमात्र से एक बार तृप्त हो सकते हैं।

गाय के एक पीढ़ी में छः बछिया और सात बछड़े हुए, इनमें से एक की मृत्यु रोगादि से होना सम्भव है तो भी बारह रहे, उन छः बछियाओं के दूधमात्र से पूर्व उक्त प्रकार से १५४४४० (एक लाख चौवन हजार चार सौ चालीस) मनुष्यों का पालन हो सकता है, अब रहे छः बैल, उनमें एक जोड़ी से दोनों साख में २०० (दो सौ) मन अन्न उत्पन्न हो सकता है, इस प्रकार तीन जोड़ी ६०० (छः सौ) मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं, उनके कार्य का मध्यभाग आठ वर्ष है, इस हिसाब से ४८०० (चार हजार आठ सौ) मन अन्न उत्पन्न करने की शक्ति एक जन्म में तीनों जोड़ी की है। ४८०० मन अन्न से प्रत्येक मनुष्य का तीन पाव अन्न भोजन में गिनें तो २५६००० (दो लाख छप्पन हजार) मनुष्यों का एक बार भोजन होता है। दूध और अन्न को मिलाकर देखने से निश्चय है कि ४१०४४० (चार लाख दस हजार चार सौ चालीस) मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है, अब छः गायों की पीढ़ी दर पीढ़ियों का हिसाब लगाकर देखा जावे तो अंसख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है और इसके मांस से अनुमान है कि केवल अस्सी मांसाहारी मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते हैं। देखो! तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं।” (गोकरुणानिधि  महात्मा गांधी ने भी गाय का आर्थिक विश्लेषण करते हुए कहा था- ‘‘आज तो गाय मृत्यु के किनारे खड़ी है और मुझे यकीन नहीं कि अन्त में हमारे प्रयत्न उसे बचा सकेंगे लेकिन वह नष्ट हो गई तो उसके साथ ही हम भी यानी हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जायेगी।‘‘हमारे ऋषि मुनियों ने हमें उपाय बता दिया है, वे कहते हैं कि गाय की रक्षा करो, सबकी रक्षा हो जायेगी, ऋषि ज्ञान की कुंजी खोल गये हैं, उसे हमें बढ़ाना चाहिए, बर्बाद नहीं करना चाहिए।” (सित. ८६ के ‘गोधन’ से साभार)

भारत और गाय :लार्ड लिनलिथगो (वायसराय) ने कहा था-‘‘भारत में गाय अपनी पीठ पर सम्पूर्ण आर्थिक ढांचे का भार सम्भाले हुए है।” प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. एलबर्ट आईन्स्टीन ने एक सन्देश में कहा था-‘‘भारत ट्रेक्टर, उर्वरक, आदि का इस्तेमाल खेती के लिए न करे, भारत को अपनी खेती का आधार गाय और बैल को ही रखना चाहिए।” अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति कार्टर के शब्द हैं-‘‘गोबर गैस ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है।” प्रसिद्ध वैज्ञानिक (अमेरिका) डोनाल्ड क्लांस का प्रधानमन्त्री राजीव गांधी को सुझाव- ‘‘भारत अपने पशुधन की रक्षा करे तो उससे २.२८ करोड़ बैरल पैट्रोलियम जितनी ऊर्जा प्राप्त होगी।” गाय को संवारना स्वयं के परिवार को संवारना हेै।

-बिजय कुमार जैन ‘हिंदी सेवी’गौशाला

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